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केंद्र का केजरीवाल सरकार को निर्देश: घर- घर राशन योजना की खामियों को दूर करें
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: योगेश जोशी
Updated Tue, 23 Mar 2021 06:45 AM IST
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सरकारी राशन
- फोटो : सोशल मीडिया
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केजरीवाल की घर घर राशन देने की स्कीम पर छिड़े विवाद के मध्य केंद्र सरकार के खाद्दय एवं रसद मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि उसका मकसद किसी योजना पर रोक लगाना और उसे भटकाना (डिरेल करना) नहीं है। बल्कि एक ऐसी चाकचौबंद योजना को चलाना है, जिसकी मदद से अंतिम छोर पर सरकारी सहायता प्राप्त करने वाले उपभोक्ता तक आसानी से खाद्यन्न पहुंच सकें। दिल्ली के नागरिकों को भी पूरे देश के नागरिकों की तरह ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत रियायती मूल्य पर खाद्यन्न मिले, उसे डोर स्टेप डिलवरी के नाम पर आपूर्ति और पैकेजिंग के नाम पर अतिरिक्त मूल्य न देने पड़े और राष्ट्रीय स्तर पर उसका सत्यापन कराने में आसनी हो, जो अभी की योजना में केंद्र सरकार के लिए यक्ष प्रश्न बने हुए हैं और जिसकी जवाबदेही तय करने के लिए केंद्र ने राज्य सरकार से कहा है।
केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने केजरीवार सरकार की योजना पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि उनकी तरफ से कोई भी राज्य सरकार अपनी स्कीम चला सकती है। बर्शेतें एक देश एक राशन और एक कीमत की जो केंद्र सरकार की मंशा है वह प्रभावित न हो। केजरीवार सरकार की योजना को लेकर केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के सचिव सुधांशु पांडेय ने मीडिया से अनौपचरिक वार्ता के दौरान कहा है, यदि केजरीवाल सरकार योजना पर पुर्नविचार इसके ग्रे एरिया को खत्म करे और रिवाइज स्कीम लेकर आए है तो इस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वर्तमान योजना में खासी खामियां है।
इनकी जवाबदेही तो करनी होगी, इन्हें इंगित करते हुए पांडे ने बताया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत केंद्र की मंशा देश भर के प्रभावित और समाज के विशेष तबके को जो इस योजना का लाभार्थी है, एक समान लाभ देना है। इसके लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को भेजे जाने वाले सामानों के ट्रांसपोर्ट खर्च से लेकर खाद्य श्रृंखला की आपूर्ति तक के समस्त खर्च स्वयं वहन करती है। ऐसे में अगर घर घर राशन योजना लाभार्थी को राशन कैसे और कौन देगा, उस पर पैकेजिंग और सामान को लाने और आपूर्ति करने में उस पर कितना बोझ और क्यों पड़ेगा यह सवाल अनुत्तरित है।
इसके अलावा केजरीवाल सरकार की योजना की खामियो में सबसे बड़ी खामी है, लाभार्थी को लाभ और आपूर्तिकर्ता की पहचान सुनिश्चित करने का अभाव। वर्तमान में फेयर शॉप पर हर दिन बायोमैट्रिक सिस्ट्म के चलते आपूर्तिकर्ता की पहचान सुनिश्चित होती है, उसका आधार और समस्त जानकारियों से एक क्लिक पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार परिचित होती है। इतना ही नहीं राशन का मूल्य, लाभार्थी और आपूर्तिकर्ता की पहचान भी स्पष्ट रहती है।
उन्होंने कहा दिल्ली में लगभग 73 लाख लाभार्थी हैं, इसमें से 70 लाख से ज्यादा सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करते हैं। इनके लिए दो हजार चार राशन की दुकाने हैं। ऐसे में सघन आबादी के चलते फेयर शाप से आपूर्ति संभव है। ऐसे में यदि केजरीवाल सरकार घर घर राशन देगी तो वह आपूर्तिकर्ता और उपभोक्ता की पहचान कैसे सुनिश्चत करेगी, बायोमैट्रिक सिस्ट्म का क्या होगा। केंद्र सरकार द्वारा राज्य को हर माह 37 हजार 572 टन खाद्यन्नों की आपूर्ति की जाती है। इन्हें उपभोक्ताओं को उनके घर पर केंद्र सरकार द्वारा तय मूल्य पर कैसे भेजा जाएगा, इसके अलावा केजीरवाल सरकार की योजना में हर साल टेंडर, पैकेजिंग और आपूर्ति चेन जैसे मुद्दों को साफ नहीं किया गया है।
उपभोक्ता इसकी लागत क्यों उठाएगा। इसमें पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी। यह प्रश्न है जो अनुउत्तरित हैं, इसके अलावा सबसे अहम सवाल यह है कि केवल चार राज्यों दिल्ली, छत्तीसगढ़, असम और पश्चिम बंगाल ही में इस योजना को लागू करने में दिक्कत क्यों, जबकि बिहार सौ फीसदी बायोमैट्रिक सिस्ट्म से जुड़ गया बाकि राज्यों में यह खासा सफल है, ऐसे में पूरे देश में यह योजना सफलतापूर्वक संचालित हो रही है। दिल्ली में भी जब अप्रैल से जून 2018 तक योजना को तीन माह के लिए संचालित किया गया था। तब 35 फीसदी लोग इस योजना से जुड़े थे।
