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Delhi NCR News: 3.3 करोड़ आबादी के लिए सिर्फ 71 फायर स्टेशन, चार मिनट में मदद पहुंचाना चुनौती
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3.3 करोड़ आबादी के लिए सिर्फ 71 फायर स्टेशन, चार मिनट में मदद पहुंचाना चुनौती
-- मालवीय नगर अग्निकांड के बाद हुई समीक्षा बैठक में सामने आईं दिल्ली फायर सर्विस की बड़ी कमियां, स्टाफ, वाहन और उपकरणों की भारी कमी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में आग लगने की घटनाओं से निपटने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 3.3 करोड़ से अधिक आबादी वाले शहर में आग से निपटने के लिए केवल 71 फायर स्टेशन हैं। यानी औसतन एक फायर स्टेशन पर करीब 4.6 लाख लोगों की जिम्मेदारी है। घनी आबादी, संकरी गलियों और अनधिकृत कॉलोनियों के कारण कई इलाकों में आग लगने की स्थिति में दमकल वाहनों का समय पर पहुंचना बड़ी चुनौती है।
मालवीय नगर स्थित गेस्ट हाउस में आग लगने से 22 लोगों की मौत के बाद सोमवार को दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) की बैठक में राजधानी की अग्निशमन व्यवस्था की समीक्षा की गई। उपराज्यपाल टीएस संधू की अध्यक्षता में हुई बैठक में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। बैठक में प्रस्तुत आंतरिक दस्तावेज के अनुसार दिल्ली का जनसंख्या घनत्व 11,320 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। ऐसे में अनधिकृत और घनी बस्तियों में आग लगने पर उसके तेजी से फैलने का खतरा बढ़ जाता है। दस्तावेज में कहा गया है कि कई मामलों में दमकल दल आग लगने के बाद के सबसे महत्वपूर्ण चार मिनट के भीतर मौके तक नहीं पहुंच पाता, जिससे आग और अधिक फैल जाती है तथा जनहानि का जोखिम बढ़ जाता है।
हर साल 20 हजार आग की घटनाएं
दिल्ली फायर सर्विस (डीएफएस) हर वर्ष 20 हजार से अधिक अग्निकांड संबंधी कॉल पर कार्रवाई करती है। इसके बावजूद विभाग संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। दस्तावेज के अनुसार दिल्ली में हर साल आग की घटनाओं में 250 से 300 लोगों की मौत होती है। आग लगने के प्रमुख कारणों में बिजली का अत्यधिक लोड, अग्नि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन और ज्वलनशील पदार्थों का अवैध भंडारण शामिल हैं। समीक्षा के दौरान यह भी सामने आया कि फायर विभाग में 9,123 अतिरिक्त कर्मियों की तत्काल आवश्यकता है। विभाग में स्वीकृत 3,363 पदों में बड़ी संख्या में रिक्तियां हैं। परिचालन से जुड़े 74 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, जिससे फायर स्टेशनों की क्षमता प्रभावित हो रही है। अधिकारियों ने बैठक में बताया कि विभाग की संचार प्रणाली को मजबूत करने, सेवाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने, अग्निशमन उपकरणों और वाहनों की संख्या बढ़ाने, पुलिस के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा होमगार्ड जवानों को भी अग्निशमन प्रशिक्षण देने की दिशा में काम किया जा रहा है। उपराज्यपाल ने रिक्त पदों को भरने के लिए पूर्व अग्निवीरों की सेवाएं लेने का सुझाव भी दिया।
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इसलिए चार मिनट में नहीं पहुंच पाती है दमकल
राजधानी की बड़ी आबादी अनधिकृत कॉलोनियों, पुनर्वास बस्तियों और घनी रिहायशी बस्तियों में रहती है। इन इलाकों में संकरी गलियां, अवैध निर्माण, पार्किंग का दबाव और ट्रैफिक जाम दमकल वाहनों की आवाजाही में बाधा बनते हैं। डीडीएमए के अनुसार आग लगने के बाद शुरुआती चार मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन कई मामलों में इसी अवधि के भीतर दमकल दल का घटनास्थल तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता। यही देरी आग को बड़े हादसे में बदल देती है।
-- दिल्ली में केवल 71 फायर स्टेशन संचालित।
