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Faridabad News: मलबे से पट रही प्रमुख सड़कों के किनारे बनी ग्रीन बेल्ट
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हरियाली बचाने की योजना पर सवाल, मलबे का संग्रह और निस्तारण बड़ी चुनौती
150 करोड़ रुपये से अधिक की हरित परियोजनाएं चल रहीं
मोहित शुक्ला
फरीदाबाद। शहर को हरा-भरा बनाने के लिए 150 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। वहीं, दूसरी ओर कई प्रमुख सड़कों के किनारे ग्रीन बेल्ट में निर्माण मलबा डालने से हरियाली को ग्रहण लग रहा है।
फरीदाबाद में नई आवासीय परियोजनाओं, सड़क निर्माण, फ्लाईओवर, औद्योगिक विकास और पुराने भवनों के पुनर्निर्माण के साथ निर्माण एवं तोड़फोड़ का मलबा बढ़ रहा है। इसमें ईंट, पत्थर, कंक्रीट, सीमेंट, प्लास्टर, टाइल, सरिया और अन्य निर्माण सामग्री शामिल होती है। मलबे को अधिकृत स्थान तक पहुंचाने और उसके पुनर्चक्रण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से इसका बड़ा हिस्सा सड़क किनारे खाली जगहों और ग्रीन बेल्ट तक पहुंच रहा है।
मलबे की परत से मिट्टी और पौधों पर असर
निर्माण मलबे में ईंट, कंक्रीट और सीमेंट के भारी कण होते हैं। यह सामग्री लंबे समय तक मिट्टी पर पड़ी रहने से उसकी ऊपरी सतह को दबा सकती है। इससे बारिश का पानी जमीन में समाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। मलबे की मोटी परत के नीचे मिट्टी तक हवा और पानी की पहुंच कम होने से पौधों की जड़ों के विकास पर भी असर पड़ सकता है। फरीदाबाद में भूजल की स्थिति पहले से चिंताजनक है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2024 के आकलन में फरीदाबाद, फरीदाबाद अर्बन और बल्लभगढ़ भूजल इकाइयों को ओवर एक्सप्लॉइटेड श्रेणी में रखा गया है। तिगांव क्षेत्र क्रिटिकल श्रेणी में है। ऐसे में शहर के खुले और हरित क्षेत्रों को सुरक्षित रखना जल संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
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विशेषज्ञों के अनुसार साफ ईंट और कंक्रीट के मलबे तथा पेंट, प्लास्टर, प्लास्टिक, धातु या अन्य सामग्री मिले मलबे का प्रभाव अलग हो सकता है। बारिश के दौरान मलबे के महीन कण आसपास की मिट्टी में मिल सकते हैं। हालांकि इन ग्रीन बेल्ट पर पड़े मलबे से भूजल की गुणवत्ता प्रभावित होने की कोई स्थान-विशिष्ट आधिकारिक जांच रिपोर्ट अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए प्रभावित स्थानों की मिट्टी और आसपास के भूजल की वैज्ञानिक जांच कराना जरूरी है।
इन सड़कों के किनारे पड़ा है मलबा
सेक्टर-11 और 12 के मुख्य मार्ग, सूरजकुंड रोड, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के आसपास और दिल्ली-मथुरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर बाटा फ्लाईओवर के पास ग्रीन बेल्ट में ईंट, कंक्रीट, टाइल और मिट्टी के ढेर पड़े हैं। कई स्थानों पर मलबा केवल एक जगह जमा नहीं है बल्कि छोटे-बड़े ढेरों के रूप में ग्रीन बेल्ट के भीतर फैला हुआ है। इससे हरित पट्टी की जमीन असमान हो रही है और पौधरोपण के लिए उपलब्ध क्षेत्र कम हो रहा है।
प्रतिदिन करीब 300 टन मलबे का अनुमान
