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Anurag Kashyap: अनुराग कश्यप ने प्राण प्रतिष्ठा को बताया विज्ञापन, बोले- धर्म के व्यापार को करीब से देखा है

Fri, 08 Mar 2024 04:02 PM IST
दीक्षा पाठक एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: दीक्षा पाठक Updated Fri, 08 Mar 2024 04:02 PM IST
सार

हाल ही में, कोलकाता में एक कार्यक्रम में बोलते हुए, अनुराग ने कहा कि मंदिर का उद्घाटन एक 'विज्ञापन' था जो भारत को दो गुटों में बांटने के लिए हो रहा है।  

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Anurag Kashyap says Ram Mandir inauguration was an advertisement for all that is happening in India right now
अनुराग कश्यप - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

विस्तार

अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों के अलावा अपने बयानों को लेकर भी खूब चर्चा में रहते हैं। निर्देशक आए दिन कोई न कोई ऐसा बयान देते हैं, जो उनके लिए मुश्किल खड़ा कर देता है। अब हाल ही में, अनुराग कश्यप ने राम मंदिर उद्घाटन को धर्म का कारोबार कह दिया है, जिसके बाद अब उनकी सोशल मीडिया पर खूब आलोचना हो रही है। आइए जानते हैं कि पूरा मामला क्या है।
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राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को बताया विज्ञापन
हाल ही में, कोलकाता में एक कार्यक्रम में बोलते हुए, अनुराग ने कहा कि मंदिर का उद्घाटन एक 'विज्ञापन' था जो भारत को दो गुटों में बांटने के लिए हो रहा है।  अनुराग ने कहा कि लोकतंत्र उस फासीवाद के लिए एक मोर्चा मात्र है, जिसने सत्ता संभाली है। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता में बैठे लोग लोगों की हताशा का फायदा उठा रहे हैं।
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खुद को कहा नास्तिक
जब अनुराग से प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "22 जनवरी को जो हुआ वह एक विज्ञापन था। मैं इसे इसी तरह देखता हूं। जिस तरह के विज्ञापन खबरों के बीच चलते हैं, उसी तरह यह 24 घंटे चलने वाला विज्ञापन था। इनमें से एक मैं नास्तिक क्यों हूं इसका कारण यह है कि मेरा जन्म वाराणसी में हुआ था। मेरा जन्म धर्म की नगरी में हुआ था, मैंने धर्म के व्यापार को बहुत करीब से देखा है। आप इसे राम मंदिर कहते हैं, लेकिन यह कभी राम मंदिर नहीं था। यह रामलला का मंदिर था, और पूरा देश अंतर नहीं बता सकता।”
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धर्म को लेकर कही यह बड़ी बात
फिल्म निर्माता ने आगे कहा, "किसी ने कहा था, 'धर्म दुष्टों का अंतिम सहारा है। जब आपके पास देने के लिए कुछ नहीं बचता है, तो आप धर्म की ओर रुख करते हैं। मैंने हमेशा खुद को नास्तिक कहा है क्योंकि मैंने देखा कि बड़े होकर, निराश लोग मोक्ष की गुहार लगाने के लिए मंदिरों में जाते थे जैसे कि कोई बटन हो जिसे दबाकर वे अपनी सभी समस्याओं को मिटा सकते हैं। क्या कारण है कि वहां कोई हलचल नहीं होती?"
 

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