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आबकारी नीति पर कैग रिपोर्ट: दिल्ली में दो हजार करोड़ का नुकसान, बोलीदाताओं को पहुंचाया गया फायदा; पूरा अपडेट
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Rahul Kumar Tiwari
Updated Mon, 23 Mar 2026 09:24 PM IST
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सार
पीएसी ने कैग रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली की आबकारी नीति में गंभीर अनियमितताएं उजागर कीं। जांच में 2,026.91 करोड़ के राजस्व नुकसान का अनुमान है। आरोप है कि कुछ बोलीदाताओं को लाभ देने के लिए नीति में बदलाव किए गए, जिससे सरकार को अपेक्षित कमाई नहीं हुई।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : AI
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विस्तार
विधानसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने सोमवार को सदन में कैग की दूसरी रिपोर्ट पेश की, जिसमें आबकारी विभाग की शराब नीति को भ्रष्टाचार का अड्डा करार दिया। सीएजी की 2024 रिपोर्ट (रिपोर्ट संख्या 1) पर आधारित जांच में दिल्ली सरकार को लगभग 2,026.91 करोड़ रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान हुआ। पीएसी ने पाया कि कुछ बोलीदाताओं को फायदा पहुंचाने के लिए नीति में बदलाव भी किए गए।
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सीएजी ने 2017-18 से 2020-21 तक की चार वर्षों की निष्पादन ऑडिट की थी, जिसे 2021-22 की नई आबकारी नीति और एक सितंबर 2022 की पुरानी नीति की वापसी तक बढ़ाया गया। पीएसी अध्यक्ष अजय महावर ने रिपोर्ट सदन में रखते हुए कहा, नीति 2021-22 का उद्देश्य राजस्व बढ़ाना और उपभोक्ता अनुभव सुधारना था लेकिन नतीजा उल्टा निकला। नई नीति से 8.9 हजार करोड़ की कमाई का दावा किया गया था, लेकिन राज्य को दो हजार करोड़ का नुकसान हुआ।
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ऑडिट ने एक्साइज सप्लाई चेन इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम (ईएससीआईएमएस) से लेकर लाइसेंस जारी करने, मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता नियंत्रण तक हर कड़ी में गंभीर खामियां उजागर कीं। कुल 59 लाइसेंसधारियों की जांच में 13 के रिकॉर्ड विभाग से गायब मिले। विभाग ने ऑडिट टीम को फाइलें उपलब्ध नहीं कराईं। जांच बताती है कि 17 नवंबर 2021 से लागू नीति ने सिंडिकेट और कार्टेल गठन को भी बढ़ावा दिया। नीति अगस्त 2022 में वापस ले ली गई, लेकिन आज भी सीबीआई और ईडी की जांच में हैं।
सरकारी निगमों को खुदरा दुकानों से पूरी तरह हटा दिया गया, थोक लाइसेंस 14 निजी इकाइयों को दे दिए गए (पुरानी नीति में 77 निर्माताओं को दिए जाते थे)। इससे एकाधिकार और मिलीभगत की आशंका बढ़ गई। सीएजी ऑडिट ने नीति के कई प्रावधानों पर सवाल उठाए। सबसे बड़ा मुद्दा कार्टेल गठन था। नीति में थोक लाइसेंस के लिए जो शर्तें रखी गईं, वह जीओएम की सिफारिशों के विपरीत थीं। समिति के अध्यक्ष अजय महावर ने कहा कि यह घोटाला आंकड़ों का नहीं बल्कि उन लाखों बोतलों की कहानी है जो बिना ट्रैकिंग, बिना गुणवत्ता जांच और बिना टैक्स चुकाए दिल्ली की सड़कों पर पहुंचीं।
136 करोड़ बारकोड बायपास, 25 करोड़ बारकोड का हिसाब नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, 28 प्रतिशत बिक्री यानी 136.53 करोड़ बारकोड स्टॉक-टेक-सोल्ड अभ्यास से सिस्टम को बायपास कर बेचे गए। 21 प्रतिशत बिक्री पीओएस (पॉइंट ऑफ सेल) पर स्कैन ही नहीं हुई। 2019 में मासिक स्टॉक रियलाइजेशन में 30.87 प्रतिशत अंतर था। कुछ वेंडरों ने 70-98 प्रतिशत शराब बिना स्कैन किए बेच दी। 25.70 करोड़ बारकोड का हिसाब नहीं है। इससे बिना एक्साइज ड्यूटी चुकाए शराब तस्करी, कालाबाजारी को बढ़ावा मिला। समिति ने कहा, विभाग ने ट्रेनिंग की कमी और पुराने बारकोड का बहाना बनाया। असल में निगरानी व्यवस्था फेल थी।
एक ही आदमी को कई लाइसेंस
लेखा समिति की दूसरी रिपोर्ट में दावा किया गया कि दिल्ली आबकारी नियम 2010 के नियम 35 का उल्लंघन कर एक व्यक्ति को कई लाइसेंस दिए गए। पुलिस वेरिफिकेशन के बजाय सेल्फ-अफिडेविट पर भरोसा किया गया। एक लाइसेंसधारी पर एफआईआर दर्ज होने के बावजूद मात्र आठ लाख का जुर्माना लगाकर काम चला लिया गया। एल-1 लाइसेंस का नवीनीकरण तब किया गया जब उसने 46 % शराब जमा की थी। एल-1एफ लाइसेंसधारियों ने बैलेंस शीट जमा नहीं की, फिर भी लाइसेंस जारी हो गए। सीसीटीवी कैमरे, 15-सूत्रीय घोषणाएं और फायर इंश्योरेंस तक की शर्तें पूरी नहीं हुईं। समिति ने पूछा कि क्या विभाग सोया हुआ था या जानबूझकर आंखें बंद कर ली थीं?