राष्ट्रीय हरित अधिकरण की निगरानी समिति की 2021 की रिपोर्ट में फरीदाबाद नगर निगम क्षेत्र में करीब 300 टन प्रतिदिन निर्माण एवं तोड़फोड़ का मलबा निकलने का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में मलबे के संग्रह, भंडारण और प्रसंस्करण की व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई थी। शहर में मलबे की मात्रा बढ़ने के बावजूद अभी पूर्ण क्षमता वाला स्थानीय प्रसंस्करण संयंत्र शुरू नहीं हो पाया है। नगर निगम पाली क्रशर जोन में सीएंडडी वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की प्रक्रिया में है। संयंत्र शुरू होने के बाद मलबे से ईंट, कंक्रीट और अन्य उपयोगी सामग्री अलग कर पुनर्चक्रित उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे। इनका उपयोग सड़क निर्माण, इंटरलॉकिंग टाइल, ब्लॉक और अन्य निर्माण कार्यों में किया जा सकता है।
150 करोड़ से अधिक की राशि हरियाली पर हो रही खर्च
शहर में ग्रीन बेल्ट को विकसित करने के लिए एफएमडीए की करीब 97 करोड़ रुपये की योजना चल रही है। इसमें प्रमुख सड़कों और ग्रीन कॉरिडोर के किनारे हरियाली विकसित करने, पौधे लगाने और ग्रीन बेल्ट को व्यवस्थित करने का प्रावधान है। वहीं दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस के किनारे मिनी जंगल विकसित करने की प्रक्रिया भी चल रही है। वहीं सराय से लेकर सीकरी तक दिल्ली मथुरा रोड पर हरियाली विकसित करने के कई प्रोजेक्ट चल रही है। सभी की लागत करीब 150 करोड़ के आस-पास है। वहीं नगर निगम की तरफ से भी अपने क्षेत्र में आने वाले इलाके में हरियाली विकसित करने, पार्कों को दोबारा विकसित करने के लिए करीब 50 करोड़ की लागत से अलग से काम किया जा रहा है।
सीएंडडी वेस्ट प्लांट के लिए कागजी प्रक्रिया पूरी करने के बाद फाइल मुख्यालय भेज दी गई है। वहां से मंजूरी के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। - मनदीप, कार्यकारी अभियंता, स्वच्छ भारत मिशन, नगर निगम
एचएसवीपी के क्षेत्र में आने वाली ग्रीन बेल्ट के लिए पेट्रोलिंग टीम की तैनाती की गई है। लगातार ग्रीन बेल्ट की निगरानी की जा रही है ताकि अतिक्रमण व मलबे जैसी समस्या न हो। - संदीप दहिया, अधीक्षण अभियंता एचएसवीपी
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150 करोड़ रुपये से अधिक की हरित परियोजनाएं चल रहीं
मोहित शुक्ला
फरीदाबाद। शहर को हरा-भरा बनाने के लिए 150 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। वहीं, दूसरी ओर कई प्रमुख सड़कों के किनारे ग्रीन बेल्ट में निर्माण मलबा डालने से हरियाली को ग्रहण लग रहा है।
फरीदाबाद में नई आवासीय परियोजनाओं, सड़क निर्माण, फ्लाईओवर, औद्योगिक विकास और पुराने भवनों के पुनर्निर्माण के साथ निर्माण एवं तोड़फोड़ का मलबा बढ़ रहा है। इसमें ईंट, पत्थर, कंक्रीट, सीमेंट, प्लास्टर, टाइल, सरिया और अन्य निर्माण सामग्री शामिल होती है। मलबे को अधिकृत स्थान तक पहुंचाने और उसके पुनर्चक्रण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से इसका बड़ा हिस्सा सड़क किनारे खाली जगहों और ग्रीन बेल्ट तक पहुंच रहा है।
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मलबे की परत से मिट्टी और पौधों पर असर
निर्माण मलबे में ईंट, कंक्रीट और सीमेंट के भारी कण होते हैं। यह सामग्री लंबे समय तक मिट्टी पर पड़ी रहने से उसकी ऊपरी सतह को दबा सकती है। इससे बारिश का पानी जमीन में समाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। मलबे की मोटी परत के नीचे मिट्टी तक हवा और पानी की पहुंच कम होने से पौधों की जड़ों के विकास पर भी असर पड़ सकता है। फरीदाबाद में भूजल की स्थिति पहले से चिंताजनक है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2024 के आकलन में फरीदाबाद, फरीदाबाद अर्बन और बल्लभगढ़ भूजल इकाइयों को ओवर एक्सप्लॉइटेड श्रेणी में रखा गया है। तिगांव क्षेत्र क्रिटिकल श्रेणी में है। ऐसे में शहर के खुले और हरित क्षेत्रों को सुरक्षित रखना जल संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
