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VIDEO: पुरानी दिल्ली का ऐतिहासिक 'काला ताजिया' जुलूस संपन्न, लाखों अजादारों ने दी शहजादा-ए-मुहम्मद को पुरसा
Fri, 21 Aug 2026 10:32 PM IST
विकास कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: विकास कुमार
Updated Fri, 21 Aug 2026 10:32 PM IST
सार
जुलूस के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए थे। दिल्ली पुलिस और प्रशासन की निगरानी में पूरा जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से अपने निर्धारित मार्ग से आगे बढ़ा। रास्ते में जगह-जगह लोगों ने अजादारों के लिए पानी और सबील का भी इंतजाम किया।
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'काला ताजिया' जुलूस संपन्न
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली में गुरुवार को 7 रबी-उल-अव्वल के अवसर पर पुरानी दिल्ली का ऐतिहासिक 'काला ताजिया' जुलूस अकीदत और एहतराम के साथ निकाला गया। यह वर्षों पुरानी परंपरा वाला जुलूस सुबह लगभग 11 बजे चांदनी चौक स्थित जामा मस्जिद क्षेत्र से शुरू हुआ। बड़ी संख्या में अजादारों ने इमाम हुसैन और करबला के शहीदों की याद में मातम और नौहाख़्वानी करते हुए इस जुलूस में शिरकत की।
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जुलूस अपने कदीमी रास्ते से गुजरते हुए चावड़ी बाजार, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, कनॉट प्लेस, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट, अशोका रोड और लोदी कल्याण मार्ग से होता हुआ जोर बाग पहुंचा, जहां धार्मिक परंपरा के अनुसार ताजिए को दफन किया गया।
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इस ऐतिहासिक जुलूस में करीब दो लाख अजादारों की मौजूदगी बताई गई। दिल्ली ही नहीं, बल्कि आसपास के कई इलाकों से भी लोग इस जुलूस में शामिल होने पहुंचे। पूरे रास्ते "या हुसैन" की सदाओं के बीच अजादारों ने मातम कर हजरत इमाम हुसैन को पुरसा पेश किया और करबला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत अर्पित किया।
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जुलूस के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए थे। दिल्ली पुलिस और प्रशासन की निगरानी में पूरा जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से अपने निर्धारित मार्ग से आगे बढ़ा। रास्ते में जगह-जगह लोगों ने अजादारों के लिए पानी और सबील का भी इंतजाम किया।
'काला ताजिया' दिल्ली की अजादारी की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक परंपराओं में से एक माना जाता है। हर वर्ष 7 रबी-उल-अव्वल के अवसर पर निकलने वाला यह जुलूस राजधानी की गंगा-जमुनी तहजीब और धार्मिक सौहार्द की एक महत्वपूर्ण मिसाल पेश करता है। इस जुलूस में शामिल होकर अजादार करबला के पैगाम-सच्चाई, इंसाफ, सब्र और कुर्बानी को याद करते हैं।
जोर बाग में ताजिए के दफन होने के साथ यह ऐतिहासिक जुलूस अपने अंतिम चरण में पहुंचा। अजादारों ने दुआओं और मातम के साथ इस धार्मिक आयोजन का समापन किया और इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानी को श्रद्धापूर्वक याद किया। राजधानी दिल्ली में निकला यह 'काला ताजिया' जुलूस एक बार फिर अपनी विशाल भागीदारी और अनुशासित आयोजन के कारण चर्चा का केंद्र बना।