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Nagaland: नागालैंड विश्वविद्यालय का अहम शोध, ‘मूसा सिक्कीमेंसिस’ बन सकता है जलवायु-समस्याओं का मजबूत समाधान

एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Shahin Praveen Updated Tue, 03 Mar 2026 08:32 PM IST
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सार

Nagaland University: नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ‘मूसा सिक्कीमेंसिस’ पर अध्ययन कर इसके जलवायु-लचीलापन और टिकाऊ कृषि में संभावित उपयोग को उजागर किया है। यह शोध खाद्य सुरक्षा के लिए नई उम्मीद जगाता है।

Nagaland University Conducts Major Study on Musa sikkimensis for Climate-Resilient Agriculture
नागालैंड विश्वविद्यालय का बड़ा शोध - फोटो : आईएएनएस
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विस्तार

Musa Sikkimensis: नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पूर्वी हिमालय और उत्तर-पूर्वी भारत में पाई जाने वाली जंगली केले की प्रजाति मूसा सिक्कीमेंसिस पर एक विस्तृत अध्ययन किया है। इस अध्ययन में बताया गया है कि यह प्रजाति जलवायु परिवर्तन के प्रति मजबूत है और भविष्य में खाद्य सुरक्षा तथा टिकाऊ कृषि विकास के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है।
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शोध दल के अनुसार, मूसा सिक्कीमेंसिस एक जंगली बीज वाली प्रजाति है, जिसे आमतौर पर ‘दार्जिलिंग केला’ या ‘सिक्किम केला’ के नाम से जाना जाता है और यह एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक भंडार के रूप में कार्य करती है।

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वनों की कटाई और प्रजातियों पर खतरा

शोध में पाया गया कि इस प्रजाति में बीमारियों से लड़ने की अच्छी क्षमता है। यह गर्मी, ठंड और अन्य पर्यावरणीय दबावों को सहन कर सकती है और बदलते मौसम के अनुसार खुद को ढाल सकती है। इसलिए यह भविष्य में केले की नई और बेहतर किस्में विकसित करने में बहुत उपयोगी हो सकती है। भले ही इसे आम तौर पर खाने के लिए बड़े पैमाने पर नहीं उगाया जाता, लेकिन यह फसलों को मजबूत बनाने और लंबे समय तक अच्छी पैदावार बनाए रखने में मदद कर सकती है।

अध्ययन में यह भी देखा गया कि स्थानीय केले की किस्में अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में अच्छी तरह जीवित रह सकती हैं। यह गुण उनके संरक्षण और भविष्य में नई किस्में तैयार करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

भारत-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट में स्थित नागालैंड केले की स्वदेशी किस्मों की समृद्ध विविधता के लिए जाना जाता है। हालांकि, बढ़ती मानवीय गतिविधियों, पर्यावरणीय दबाव और वनों की कटाई के कारण कई जंगली किस्में लुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं।


ऐसे में ‘भारत के नागालैंड में मूसा सिक्कीमेंसिस की स्थानीय प्रजातियों की आनुवंशिक विविधता की खोज’ शीर्षक से प्रकाशित यह शोध लुप्तप्राय केले के जर्मप्लाज्म के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता पर जोर देता है। यह शोध एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जो पादप और पशु जीव विज्ञान, जैव विविधता, पारिस्थितिकी और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अध्ययनों को प्रकाशित करता है।

शोध टीम, संरक्षण प्रयास और विश्वविद्यालय की पहल

इस शोधपत्र में नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधार्थी केआर सिंह, डॉ. एस वॉलिंग और डॉ. अनिमेष सरकार सह-लेखक हैं। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जगदीश के. पटनायक ने इस उपलब्धि पर खुशी जताई। उन्होंने बताया कि शोधकर्ताओं ने विलुप्ति के खतरे में मौजूद स्थानीय केले की किस्मों के संरक्षण के लिए सफलतापूर्वक एक जैव विविधता गलियारा तैयार किया है।

उन्होंने कहा कि यह प्रयास पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिए विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दिखाता है। साथ ही, यह कदम जलवायु परिवर्तन के समय में पौधों की आनुवंशिक मजबूती और पोषण सुरक्षा बनाए रखने में मदद करेगा।

यह अध्ययन डॉ. अनिमेष सरकार के मार्गदर्शन में चल रही स्नातकोत्तर और पीएचडी शोध परियोजनाओं का हिस्सा है। इन परियोजनाओं में राज्य में केले की विविधता का अध्ययन, जर्मप्लाज्म का नक्शा बनाना, जंगली प्रजातियों की पहचान और उनके आनुवंशिक संसाधनों का मूल्यांकन शामिल है।

जंगली केले की किस्मों के संरक्षण और उपयोग की संभावनाएं

डॉ. सरकार ने बताया कि शोध के दौरान कई कठिनाइयां आईं, जैसे ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम इलाके, दूर के जंगलों तक पहुंचना मुश्किल होना, और किसानों में पौधों के संरक्षण के बारे में कम जानकारी होना। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल किसान संकर (हाइब्रिड) और ऊतक संवर्धन से तैयार किस्मों की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इससे पारंपरिक और जंगली केले की किस्में धीरे-धीरे खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जंगली केले की किस्में नई और ज्यादा उपज देने वाली, साथ ही बीमारियों से बचने वाली किस्में विकसित करने में मदद कर सकती हैं। इनके उपयोग से रेशे (फाइबर) वाले उत्पाद और स्वास्थ्य से जुड़े पेय जैसे नए और लाभकारी उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं।

पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता का संरक्षण

इसके अतिरिक्त, नागालैंड के आदिवासी समुदायों के बीच जंगली केलों का पारंपरिक उपयोग भोजन, रेशा, औषधि और सांस्कृतिक प्रथाओं में किया जाता रहा है। इन पौधों में पेचिश, अल्सर, मधुमेह और सूक्ष्मजीव संक्रमणों के उपचार से जुड़े औषधीय गुण भी पाए गए हैं।

संरक्षण प्रयासों को सुदृढ़ करने के लिए नागालैंड विश्वविद्यालय ने अपने बागवानी विभाग में एक ‘केला जैव विविधता गलियारा’ स्थापित किया है। यह गलियारा एक जीवित फील्ड जीन बैंक के रूप में कार्य करता है, जो इन-सीटू और एक्स-सीटू संरक्षण पद्धतियों को जोड़ते हुए आनुवंशिक एवं आणविक अनुसंधान, जलवायु-लचीले प्रजनन कार्यक्रमों, छात्र प्रशिक्षण और राष्ट्रीय जर्मप्लाज्म सुरक्षा पहलों को समर्थन प्रदान करता है।

यह पहल पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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