Indian history: दक्षिण अफ्रीका की पाठ्यपुस्तकों में भारतीय इतिहास शामिल करने की मांग, हिंदू संगठन ने उठाई आवाज
Indian History: हिंदू संगठन ने दक्षिण अफ्रीका की स्कूल पाठ्यपुस्तकों में भारतीय इतिहास और भारतीय प्रवासियों के योगदान को शामिल करने की अपील की है।
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Hindu Organization: दक्षिण अफ्रीका के एक प्रमुख हिंदू संगठन ने अधिकारियों से आग्रह किया है कि वे देश में भारतीयों के इतिहास को "मिटाने" का प्रयास न करें और वर्तमान में संशोधित की जा रही स्कूली पाठ्यपुस्तकों में समुदाय के योगदान को अधिक से अधिक दर्शाने की मांग की है।
एक खुले पत्र में, दक्षिण अफ्रीकी हिंदू धर्म सभा (एसएएचडीएस) के अध्यक्ष राम महाराज ने कहा कि भले ही भारतीय समुदाय अल्पसंख्यक है, लेकिन उनके इतिहास को पाठ्यक्रम में पर्याप्त रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
एसएएचडीएस ने भारतीय इतिहास बढ़ाने की मांग की
उन्होंने कहा, "1981 में ही, एसएएचडीएस ने डरबन में अपने पहले राष्ट्रीय हिंदू सम्मेलन में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें स्कूली पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास को पर्याप्त रूप से शामिल करने की मांग की गई थी।"
महाराज ने कहा, "दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के इतिहास को इतिहास की किताबों से मिटाया नहीं जा सकता और न ही मिटाया जाना चाहिए। हम मांग करते हैं कि सभी कक्षाओं में भारतीयों के इतिहास की वर्तमान सामग्री को कम से कम दोगुना किया जाए, क्योंकि अल्पसंख्यक मायने रखते हैं।"
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिनिधित्व का वर्तमान स्तर दक्षिण अफ्रीका के निर्माण में भारतीयों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण योगदान का "अपमान" और "स्पष्ट रूप से मिटाना" है।
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के ऐतिहासिक योगदान पर जोर
उन्होंने याद दिलाया कि 1860 में बंधुआ मजदूरों के रूप में आने के बाद से भारतीयों ने दक्षिण अफ्रीका में आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में योगदान दिया है।
महाराज ने कहा, "पाठ्यपुस्तकों में इस विरासत को कम आंकना, स्वयं सत्य को कम आंकने के समान है।" उन्होंने आगे कहा कि बेहतर प्रतिनिधित्व से अंतरजातीय समझ, सामाजिक एकता और राष्ट्र निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
उन्होंने कहा कि समुदाय के संघर्षों को अधिक शामिल करने से इस धारणा का भी खंडन होगा कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को ऐतिहासिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त रहे हैं।
यह दर्ज किया जाना चाहिए कि हमारे महान गिरमिटिया पूर्वजों ने अथक परिश्रम किया और गुलामी जैसी परिस्थितियों में जीवन व्यतीत किया, निरंतर यातना, आघात, अभाव और भेदभाव का सामना किया।
रंगभेद विरोधी आंदोलन में भारतीयों की भूमिका को मान्यता देने की अपील
हिंदू नेता ने कहा, "हालांकि, पीढ़ियों से, भारतीयों ने दूरदृष्टि और मिशन की भावना के साथ शैक्षिक उन्नति को प्राथमिकता देकर, प्रतिकूल परिस्थितियों को अवसर में परिवर्तित करके और कम संसाधनों में अधिक काम करके जीवन यापन किया और प्रगति की।"
एसएएचडीएस ने कहा है कि स्कूल की किताबों में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के दुख, संघर्ष और बलिदान को भी शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही रंगभेद के खिलाफ लड़ाई में भारतीयों की भूमिका को भी सही तरीके से दिखाया जाना चाहिए, जिससे नेल्सन मंडेला देश के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति बने। महाराज ने बताया कि इस संघर्ष की शुरुआत 1894 में महात्मा गांधी द्वारा बनाई गई नेटाल इंडियन कांग्रेस से हुई थी, जो अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस से करीब 20 साल पहले बनी थी। उन्होंने पदावतन बंधुओं, वल्लीअम्मा और वी.एन. नाइक, एम.एल. सुल्तान, नरेंद्र पट्टुंडीन, ए.एम. मूला, आर.के. खान और एच.ई. जोसाब जैसे कई लोगों का भी नाम लिया, जिन्होंने स्कूल और अस्पताल बनाने में मदद की। एसएएचडीएस ने यह भी कहा कि औपनिवेशिक काल में हिंदुओं के साथ भेदभाव हुआ था, जैसे मंदिर तोड़ना और जबरन दूसरी जगह बसाना। महाराज ने कहा कि अगर भारतीय इतिहास को सही और निष्पक्ष तरीके से पढ़ाया जाएगा, तो इससे समाज में एकता और शांति बढ़ेगी।
