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Delhi NCR News: चुप्पी बन रही खतरा... महिलाओं में बढ़ रहे डिप्रेशन और एंजायटी के मामले
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- तनाव और मानसिक दबाव से जूझ रही महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य को लेकर झिझक से बढ़ रही समस्या
- घरेलू और कार्यस्थल का दबाव बन रहा बड़ा कारण, समय पर इलाज न मिलने से बढ़ता है खतरा
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। शहर में महिलाओं के बीच डिप्रेशन, एंजायटी और घरेलू तनाव के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि अधिकांश महिलाएं इलाज लेने से हिचक रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सामाजिक दबाव, परिवार की जिम्मेदारियां और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर झिझक के कारण महिलाएं अपनी समस्या को दबा रही हैं।
केस स्टडी-1 जिम्मेदारियों के बोझ से टूटी गृहिणी
पूर्वी दिल्ली की 32 वर्षीय गृहिणी पिछले एक साल से लगातार तनाव में थीं। परिवार की जिम्मेदारियां और आर्थिक तंगी के चलते उन्हें नींद न आना, घबराहट और चिड़चिड़ापन होने लगा। शुरुआत में उन्होंने इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज किया, लेकिन हालत बिगड़ने पर डॉक्टर से संपर्क किया गया, जहां उन्हें डिप्रेशन का मरीज पाया गया।
केस स्टडी-2 नौकरी और घर के बीच फंसी कामकाजी महिला
एक निजी कंपनी में कार्यरत 28 वर्षीय महिला ऑफिस के दबाव और घर की जिम्मेदारियों के कारण लगातार तनाव में रहने लगीं। धीरे-धीरे उनमें एंजायटी के लक्षण दिखने लगे दिल की धड़कन तेज होना, बेचैनी और काम में मन न लगना। काफी समय तक उन्होंने किसी से बात नहीं की, लेकिन हालत गंभीर होने पर उन्हें काउंसलिंग की जरूरत पड़ी।
इलाज से ज्यादा छिपाने की कोशिश
डॉक्टरों का कहना है कि कई महिलाएं मानसिक परेशानी को बीमारी मानने के बजाय इसे नजरअंदाज करती हैं। कई मामलों में वे परिवार या समाज के डर से अपनी स्थिति साझा नहीं करतीं। इससे समस्या और गंभीर हो जाती है और समय पर इलाज नहीं मिल पाता। नींद न आना, चिड़चिड़ापन, लगातार उदासी, थकान और किसी काम में मन न लगना ये सभी डिप्रेशन और एंजायटी के शुरुआती लक्षण हैं। लेकिन जानकारी के अभाव में महिलाएं इन्हें सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देती हैं।
समय पर काउंसलिंग, परिवार का सहयोग और खुलकर बातचीत करना बेहद जरूरी है। यदि लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि देरी से समस्या गंभीर रूप ले सकती है। - डॉ. ओम प्रकाश, वरिष्ठ मनोचिकित्सक,मानव व्यवहार व संबद्ध संस्थान
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- घरेलू और कार्यस्थल का दबाव बन रहा बड़ा कारण, समय पर इलाज न मिलने से बढ़ता है खतरा
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नई दिल्ली। शहर में महिलाओं के बीच डिप्रेशन, एंजायटी और घरेलू तनाव के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि अधिकांश महिलाएं इलाज लेने से हिचक रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सामाजिक दबाव, परिवार की जिम्मेदारियां और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर झिझक के कारण महिलाएं अपनी समस्या को दबा रही हैं।
केस स्टडी-1 जिम्मेदारियों के बोझ से टूटी गृहिणी
पूर्वी दिल्ली की 32 वर्षीय गृहिणी पिछले एक साल से लगातार तनाव में थीं। परिवार की जिम्मेदारियां और आर्थिक तंगी के चलते उन्हें नींद न आना, घबराहट और चिड़चिड़ापन होने लगा। शुरुआत में उन्होंने इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज किया, लेकिन हालत बिगड़ने पर डॉक्टर से संपर्क किया गया, जहां उन्हें डिप्रेशन का मरीज पाया गया।
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केस स्टडी-2 नौकरी और घर के बीच फंसी कामकाजी महिला
एक निजी कंपनी में कार्यरत 28 वर्षीय महिला ऑफिस के दबाव और घर की जिम्मेदारियों के कारण लगातार तनाव में रहने लगीं। धीरे-धीरे उनमें एंजायटी के लक्षण दिखने लगे दिल की धड़कन तेज होना, बेचैनी और काम में मन न लगना। काफी समय तक उन्होंने किसी से बात नहीं की, लेकिन हालत गंभीर होने पर उन्हें काउंसलिंग की जरूरत पड़ी।
इलाज से ज्यादा छिपाने की कोशिश
डॉक्टरों का कहना है कि कई महिलाएं मानसिक परेशानी को बीमारी मानने के बजाय इसे नजरअंदाज करती हैं। कई मामलों में वे परिवार या समाज के डर से अपनी स्थिति साझा नहीं करतीं। इससे समस्या और गंभीर हो जाती है और समय पर इलाज नहीं मिल पाता। नींद न आना, चिड़चिड़ापन, लगातार उदासी, थकान और किसी काम में मन न लगना ये सभी डिप्रेशन और एंजायटी के शुरुआती लक्षण हैं। लेकिन जानकारी के अभाव में महिलाएं इन्हें सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देती हैं।
समय पर काउंसलिंग, परिवार का सहयोग और खुलकर बातचीत करना बेहद जरूरी है। यदि लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि देरी से समस्या गंभीर रूप ले सकती है। - डॉ. ओम प्रकाश, वरिष्ठ मनोचिकित्सक,मानव व्यवहार व संबद्ध संस्थान