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Delhi NCR News: दबे पांव कम उम्र के लोगों को शिकार बना रहा पार्किंसंस

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 10 Apr 2026 10:16 PM IST
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जीवनशैली, पर्यावरण और जेनेटिक कारणों के बीच संभावित संबंधों की जांच जारी
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। देश में पार्किंसंस रोग की तस्वीर तेजी से बदल रही है। कभी बढ़ती उम्र से जुड़ी मानी जाने वाली यह बीमारी अब युवाओं को भी अपनी चपेट में लेने लगी है। पिछले कुछ वर्षों में 30 से 40 वर्ष के लोगों में भी इसके शुरुआती लक्षणों में वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञ इसे एक चुनौती के रूप में देख रहे हैं। वे जीवनशैली, पर्यावरण और जेनेटिक कारणों के बीच संभावित संबंधों की जांच कर रहे हैं।

एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. इलावरसी ने बताया कि हालिया शोध से संकेत मिले हैं कि 50 वर्ष से कम उम्र के लगभग 20 प्रतिशत मरीजों में इस बीमारी का संबंध जेनेटिक कारणों से हो सकता है। हालांकि, जेनेटिक होने का अर्थ यह नहीं है कि बीमारी हमेशा विरासत में ही मिली हो। वहीं, न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि कई मामलों में जीन में स्वतः बदलाव (स्पॉन्टेनियस म्यूटेशन) भी इसकी वजह हो सकते हैं, जबकि कुछ मामलों में यह ऑटोसोमल रिसेसिव पैटर्न से जुड़ा होता है।
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आरबीडी हो सकता है एक लक्षण
डॉ. मंजरी ने एक महत्वपूर्ण शुरुआती संकेत की ओर भी ध्यान दिलाया है, जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। आरईएम स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर (आरबीडी) नामक स्थिति में व्यक्ति सपनों के दौरान शारीरिक हरकत करने लगता है, जिससे कभी-कभी हिंसक व्यवहार भी देखने को मिलता है। शोध बताते हैं कि यह स्थिति भविष्य में पार्किंसंस जैसी बीमारियों का संकेत हो सकती है।
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लक्षण:
हाथ, पैर या उंगलियों में कंपन
शरीर की जकड़न
चलने में धीमापन
संतुलन बिगड़ना
लिखावट छोटी होना
चेहरे के भाव कम होना
नींद की समस्या
डिप्रेशन और चिंता
सूंघने की क्षमता कम होना
कब्ज
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कारण:
दिमाग में डोपामिन बनाने वाली कोशिकाओं का नष्ट होना
जेनेटिक कारण: कुछ मामलों में जीन में बदलाव
पर्यावरणीय कारण: कीटनाशक, जहरीले रसायन
उम्र: बढ़ती उम्र के साथ जोखिम बढ़ता है
शरीर में एंटीऑक्सीडेंट की कमी

बचाव और सावधानियां:
नियमित व्यायाम
संतुलित आहार
पर्याप्त नींद
समय-समय पर डॉक्टर से जांच
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