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विशेषज्ञों के अनुसार साफ ईंट और कंक्रीट के मलबे तथा पेंट, प्लास्टर, प्लास्टिक, धातु या अन्य सामग्री मिले मलबे का प्रभाव अलग हो सकता है। बारिश के दौरान मलबे के महीन कण आसपास की मिट्टी में मिल सकते हैं। हालांकि इन ग्रीन बेल्ट पर पड़े मलबे से भूजल की गुणवत्ता प्रभावित होने की कोई स्थान-विशिष्ट आधिकारिक जांच रिपोर्ट अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए प्रभावित स्थानों की मिट्टी और आसपास के भूजल की वैज्ञानिक जांच कराना जरूरी है।
इन सड़कों के किनारे पड़ा है मलबा
सेक्टर-11 और 12 के मुख्य मार्ग, सूरजकुंड रोड, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के आसपास और दिल्ली-मथुरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर बाटा फ्लाईओवर के पास ग्रीन बेल्ट में ईंट, कंक्रीट, टाइल और मिट्टी के ढेर पड़े हैं। कई स्थानों पर मलबा केवल एक जगह जमा नहीं है बल्कि छोटे-बड़े ढेरों के रूप में ग्रीन बेल्ट के भीतर फैला हुआ है। इससे हरित पट्टी की जमीन असमान हो रही है और पौधरोपण के लिए उपलब्ध क्षेत्र कम हो रहा है।
प्रतिदिन करीब 300 टन मलबे का अनुमान
राष्ट्रीय हरित अधिकरण की निगरानी समिति की 2021 की रिपोर्ट में फरीदाबाद नगर निगम क्षेत्र में करीब 300 टन प्रतिदिन निर्माण एवं तोड़फोड़ का मलबा निकलने का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में मलबे के संग्रह, भंडारण और प्रसंस्करण की व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई थी। शहर में मलबे की मात्रा बढ़ने के बावजूद अभी पूर्ण क्षमता वाला स्थानीय प्रसंस्करण संयंत्र शुरू नहीं हो पाया है। नगर निगम पाली क्रशर जोन में सीएंडडी वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की प्रक्रिया में है। संयंत्र शुरू होने के बाद मलबे से ईंट, कंक्रीट और अन्य उपयोगी सामग्री अलग कर पुनर्चक्रित उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे। इनका उपयोग सड़क निर्माण, इंटरलॉकिंग टाइल, ब्लॉक और अन्य निर्माण कार्यों में किया जा सकता है।
150 करोड़ से अधिक की राशि हरियाली पर हो रही खर्च
शहर में ग्रीन बेल्ट को विकसित करने के लिए एफएमडीए की करीब 97 करोड़ रुपये की योजना चल रही है। इसमें प्रमुख सड़कों और ग्रीन कॉरिडोर के किनारे हरियाली विकसित करने, पौधे लगाने और ग्रीन बेल्ट को व्यवस्थित करने का प्रावधान है। वहीं दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस के किनारे मिनी जंगल विकसित करने की प्रक्रिया भी चल रही है। वहीं सराय से लेकर सीकरी तक दिल्ली मथुरा रोड पर हरियाली विकसित करने के कई प्रोजेक्ट चल रही है। सभी की लागत करीब 150 करोड़ के आस-पास है। वहीं नगर निगम की तरफ से भी अपने क्षेत्र में आने वाले इलाके में हरियाली विकसित करने, पार्कों को दोबारा विकसित करने के लिए करीब 50 करोड़ की लागत से अलग से काम किया जा रहा है।
सीएंडडी वेस्ट प्लांट के लिए कागजी प्रक्रिया पूरी करने के बाद फाइल मुख्यालय भेज दी गई है। वहां से मंजूरी के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। - मनदीप, कार्यकारी अभियंता, स्वच्छ भारत मिशन, नगर निगम
एचएसवीपी के क्षेत्र में आने वाली ग्रीन बेल्ट के लिए पेट्रोलिंग टीम की तैनाती की गई है। लगातार ग्रीन बेल्ट की निगरानी की जा रही है ताकि अतिक्रमण व मलबे जैसी समस्या न हो। - संदीप दहिया, अधीक्षण अभियंता एचएसवीपी