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इलाज के लिए भर्ती जरूरी नहीं : बीमा कंपनी उपचार कैसे हो, फैसला डॉक्टर लेगा : आयोग
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क्लेम निरस्त करने वाली बीमा कंपनी को लौटाना होगा इलाज का खर्च
जिला उपभोक्ता आयोग
संवाद न्यूज एजेंसी
ग्रेटर नोएडा। बीमित व्यक्ति के इलाज में हुए खर्चे का पैसा बीमा कंपनी को भुगतान करना होगा। ‘इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना जरूरी नहीं था’ का बीमा कंपनी का तर्क जिला उपभोक्ता आयोग ने खारिज कर दिया है। आयोग ने कहा कि इस तर्क के आधार पर वह बीमित का क्लेम निरस्त नहीं कर सकती।
ग्रेटर नोएडा वेस्ट के शहबेरी निवासी राजेश कुमार ने केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड से परिवार के लिए हेल्थ पॉलिसी ली थी। इसमें वह स्वयं, पत्नी और दो बच्चे बीमाकृत थे। पॉलिसी नौ अप्रैल 2023 से 8 अप्रैल 2024 तक वैध थी। उनकी पत्नी बबीता गौर घर में फिसलकर गिर गईं, जिस कारण उनके कमर, गर्दन और पैरों में दर्द रहने लगा। उन्होंने पांच जून 2023 को फोर्टिस नोएडा में दिखाया तो डॉक्टरों ने कहा कि अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा। लेकिन जब इस बात की सूचना परिवार ने बीमा कंपनी को दी तो उसने कहा कि इसके लिए अस्पतालत में भर्ती कराने की जरूरत नहीं है और अस्पताल में इस दौरान खर्च हुए 153709 रुपये का भुगतान कंपनी ने देने से मना कर दिया।
बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि बीमित का इलाज ओपीडी में हो सकता था। इसके लिए उसे अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं थी। हालांकि आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद माना कि निश्चित रूप से एमआरआई में कोई अनियमितता नहीं पाई गई, लेकिन उपचार के लिए भर्ती करना जरूरी है या नहीं इसका फैसला डॉक्टर ही ले सकते हैं। इस आधार पर बीमा कंपनी क्लेम निरस्त नहीं कर सकतीं। आयोग ने इलाज में खर्च हुए 153709 रुपये को 6 फीसदी ब्याज के साथ 30 दिन में भुगतान करने के आदेश दिए हैं। बीमा कंपनी को इसके साथ ही वाद व्यय के पांच हजार रुपये भी देने होंगे।
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जिला उपभोक्ता आयोग
संवाद न्यूज एजेंसी
ग्रेटर नोएडा। बीमित व्यक्ति के इलाज में हुए खर्चे का पैसा बीमा कंपनी को भुगतान करना होगा। ‘इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना जरूरी नहीं था’ का बीमा कंपनी का तर्क जिला उपभोक्ता आयोग ने खारिज कर दिया है। आयोग ने कहा कि इस तर्क के आधार पर वह बीमित का क्लेम निरस्त नहीं कर सकती।
ग्रेटर नोएडा वेस्ट के शहबेरी निवासी राजेश कुमार ने केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड से परिवार के लिए हेल्थ पॉलिसी ली थी। इसमें वह स्वयं, पत्नी और दो बच्चे बीमाकृत थे। पॉलिसी नौ अप्रैल 2023 से 8 अप्रैल 2024 तक वैध थी। उनकी पत्नी बबीता गौर घर में फिसलकर गिर गईं, जिस कारण उनके कमर, गर्दन और पैरों में दर्द रहने लगा। उन्होंने पांच जून 2023 को फोर्टिस नोएडा में दिखाया तो डॉक्टरों ने कहा कि अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा। लेकिन जब इस बात की सूचना परिवार ने बीमा कंपनी को दी तो उसने कहा कि इसके लिए अस्पतालत में भर्ती कराने की जरूरत नहीं है और अस्पताल में इस दौरान खर्च हुए 153709 रुपये का भुगतान कंपनी ने देने से मना कर दिया।
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बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि बीमित का इलाज ओपीडी में हो सकता था। इसके लिए उसे अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं थी। हालांकि आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद माना कि निश्चित रूप से एमआरआई में कोई अनियमितता नहीं पाई गई, लेकिन उपचार के लिए भर्ती करना जरूरी है या नहीं इसका फैसला डॉक्टर ही ले सकते हैं। इस आधार पर बीमा कंपनी क्लेम निरस्त नहीं कर सकतीं। आयोग ने इलाज में खर्च हुए 153709 रुपये को 6 फीसदी ब्याज के साथ 30 दिन में भुगतान करने के आदेश दिए हैं। बीमा कंपनी को इसके साथ ही वाद व्यय के पांच हजार रुपये भी देने होंगे।