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UGC Bill Row: यूजीसी नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल, जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा पर सवाल

एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: आकाश कुमार Updated Tue, 27 Jan 2026 05:08 PM IST
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सार

UGC Bill Row: यूजीसी के विनियम, 2026 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विनियम 3(सी) जाति-आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित करता है, जो संविधान और यूजीसी अधिनियम का उल्लंघन है।
 

UGC Regulation Challenged in Supreme Court Over Narrow Definition of Caste-Based Discrimination
यूजीसी विनियम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल - फोटो : ANI
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विस्तार
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Supreme Court: यूजीसी के नए कानून को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कई याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के एक नए नियम को चुनौती देते हुए इसे संविधान और यूजीसी अधिनियम, 1956 का उल्लंघन बताया है। यह नियम 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किए गए 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026' का हिस्सा है। यूजीसी विनियम विवाद लाइव अपडेट्स...

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रेगुलेशन 3(सी) को बताया भेदभावपूर्ण

याचिकाएं खास तौर पर इन नियमों के रेगुलेशन 3(सी) को लेकर दायर की गई हैं, जिसे याचिकाकर्ताओं ने मनमाना, बहिष्करणकारी और भेदभावपूर्ण करार दिया है।

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क्या है विवाद का मूल कारण?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यूजीसी के इस नए नियम में 'जाति-आधारित भेदभाव' (Caste-based Discrimination) की परिभाषा को बेहद सीमित कर दिया गया है। नियम के अनुसार, जाति के आधार पर भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक ही सीमित माना गया है।

इस परिभाषा के तहत केवल इन्हीं वर्गों को कानूनी रूप से पीड़ित (Victim) के रूप में मान्यता दी गई है। वहीं, सामान्य या उच्च जाति के व्यक्तियों को, चाहे उनके साथ कितना भी गंभीर भेदभाव क्यों न हुआ हो इस दायरे से बाहर रखा गया है।

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याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह नियम समानता के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है। उनका कहना है कि भेदभाव की गंभीरता को व्यक्ति की जाति से जोड़ना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

याचिका में कहा गया है कि यह नियम यह मानकर चलता है कि सामान्य या उच्च जाति के लोग कभी जाति-आधारित भेदभाव के शिकार हो ही नहीं सकते, जो कि वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों को पूरी तरह नकारता है।

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राज्य प्रायोजित भेदभाव का आरोप

इस मामले में दाखिल एक याचिका में याचिकाकर्ता मृत्युंजय तिवारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यह नियम अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव को वैध बनाता है।

याचिका के अनुसार, 'जब नियम यह स्वीकार करने से ही इनकार करता है कि सामान्य या उच्च जाति के लोग भी जाति-आधारित भेदभाव के शिकार हो सकते हैं, तो यह शत्रुता को सामान्य और वैध ठहराने जैसा है। यह संविधान की दृष्टि से अस्वीकार्य राज्य-प्रायोजित भेदभाव के समान है।'

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संविधान और यूजीसी अधिनियम का उल्लंघन?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नियम न केवल भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है, बल्कि यूजीसी अधिनियम, 1956 की भावना के भी खिलाफ है। उनका तर्क है कि यूजीसी का काम उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना है, न कि किसी वर्ग को कानूनी सुरक्षा से बाहर करना।


फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की तारीख तय नहीं की है। लेकिन यह मामला उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की परिभाषा, कानूनी संरक्षण और समानता के अधिकार को लेकर एक बड़ी संवैधानिक बहस को जन्म दे सकता है।

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