Country Mafia Review: रवि किशन की दमदार अदाकारी पर टिकी जी5 की सीरीज, भोजपुरी इलाके में ओटीटी की नई दस्तक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार रहे रवि किशन इन दिनों ओटीटी पर छाए हुए हैं। ओटीटी वाले भी जानते हैं कि दुनिया भर में फैले भोजपुरी के दर्शकों को ओटीटी तक खींचकर लाना है तो रवि किशन की लोकप्रियता उनका सबसे बढ़िया दांव है। बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर नकली शराब के धंधे की एक कहानी का ताना बाना हिंदी सिनेमा के दमदार लेखक रहे संजय मासूम ने रचा है। संजय इसके पहले वेब सीरीज ‘आश्रम’ में भी अपने लेखन की धार दिखा चुके हैं। यहां उनके लेखन को प्रकाश झा जैसे निर्देशक का सहारा तो नहीं मिला है लेकिन भोजपुरी सिनेमा के दर्शकों के लिए ये सीरीज उनकी पसंद की कसौटी के आसपास पहुंचने की कोशिश जरूर करती है।
‘मिर्जापुर’ की छाया जैसी सीरीज
वेब सीरीज ‘कंट्री माफिया’ की कहानी अपनी राह पकड़ने में बिल्कुल देर नहीं लगाती है। पहले एपिसोड में ही सारे मुख्य किरदारों का खाका सामने है। सिविल सेवाओं में जाकर कानून के रखवाले बनने की चाह लिए भाई, बहन हालात के चलते अब खुद कानून अपने हाथ में ले चुके हैं। भाई का संस्कृत उच्चारण थोड़ा कमजोर है। फिर भी वह बहन को ‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम् जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’ सुनाता है और अपने लक्ष्य से न डिगने की सलाह देता है। दोनों की मां उनको सिखाती है, ‘कुत्ते का उमर 12 साल, सियार का उमर 13 साल, राजपूत के बच्चे का उमर 30 साल। अब पीछे का रस्ता बंद हो चुका है बस आगे बढ़ना है। मारते हुए। मिट्टी का तेल बाहर रखा है, खून धो लो।’ मारकाट की इसी चौसर पर वेब सीरीज ‘कंट्री माफिया’ की कहानी चलती है। माहौल थोड़ा थोड़ा ‘मिर्जापुर’ सीरीज जैसा दिखता है लेकिन बात बनते बनते अटक जाती है।
रवि किशन की दमदार अदाकारी
ओटीटी पर अब गांव, देहात की कहानियों के दिन फिरने वाले हैं। शहरों की बड़की बड़की कहानियां सब ढेर हो रही हैं। मेट्रो में ओटीटी के ग्राहक अपने उफान पर पहुंच चुके हैं। हर ओटीटी को अब अपने डाउनलोड वहां से चाहिए, जहां पांच सौ रुपये सालाना देने वालों की कमी नहीं है और जहां इंटरनेट भरपूर मात्रा में मारा मारा फिर रहा है। तो इनको ऐप डाउनलोड करने के लिए उकसाने को रवि किशन दिखते हैं, ‘कसम पैदा करने वाले की’ गाने पर डांस करते हुए। बवाल टाइप का किरदार है बब्बन का। बात न बने तो मिट्टी में गर्दन तक गड़े इंसान को झटके में खत्म कर देता है। टोली का दबंग किसी लड़की के चक्कर में मारा जाए तो लाश पर भी चप्पलों की बौछार कर देता है। और, कहानी में एक बाबा भी हैं। इनके इशारे पर सूबे की राजनीति चलती है।
कलाकारों की हड़बड़ से गड़बड़
वेब सीरीज ‘कंट्री माफिया’ की कहानी, निर्देशन, गीत-संगीत और सेटअप बिल्कुल भोजपुरी सिनेमा जैसा है। ‘जामताड़ा’ वाले आयुष्मान पुष्कर हैं। उनकी बहन बनी हैं सौंदर्या शर्मा। आयुष्मान पुष्कर अच्छे अभिनेता हैं। किरदार उन्हें अच्छे मिलने में समय लग रहा है। अभिनय भी वह इस सीरीज में ऐसा करते दिखे हैं कि जैसे जल्दी जल्दी शूटिंग निपटा देनी हो। माइक पर गाते हुए गाने की एक भी लाइन वह लिप सिंक नहीं कर पाते हैं। रवि किशन का मामला थोड़ा अलग है। वह कभी गरीबों के मिथुन चक्रवर्ती कहलाते थे। अब भी उन पर दूसरी कतार के निर्माताओं की ही नजर ज्यादा है। रवि किशन में अभिनय का वह माद्दा है कि उन्हें सही मौका मिले तो वह नेटफ्लिक्स और प्राइम वीडियो की ए लिस्टर सीरीज और फिल्मों में भी कमाल दिखा सकते हैं। सौंदर्या शर्मा का मामला जम नहीं पाया है।
कमजोर निर्देशन के चलते चूकी सीरीज
जी5 के पास बजट की कमी नहीं है। कहानियां भी उन तक अच्छी पहुंच ही रही होंगी। लेकिन, उनका सीरीज बनाने का टेम्पलेट बदलना जरूरी है। वेब सीरीज ‘कंट्री माफिया’ उनकी पहचान बदल देने वाली सीरीज हो सकती थी, लेकिन ऐसी कहानियों को परदे पर कहने के लिए ओटीटी का भरोसा होना जरूरी है। इसके लिए अच्छे लेखन को अच्छे निर्देशक का साथ मिलना जरूरी है। यही कहानी अगर बेहतर तकनीकी टीम के साथ नए नजरिये से गढ़ी गई होती तो इसका नतीजा ही कुछ और होता। स्टॉक म्यूजिक के सहारे अब कहानी का सस्पेंस बनता नहीं है। वह सिर्फ शोर सरीखा बनकर रह जाता है। और, जब तकनीकी रूप से सीरीज मजबूत न हो तो न सतीश कौशिक कुछ मदद कर सकते हैं और न ही अनिता राज की संवाद अदायगी ही राह आसान कर पाती है।