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Delhi: कचरे से गैस की दिशा में राजधानीवासियों ने बढ़ाए कदम, चार किलो कचरे से 450 ग्राम एलपीजी गैस का उत्पादन

ज्योति सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 17 Mar 2026 06:21 AM IST
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सार

एलपीजी सिलिंडर की किल्लत के बीच लोग वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत तलाश रहे हैं। ऐसे में कचरे से गैस बनाने के लिए दिल्लीवासी ओखला स्थित बायोगैस प्लांट पहुंच रहे हैं। घरेलू और व्यावसायिक (कॉमर्शियल) बायोगैस सेटअप के बारे में पूछताछ कर रहे हैं।

Capital Residents Take Steps Towards Waste to Gas Initiative 450 Grams of LPG Produced from 4 Kilograms of Wa
एलपीजी सिलिंडर की किल्लत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

एलपीजी सिलिंडर की किल्लत के बीच लोग वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत तलाश रहे हैं। ऐसे में कचरे से गैस बनाने के लिए दिल्लीवासी ओखला स्थित बायोगैस प्लांट पहुंच रहे हैं। घरेलू और व्यावसायिक (कॉमर्शियल) बायोगैस सेटअप के बारे में पूछताछ कर रहे हैं। ओखला स्थित परफेक्ट बायोगैस एंड पावर मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड की प्लांट हेड पुनीता सिंह के अनुसार, रोजाना करीब 400-500 लोग घरेलू बायोगैस प्लांट लगाने के लिए संपर्क कर रहे हैं, जबकि 50 से अधिक कॉल कमर्शियल बायोगैस सेटअप के लिए आ रही हैं। यह पहल शहरों में लैंडफिल कचरे को कम करने में भी मदद कर सकती है। 

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चार किलो कचरे से 450 ग्राम एलपीजी गैस का उत्पादन
विनीता सिंह ने बताया कि शहरी घरों में यदि रोजाना चार किलोग्राम अलग किया हुआ जैविक रसोई कचरा ( सब्जियों के छिलके और बचा हुआ भोजन) उपलब्ध हो, तो उससे लगभग 450 ग्राम एलपीजी के बराबर गैस का उत्पादन किया जा सकता है। यदि किसी किसान के पास सिर्फ एक गाय या भैंस हो, तो उसके गोबर से प्रतिदिन लगभग 450 ग्राम एलपीजी के बराबर बायोगैस तैयार की जा सकती है। इससे ग्रामीण परिवारों को खाना पकाने के लिए सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा मिल सकती है। 
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इन रेलवे स्टेशनों पर प्रयोग
प्रयागराज स्टेशन और कानपुर स्टेशन में पोर्टेबल बायोगैस संयंत्र लगाए गए हैं। यहां की रसोइयों में लोकोमोटिव पायलट (ट्रेन चालक) के लिए भोजन तैयार किया जाता है। अब तक देश के कई बड़े डेयरी फार्म और पोल्ट्री फार्म में 500 से अधिक बायोगैस प्लांट स्थापित किए हैं। 

बायोगैस के बढ़ते विकल्प के मुख्य बिंदु
स्थानीय उत्पादन: गोबर, रसोई का गीला कचरा, खराब सब्जियां और फलों के छिलकों का उपयोग करके घर पर ही छोटा बायोगैस प्लांट लगाया जा रहा है।
लागत और सब्सिडी: घरेलू प्लांट की लागत लगभग 15,000 से 50,000 रुपये तक हो सकती है, जबकि कमर्शियल सेटअप में 19-20 लाख तक का खर्चा आ सकता है। वहीं, सरकार इन संयंत्रों पर सब्सिडी भी प्रदान कर रही है। 
तकनीक:  पोर्टेबल बायोगैस सिस्टम का उपयोग करना आसान है, जो अवायवीय पाचन के माध्यम से कचरे को मीथेन में बदलते हैं।
दोहरा लाभ: खाना पकाने की गैस के अलावा, इससे निकलने वाले अवशेष का उपयोग पौधों के लिए बेहतरीन जैविक खाद के रूप में किया जा सकता है।

क्या है बायोगैस
बायोगैस एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है, जो गोबर, कृषि अवशेष, रसोई के जैविक कचरे और अन्य जैविक पदार्थों को ऑक्सीजन रहित वातावरण में सड़ाकर तैयार की जाती है। इस प्रक्रिया को एनारोबिक डाइजेशन कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है, जो ईंधन के रूप में उपयोगी होती है।

बायोगैस के उपयोग
बायोगैस को गैस टैंक या बैग में संग्रहित किया जाता है और इसका उपयोग खाना बनाने, पानी गर्म करने, रोशनी करने और जनरेटर चलाने के लिए किया जा सकता है। इसे शुद्ध कर बायोमीथेन में बदला जा सकता है, जिसका उपयोग परिवहन ईंधन या गैस पाइपलाइन में भी किया जा   सकता है।

पर्यावरण के लिए भी फायदे
विशेषज्ञों के अनुसार बायोगैस ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करती है, जैविक कचरे के बेहतर प्रबंधन में मदद करती है और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है। इसके साथ ही बायोगैस प्लांट से निकलने वाला अवशेष उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद के रूप में भी इस्तेमाल होता है।

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