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दिल्ली HC का बड़ा फैसला: मेडिकल छात्र के दूसरे कॉलेज में ट्रांसफर पर रोक रद्द, NMC को नीति बनाने का निर्देश

पीटीआई, नई दिल्ली Published by: राहुल तिवारी Updated Thu, 05 Feb 2026 03:21 PM IST
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सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने मेडिकल छात्रों के एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में ट्रांसफर पर पूर्ण प्रतिबंध को असंवैधानिक ठहराया है। कोर्ट ने एनएमसी को माइग्रेशन की अनुमति के लिए उचित नीति बनाने का निर्देश देते हुए दृष्टिबाधित छात्र के आवेदन पर तीन सप्ताह में फैसला करने को कहा।

Prohibition on transfer of medical student to another college invalid in high court verdict
दिल्ली हाईकोर्ट, Delhi High Court - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने मेडिकल छात्र के एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में ट्रांसफर या माइग्रेशन पर पूर्ण प्रतिबंध को अमान्य करार दिया है। साथ ही नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) को आवश्यक शर्तों के साथ माइग्रेशन की अनुमति देने हेतु 'उचित नीति' बनाने का निर्देश दिया है।

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मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा कि ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन, 2023 का रेगुलेशन 18 'स्पष्ट रूप से अविवेकपूर्ण और मनमाना' होने के कारण संविधान के खिलाफ है। पीठ ने यह फैसला 40 प्रतिशत दृष्टिबाधित एक मेडिकल छात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, बाड़मेर से दिल्ली के एक कॉलेज में माइग्रेशन की मांग की थी। राहत देते हुए अदालत ने एनएमसी को याचिकाकर्ता के ट्रांसफर आवेदन पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
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अदालत ने चार फरवरी को दिए अपने निर्णय में कहा कि मेडिकल शिक्षा संस्थानों में एकरूपता, मानक और अखंडता बनाए रखने के नाम पर ट्रांसफर या माइग्रेशन पर पूर्ण प्रतिबंध, जिसकी आवश्यकता विभिन्न परिस्थितियों में पड़ सकती है, उचित नहीं कहा जा सकता। अदालत की राय में ऐसा प्रतिबंध स्पष्ट रूप से अविवेकपूर्ण और मनमाना है।

अदालत ने यह भी कहा कि माइग्रेशन के दुरुपयोग की आशंका का एनएमसी का तर्क टिकाऊ नहीं है, क्योंकि दुरुपयोग की संभावना के आधार पर किसी नागरिक के वैध अधिकारों से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने नोट किया कि बाड़मेर की कठोर जलवायु के कारण याचिकाकर्ता की चिकित्सीय स्थिति और क्षमताएं प्रभावित हो रही थीं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (PwD Act) के तहत सार्वजनिक निकायों का दायित्व है कि दिव्यांग व्यक्तियों को उचित सुविधा और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाए।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास बाड़मेर के सरकारी कॉलेज की सीट लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। यह उसकी कम मेरिट के कारण नहीं, बल्कि उसे काउंसलिंग के शुरुआती चरणों में भाग लेने का अधिकार नहीं दिया गया था। अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही वह अंतिम चरण में काउंसलिंग में शामिल हो सका, जब विकल्प सीमित रह गए थे।

अदालत ने कहा कि 'युक्तिसंगतता समानता का एक पहलू है, इसलिए राज्य या उसकी संस्थाओं के हर निर्णय में युक्तिसंगतता होनी चाहिए। उपरोक्त चर्चा के आधार पर 2023 के रेगुलेशन 18 को संविधान के अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरा नहीं पाया गया और इसे स्पष्ट रूप से अविवेकपूर्ण व मनमाना मानते हुए अल्ट्रा वायर्स घोषित किया जाता है। अतः ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन, 2023 का रेगुलेशन 18 अमान्य घोषित किया जाता है।

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