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बंगलूरू: एनएलएसआईयू ने रद्द किया दीक्षांत समारोह, छात्रों को अब कैसे मिलेगी डिग्री? जानें क्या है पूरा मामला

Thu, 27 Aug 2026 01:15 PM IST
Akash Kumar एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Akash Kumar Updated Thu, 27 Aug 2026 01:15 PM IST
सार

राष्ट्रीय विधि विद्यालय, बंगलूरू ने 2026 के स्नातक बैच का दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया है। समारोह 12 सितंबर को होना था। विश्वविद्यालय ने अब छात्रों को बिना समारोह के ही डिग्री देने का फैसला किया है। जानें पूरा मामला...
 

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NLSIU Cancels 2026 Convocation Amid Student and Alumni Opposition Over BCI Chairman, CJI Presence
NLSIU की ओर से जारी आधिकारिक नोटिस - फोटो : Official Website

विस्तार

बंगलूरू स्थित राष्ट्रीय विधि विद्यालय (एनएलएसआईयू) ने 2026 में स्नातक होने वाले छात्रों का 34वां वार्षिक दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने 3 अगस्त को छात्रों को ईमेल भेजकर बताया था कि दीक्षांत समारोह 12 सितंबर को आयोजित किया जाएगा।

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अब 27 अगस्त को जारी एक नोटिस में विश्वविद्यालय ने कहा है कि कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण इस बार दीक्षांत समारोह आयोजित नहीं किया जा सकेगा।

विश्वविद्यालय ने नोटिस में कहा कि तमाम प्रयासों के बावजूद 34वां वार्षिक दीक्षांत समारोह आयोजित करना संभव नहीं है। सभी स्नातक छात्रों को संबंधित शासी निकायों से आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद बिना समारोह में उपस्थित हुए ही डिग्री प्रदान की जाएगी।
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अब छात्रों को डिग्री कैसे मिलेगी?

विश्वविद्यालय ने छात्रों को डिग्री और प्रमाणपत्र प्राप्त करने के दो विकल्प दिए हैं।
  • छात्र अपने प्रमाणपत्र डाक/कूरियर के माध्यम से मंगवा सकेंगे।
  • छात्र चाहें तो परिसर में आकर अपने प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकेंगे।
  • इस विकल्प को चुनने के लिए विश्वविद्यालय एक नया प्रपत्र जारी करेगा।
  • संबंधित प्रक्रिया की जानकारी सभी स्नातक छात्रों के साथ साझा की जाएगी।
विश्वविद्यालय के अनुसार, सभी स्नातक छात्रों को संबंधित शासी निकायों से आवश्यक मंजूरी के बाद उनकी डिग्री प्रदान की जाएगी।
 

क्या छात्रों और पूर्व छात्रों के विरोध से जुड़ा है फैसला?

दीक्षांत समारोह रद्द करने का फैसला ऐसे समय आया है, जब एनएलएसआईयू के छात्रों और पूर्व छात्रों ने भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के दीक्षांत समारोह में शामिल होने पर आपत्ति जताई थी।

एनएलएसआईयू के 700 से अधिक छात्रों और पूर्व छात्रों ने दोनों के दीक्षांत समारोह में शामिल होने का विरोध किया था। उन्होंने भारतीय विधिज्ञ परिषद से राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय (नलसार) के छात्रों और शिक्षकों से बिना शर्त माफी मांगने की मांग भी की थी।

हालांकि, यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि विश्वविद्यालय के 27 अगस्त के आधिकारिक नोटिस में समारोह रद्द करने की वजह के रूप में छात्रों का विरोध नहीं बताया गया है। आधिकारिक तौर पर विश्वविद्यालय ने केवल 'अपरिहार्य परिस्थितियों' का उल्लेख किया है।

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नलसार विवाद का एनएलएसआईयू के विरोध से क्या संबंध था?

एनएलएसआईयू के छात्रों और पूर्व छात्रों का बयान 13 अगस्त को भारतीय विधिज्ञ परिषद की कार्रवाई के बाद आया था।

  • 13 अगस्त को भारतीय विधिज्ञ परिषद ने नलसार विश्वविद्यालय के 2026 बैच के स्नातकों के नामांकन को रोकने का फैसला किया था। 
  • यह विवाद नलसार के छात्रों की ओर से सीजेआई सूर्यकांत के प्रस्तावित दीक्षांत समारोह में शामिल होने को लेकर जताई गई आपत्ति के बाद सामने आया था।
  • भारतीय विधिज्ञ परिषद का यह फैसला कुछ ही घंटों में वापस ले लिया गया।
  • बाद में परिषद के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी भी मांगी थी।

सीजेआई ने छात्रों से 90 मिनट तक क्या बात की?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सीजेआई सूर्यकांत ने एनएलएसआईयू के छात्रों के साथ करीब 90 मिनट तक बातचीत की थी। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान उन्होंने छात्रों की चिंताओं और उनके मुद्दों को समझने की कोशिश की।

छात्रों ने दीक्षांत समारोह को लेकर क्या आपत्ति जताई?

छात्रों और पूर्व छात्रों के बयान में दीक्षांत समारोह को किसी छात्र के शैक्षणिक जीवन का महत्वपूर्ण अवसर बताया गया था। उनके अनुसार, यह वर्षों की मेहनत और संघर्ष का जश्न मनाने का मौका होता है।

बयान में कहा गया था कि ऐसे देश में जहां वर्ग, जाति और लैंगिक असमानता जैसी बाधाओं के कारण उच्च शिक्षा तक पहुंच कठिन है और प्रवेश परीक्षाओं से जुड़ी समस्याएं भी हैं, वहां दीक्षांत समारोह छात्रों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

इसी संदर्भ में छात्रों ने कहा था कि ऐसे उच्च पदों पर बैठे लोगों को छात्रों को डिग्री देने के लिए आमंत्रित करना, जिन पर छात्रों के प्रति सार्वजनिक रूप से असहमति और उपेक्षा का भाव जताने का आरोप है, उनके लिए आपत्तिजनक, अपमानजनक और उनके संघर्ष का मजाक उड़ाने जैसा है।

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