-- 3.3 करोड़ से अधिक आबादी की जिम्मेदारी।
-- 9,123 अतिरिक्त कर्मियों की तत्काल जरूरत।
-- परिचालन स्टाफ के 74% पद रिक्त
-- 38 एरियल लैडर प्लेटफॉर्म की जरूरत, उपलब्ध सिर्फ 4
-- 86 वाटर टेंडर और 54 वाटर बाउजर की कमी
-- 57 मल्टी-यूटिलिटी वाहन और 22 कमांड वाहन कम
-- 334 वाहनों के बेड़े में सिर्फ 260 वाहन चालू हालत में
-- 89 वाहन मरम्मत की प्रतीक्षा में, 15 वाहन बदले जाने योग्य
-- हर साल 20 हजार से अधिक अग्निकांड संबंधी कॉल
-- आग की घटनाओं में 250 से 300 लोगों की सालाना मौत
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में आग लगने की घटनाओं से निपटने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 3.3 करोड़ से अधिक आबादी वाले शहर में आग से निपटने के लिए केवल 71 फायर स्टेशन हैं। यानी औसतन एक फायर स्टेशन पर करीब 4.6 लाख लोगों की जिम्मेदारी है। घनी आबादी, संकरी गलियों और अनधिकृत कॉलोनियों के कारण कई इलाकों में आग लगने की स्थिति में दमकल वाहनों का समय पर पहुंचना बड़ी चुनौती है।
मालवीय नगर स्थित गेस्ट हाउस में आग लगने से 22 लोगों की मौत के बाद सोमवार को दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) की बैठक में राजधानी की अग्निशमन व्यवस्था की समीक्षा की गई। उपराज्यपाल टीएस संधू की अध्यक्षता में हुई बैठक में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। बैठक में प्रस्तुत आंतरिक दस्तावेज के अनुसार दिल्ली का जनसंख्या घनत्व 11,320 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। ऐसे में अनधिकृत और घनी बस्तियों में आग लगने पर उसके तेजी से फैलने का खतरा बढ़ जाता है। दस्तावेज में कहा गया है कि कई मामलों में दमकल दल आग लगने के बाद के सबसे महत्वपूर्ण चार मिनट के भीतर मौके तक नहीं पहुंच पाता, जिससे आग और अधिक फैल जाती है तथा जनहानि का जोखिम बढ़ जाता है।
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हर साल 20 हजार आग की घटनाएं
दिल्ली फायर सर्विस (डीएफएस) हर वर्ष 20 हजार से अधिक अग्निकांड संबंधी कॉल पर कार्रवाई करती है। इसके बावजूद विभाग संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। दस्तावेज के अनुसार दिल्ली में हर साल आग की घटनाओं में 250 से 300 लोगों की मौत होती है। आग लगने के प्रमुख कारणों में बिजली का अत्यधिक लोड, अग्नि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन और ज्वलनशील पदार्थों का अवैध भंडारण शामिल हैं। समीक्षा के दौरान यह भी सामने आया कि फायर विभाग में 9,123 अतिरिक्त कर्मियों की तत्काल आवश्यकता है। विभाग में स्वीकृत 3,363 पदों में बड़ी संख्या में रिक्तियां हैं। परिचालन से जुड़े 74 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, जिससे फायर स्टेशनों की क्षमता प्रभावित हो रही है। अधिकारियों ने बैठक में बताया कि विभाग की संचार प्रणाली को मजबूत करने, सेवाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने, अग्निशमन उपकरणों और वाहनों की संख्या बढ़ाने, पुलिस के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा होमगार्ड जवानों को भी अग्निशमन प्रशिक्षण देने की दिशा में काम किया जा रहा है। उपराज्यपाल ने रिक्त पदों को भरने के लिए पूर्व अग्निवीरों की सेवाएं लेने का सुझाव भी दिया।
इसलिए चार मिनट में नहीं पहुंच पाती है दमकल
राजधानी की बड़ी आबादी अनधिकृत कॉलोनियों, पुनर्वास बस्तियों और घनी रिहायशी बस्तियों में रहती है। इन इलाकों में संकरी गलियां, अवैध निर्माण, पार्किंग का दबाव और ट्रैफिक जाम दमकल वाहनों की आवाजाही में बाधा बनते हैं। डीडीएमए के अनुसार आग लगने के बाद शुरुआती चार मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन कई मामलों में इसी अवधि के भीतर दमकल दल का घटनास्थल तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता। यही देरी आग को बड़े हादसे में बदल देती है।