ऐसे में सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार की मंशा क्या है। उन्होंने कहा उनका मकसद एक नेशन एक राशन कार्ड और एक मूल्य को हर हाल में सुनिश्चित करना है, इसलिए वह कैसे किसी राज्य को रोक सकते हैं, लेकिन भ्रांतियों का समाधान होना भी जरूरी है।
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केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने केजरीवार सरकार की योजना पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि उनकी तरफ से कोई भी राज्य सरकार अपनी स्कीम चला सकती है। बर्शेतें एक देश एक राशन और एक कीमत की जो केंद्र सरकार की मंशा है वह प्रभावित न हो। केजरीवार सरकार की योजना को लेकर केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के सचिव सुधांशु पांडेय ने मीडिया से अनौपचरिक वार्ता के दौरान कहा है, यदि केजरीवाल सरकार योजना पर पुर्नविचार इसके ग्रे एरिया को खत्म करे और रिवाइज स्कीम लेकर आए है तो इस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वर्तमान योजना में खासी खामियां है।
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इनकी जवाबदेही तो करनी होगी, इन्हें इंगित करते हुए पांडे ने बताया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत केंद्र की मंशा देश भर के प्रभावित और समाज के विशेष तबके को जो इस योजना का लाभार्थी है, एक समान लाभ देना है। इसके लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को भेजे जाने वाले सामानों के ट्रांसपोर्ट खर्च से लेकर खाद्य श्रृंखला की आपूर्ति तक के समस्त खर्च स्वयं वहन करती है। ऐसे में अगर घर घर राशन योजना लाभार्थी को राशन कैसे और कौन देगा, उस पर पैकेजिंग और सामान को लाने और आपूर्ति करने में उस पर कितना बोझ और क्यों पड़ेगा यह सवाल अनुत्तरित है।
इसके अलावा केजरीवाल सरकार की योजना की खामियो में सबसे बड़ी खामी है, लाभार्थी को लाभ और आपूर्तिकर्ता की पहचान सुनिश्चित करने का अभाव। वर्तमान में फेयर शॉप पर हर दिन बायोमैट्रिक सिस्ट्म के चलते आपूर्तिकर्ता की पहचान सुनिश्चित होती है, उसका आधार और समस्त जानकारियों से एक क्लिक पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार परिचित होती है। इतना ही नहीं राशन का मूल्य, लाभार्थी और आपूर्तिकर्ता की पहचान भी स्पष्ट रहती है।
उन्होंने कहा दिल्ली में लगभग 73 लाख लाभार्थी हैं, इसमें से 70 लाख से ज्यादा सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करते हैं। इनके लिए दो हजार चार राशन की दुकाने हैं। ऐसे में सघन आबादी के चलते फेयर शाप से आपूर्ति संभव है। ऐसे में यदि केजरीवाल सरकार घर घर राशन देगी तो वह आपूर्तिकर्ता और उपभोक्ता की पहचान कैसे सुनिश्चत करेगी, बायोमैट्रिक सिस्ट्म का क्या होगा। केंद्र सरकार द्वारा राज्य को हर माह 37 हजार 572 टन खाद्यन्नों की आपूर्ति की जाती है। इन्हें उपभोक्ताओं को उनके घर पर केंद्र सरकार द्वारा तय मूल्य पर कैसे भेजा जाएगा, इसके अलावा केजीरवाल सरकार की योजना में हर साल टेंडर, पैकेजिंग और आपूर्ति चेन जैसे मुद्दों को साफ नहीं किया गया है।
उपभोक्ता इसकी लागत क्यों उठाएगा। इसमें पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी। यह प्रश्न है जो अनुउत्तरित हैं, इसके अलावा सबसे अहम सवाल यह है कि केवल चार राज्यों दिल्ली, छत्तीसगढ़, असम और पश्चिम बंगाल ही में इस योजना को लागू करने में दिक्कत क्यों, जबकि बिहार सौ फीसदी बायोमैट्रिक सिस्ट्म से जुड़ गया बाकि राज्यों में यह खासा सफल है, ऐसे में पूरे देश में यह योजना सफलतापूर्वक संचालित हो रही है। दिल्ली में भी जब अप्रैल से जून 2018 तक योजना को तीन माह के लिए संचालित किया गया था। तब 35 फीसदी लोग इस योजना से जुड़े थे।
ऐसे में सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार की मंशा क्या है। उन्होंने कहा उनका मकसद एक नेशन एक राशन कार्ड और एक मूल्य को हर हाल में सुनिश्चित करना है, इसलिए वह कैसे किसी राज्य को रोक सकते हैं, लेकिन भ्रांतियों का समाधान होना भी जरूरी है।