सरकारी निगमों को खुदरा दुकानों से पूरी तरह हटा दिया गया, थोक लाइसेंस 14 निजी इकाइयों को दे दिए गए (पुरानी नीति में 77 निर्माताओं को दिए जाते थे)। इससे एकाधिकार और मिलीभगत की आशंका बढ़ गई। सीएजी ऑडिट ने नीति के कई प्रावधानों पर सवाल उठाए। सबसे बड़ा मुद्दा कार्टेल गठन था। नीति में थोक लाइसेंस के लिए जो शर्तें रखी गईं, वह जीओएम की सिफारिशों के विपरीत थीं। समिति के अध्यक्ष अजय महावर ने कहा कि यह घोटाला आंकड़ों का नहीं बल्कि उन लाखों बोतलों की कहानी है जो बिना ट्रैकिंग, बिना गुणवत्ता जांच और बिना टैक्स चुकाए दिल्ली की सड़कों पर पहुंचीं।
136 करोड़ बारकोड बायपास, 25 करोड़ बारकोड का हिसाब नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, 28 प्रतिशत बिक्री यानी 136.53 करोड़ बारकोड स्टॉक-टेक-सोल्ड अभ्यास से सिस्टम को बायपास कर बेचे गए। 21 प्रतिशत बिक्री पीओएस (पॉइंट ऑफ सेल) पर स्कैन ही नहीं हुई। 2019 में मासिक स्टॉक रियलाइजेशन में 30.87 प्रतिशत अंतर था। कुछ वेंडरों ने 70-98 प्रतिशत शराब बिना स्कैन किए बेच दी। 25.70 करोड़ बारकोड का हिसाब नहीं है। इससे बिना एक्साइज ड्यूटी चुकाए शराब तस्करी, कालाबाजारी को बढ़ावा मिला। समिति ने कहा, विभाग ने ट्रेनिंग की कमी और पुराने बारकोड का बहाना बनाया। असल में निगरानी व्यवस्था फेल थी।
एक ही आदमी को कई लाइसेंस
लेखा समिति की दूसरी रिपोर्ट में दावा किया गया कि दिल्ली आबकारी नियम 2010 के नियम 35 का उल्लंघन कर एक व्यक्ति को कई लाइसेंस दिए गए। पुलिस वेरिफिकेशन के बजाय सेल्फ-अफिडेविट पर भरोसा किया गया। एक लाइसेंसधारी पर एफआईआर दर्ज होने के बावजूद मात्र आठ लाख का जुर्माना लगाकर काम चला लिया गया। एल-1 लाइसेंस का नवीनीकरण तब किया गया जब उसने 46 % शराब जमा की थी। एल-1एफ लाइसेंसधारियों ने बैलेंस शीट जमा नहीं की, फिर भी लाइसेंस जारी हो गए। सीसीटीवी कैमरे, 15-सूत्रीय घोषणाएं और फायर इंश्योरेंस तक की शर्तें पूरी नहीं हुईं। समिति ने पूछा कि क्या विभाग सोया हुआ था या जानबूझकर आंखें बंद कर ली थीं?
