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Delhi NCR News: निविदा प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं
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-सुप्रीम कोर्ट ने कहा, देरी को सिर्फ दिनों से नहीं बल्कि प्रक्रिया की प्रगति से आंकना होगा
राजीव सिन्हा
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो टूक कहा है कि सार्वजनिक खरीद से जुड़े टेंडर को अंतिम चरण में पहुंचने के बाद चुनौती देना स्वीकार नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों में देरी को केवल कैलेंडर के दिनों से नहीं आंका जा सकता। यह देखना जरूरी है कि टेंडर प्रक्रिया कितनी आगे बढ़ चुकी है, किन पक्षों के अधिकार और हित विकसित हो चुके हैं तथा प्रक्रिया में हस्तक्षेप से जनहित पर क्या असर पड़ेगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक विवेक का इस्तेमाल बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए ताकि अंतिम चरण में पहुंची निविदा प्रक्रिया को फेंस-सिटर्स, प्रॉक्सी या अनुचित मुकदमेबाजी के जरिए बाधित न किया जा सके। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने ये टिप्पणी करते हुए दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा सरकारी स्कूलों और खेल केंद्रों के लिए खेल सामग्री एवं आउटडोर जिम उपकरण खरीदने के टेंडर से जुड़ी अपीलें खारिज कर दीं। पीठ ने कहा कि छह स्पोर्ट्स इक्विपमेंट टेंडर 22 दिसंबर 2025 को जारी हुए थे जबकि याचिकाकर्ताओं ने 1 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट का रुख किया। तब तक एक टेंडर का आवंटन हो चुका था और बाकी टेंडर तकनीकी मूल्यांकन के दूसरे चरण में पहुंच चुके थे।
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जिस दिन शर्त प्रकाशित हो, पात्रता को चुनौती उसी दिन पैदा होती है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टेंडर की पात्रता शर्त को चुनौती उसी दिन पैदा होती है, जिस दिन वह शर्त प्रकाशित होती है। यदि किसी कंपनी को लगता है कि शर्त मनमानी या असंवैधानिक है और वह उसे चुनौती देना चाहती है तो उसे जल्द से जल्द अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पात्रता शर्तों की जानकारी शुरू से थी। समस्या जानकारी की कमी नहीं बल्कि दृढ़ता और तत्परता की कमी थी। अदालत ने यह भी कहा कि जिन कंपनियों ने सभी शर्तें पूरी कर तकनीकी मूल्यांकन पार किया और अंतिम वित्तीय मूल्यांकन के करीब पहुंचीं, उन्होंने कुछ अधिकार और हित अर्जित कर लिए थे। ऐसे में बाद में पहुंचने वाले पक्ष के लिए पूरी प्रक्रिया रोकना अनुचित होगा।
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यह सिर्फ दो व्यावसायिक पक्षों के बीच विवाद नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यह केवल दो व्यावसायिक पक्षों के बीच विवाद नहीं है। टेंडर के दूसरे छोर पर सरकारी स्कूलों के बच्चे हैं। करीब 34 करोड़ रुपये की खेल एवं जिम सामग्री लगभग 16 लाख विद्यार्थियों के लिए खरीदी जानी थी और मुकदमे के कारण इसका बड़ा हिस्सा रुक गया था।
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राजीव सिन्हा
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो टूक कहा है कि सार्वजनिक खरीद से जुड़े टेंडर को अंतिम चरण में पहुंचने के बाद चुनौती देना स्वीकार नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों में देरी को केवल कैलेंडर के दिनों से नहीं आंका जा सकता। यह देखना जरूरी है कि टेंडर प्रक्रिया कितनी आगे बढ़ चुकी है, किन पक्षों के अधिकार और हित विकसित हो चुके हैं तथा प्रक्रिया में हस्तक्षेप से जनहित पर क्या असर पड़ेगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक विवेक का इस्तेमाल बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए ताकि अंतिम चरण में पहुंची निविदा प्रक्रिया को फेंस-सिटर्स, प्रॉक्सी या अनुचित मुकदमेबाजी के जरिए बाधित न किया जा सके। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने ये टिप्पणी करते हुए दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा सरकारी स्कूलों और खेल केंद्रों के लिए खेल सामग्री एवं आउटडोर जिम उपकरण खरीदने के टेंडर से जुड़ी अपीलें खारिज कर दीं। पीठ ने कहा कि छह स्पोर्ट्स इक्विपमेंट टेंडर 22 दिसंबर 2025 को जारी हुए थे जबकि याचिकाकर्ताओं ने 1 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट का रुख किया। तब तक एक टेंडर का आवंटन हो चुका था और बाकी टेंडर तकनीकी मूल्यांकन के दूसरे चरण में पहुंच चुके थे।
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जिस दिन शर्त प्रकाशित हो, पात्रता को चुनौती उसी दिन पैदा होती है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टेंडर की पात्रता शर्त को चुनौती उसी दिन पैदा होती है, जिस दिन वह शर्त प्रकाशित होती है। यदि किसी कंपनी को लगता है कि शर्त मनमानी या असंवैधानिक है और वह उसे चुनौती देना चाहती है तो उसे जल्द से जल्द अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पात्रता शर्तों की जानकारी शुरू से थी। समस्या जानकारी की कमी नहीं बल्कि दृढ़ता और तत्परता की कमी थी। अदालत ने यह भी कहा कि जिन कंपनियों ने सभी शर्तें पूरी कर तकनीकी मूल्यांकन पार किया और अंतिम वित्तीय मूल्यांकन के करीब पहुंचीं, उन्होंने कुछ अधिकार और हित अर्जित कर लिए थे। ऐसे में बाद में पहुंचने वाले पक्ष के लिए पूरी प्रक्रिया रोकना अनुचित होगा।
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यह सिर्फ दो व्यावसायिक पक्षों के बीच विवाद नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यह केवल दो व्यावसायिक पक्षों के बीच विवाद नहीं है। टेंडर के दूसरे छोर पर सरकारी स्कूलों के बच्चे हैं। करीब 34 करोड़ रुपये की खेल एवं जिम सामग्री लगभग 16 लाख विद्यार्थियों के लिए खरीदी जानी थी और मुकदमे के कारण इसका बड़ा हिस्सा रुक गया था।