मनमाने दाम से कमाया मुनाफा
मूल्य निर्धारण में भी मनमानी का खेल चला। आईएमएफएल और एफएल पर ईडीपी/ईबीपी घोषणाओं की निगरानी न होने से 165 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। एल-1 लाइसेंसधारियों ने 14 ब्रांडों में से 7 पर दिल्ली में अन्य राज्यों से ज्यादा ईडीपी घोषित कर 35.07 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ कमाया। वेंडरों ने 44 से 347 प्रतिशत तक लाभ मार्जिन दिखाकर खुदरा मूल्य बढ़ाया और तस्करी को बढ़ावा दिया।
घोटाला शराब का नहीं सेहत का भी
एनएबीएल की बिना मान्यता वाली प्रयोगशालाओं के प्रमाण-पत्र स्वीकार किए गए। 173 परीक्षण रिपोर्टों में से एक भी ब्रांड बीआईएस मानकों पर पूरा नहीं उतरा। यानी एक भी ब्रांड भारतीय बाजार में बिकने योग्य नहीं था फिर भी दिल्ली के बाजार खोले गए। सूक्ष्मजीव विज्ञान और जल गुणवत्ता परीक्षण तक नहीं हुए। ‘प्रो कोड कैप्चर्ड रूट 5’ नामक पेय को वाइन कहकर बेचा गया जबकि इसमें मात्र 5% अल्कोहल था (नियम के मुताबिक वाइन में कम से कम 7% होना चाहिए)। इंडो स्पिरिट्स बेवरेजेज ने तीन वाइन ब्रांडों के लिए पुरानी रिपोर्ट दोबारा जमा की, फिर भी विभाग ने आंखें मूंद लीं।
मूल्य निर्धारण में भी मनमानी का खेल चला। आईएमएफएल और एफएल पर ईडीपी/ईबीपी घोषणाओं की निगरानी न होने से 165 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। एल-1 लाइसेंसधारियों ने 14 ब्रांडों में से 7 पर दिल्ली में अन्य राज्यों से ज्यादा ईडीपी घोषित कर 35.07 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ कमाया। वेंडरों ने 44 से 347 प्रतिशत तक लाभ मार्जिन दिखाकर खुदरा मूल्य बढ़ाया और तस्करी को बढ़ावा दिया।
घोटाला शराब का नहीं सेहत का भी
एनएबीएल की बिना मान्यता वाली प्रयोगशालाओं के प्रमाण-पत्र स्वीकार किए गए। 173 परीक्षण रिपोर्टों में से एक भी ब्रांड बीआईएस मानकों पर पूरा नहीं उतरा। यानी एक भी ब्रांड भारतीय बाजार में बिकने योग्य नहीं था फिर भी दिल्ली के बाजार खोले गए। सूक्ष्मजीव विज्ञान और जल गुणवत्ता परीक्षण तक नहीं हुए। ‘प्रो कोड कैप्चर्ड रूट 5’ नामक पेय को वाइन कहकर बेचा गया जबकि इसमें मात्र 5% अल्कोहल था (नियम के मुताबिक वाइन में कम से कम 7% होना चाहिए)। इंडो स्पिरिट्स बेवरेजेज ने तीन वाइन ब्रांडों के लिए पुरानी रिपोर्ट दोबारा जमा की, फिर भी विभाग ने आंखें मूंद लीं।
समिति ने बताया कैसे बदलेंगे हालात
विभाग ने एक्शन टेकन नोट में कुछ दावे किए। कहा कि अब ई-अबकारी पोर्टल लॉन्च हो गया है, एनएबीएल लैब्स पर जोर है और लाइसेंसधारियों की जांच सख्त की जा रही है। लेकिन पीएसी ने इसे अपर्याप्त बताया। समिति ने सिफारिश की...
1. रीयल-टाइम एंड-टू-एंड बारकोड ट्रैकिंग लागू हो।
2. ईआईबी मॉड्यूल को खुफिया जानकारी के लिए इस्तेमाल किया जाए।
3. आईटी कैडर भर्ती हो और गुणवत्ता परीक्षण अनिवार्य रूप से एनएबीएल लैब से हो।
4. लाइसेंसधारियों के आपराधिक रिकॉर्ड, सॉल्वेंसी और नैतिक चरित्र की जांच अनिवार्य हो।
विभाग ने एक्शन टेकन नोट में कुछ दावे किए। कहा कि अब ई-अबकारी पोर्टल लॉन्च हो गया है, एनएबीएल लैब्स पर जोर है और लाइसेंसधारियों की जांच सख्त की जा रही है। लेकिन पीएसी ने इसे अपर्याप्त बताया। समिति ने सिफारिश की...
1. रीयल-टाइम एंड-टू-एंड बारकोड ट्रैकिंग लागू हो।
2. ईआईबी मॉड्यूल को खुफिया जानकारी के लिए इस्तेमाल किया जाए।
3. आईटी कैडर भर्ती हो और गुणवत्ता परीक्षण अनिवार्य रूप से एनएबीएल लैब से हो।
4. लाइसेंसधारियों के आपराधिक रिकॉर्ड, सॉल्वेंसी और नैतिक चरित्र की जांच अनिवार्य हो।