Exclusive:'पंकज त्रिपाठी को कहानी इतनी पसंद आई कि बिना फीस तैयार हो गए', 'ओह माय डॉग' पर बोले अमित राय
Amit Rai Exclusive Interview: 'रोड टू संगम' और 'ओएमजी 2' जैसी चर्चित फिल्में बना चुके निर्देशक अमित राय अब 'ओह माय डॉग' लेकर आ रहे हैं। इंसान और एक देसी कुत्ते के रिश्ते पर बनी यह फिल्म उनके दिल के बेहद करीब है।
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विस्तार
अमर उजाला से खास बातचीत में अमित राय कहते हैं कि यह फिल्म उनके दिल के बेहद करीब है। उनके मुताबिक, इस कहानी की शुरुआत किसी स्क्रिप्ट रूम में नहीं, बल्कि उनके अपने घर से हुई।
उसने मुझे पूरी तरह बदल दिया
अमित राय बताते हैं कि 'ओह माय डॉग' का विचार किसी प्लानिंग का हिस्सा नहीं था। इसकी शुरुआत उनकी अपनी जिंदगी के एक छोटे-से अनुभव से हुई। वह कहते हैं, 'मुझे तारीख तो याद नहीं, लेकिन इसकी शुरुआत मेरे अपने पालतू डॉग से हुई। जब वह मेरी जिंदगी में आया, तो शुरुआत में मुझे लगता था कि मैं उसे पाल रहा हूं, उसे खाना खिला रहा हूं। लेकिन धीरे-धीरे एहसास हुआ कि असल में वह मुझे पाल रहा था।' वह आगे कहते हैं, 'उसकी वजह से मैं सुबह उठने लगा। ऐसी कई चीजें करने लगा, जो शायद मैं कभी नहीं करता। उसने बिना कुछ कहे मेरी जिंदगी बदल दी।'
अनकंडीशनल लव की कोई कीमत नहीं होती
अमित कहते हैं कि उनके लिए यही अनुभव फिल्म की सबसे बड़ी प्रेरणा बना। वह कहते हैं, 'फिर मुझे समझ आया कि अनकंडीशनल लव जैसी चीज दुनिया में कहीं खरीदी नहीं जा सकती। वह प्रेम सिर्फ वही मुझे दे रहा था। उसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। यह सिर्फ इंसान और कुत्ते का रिश्ता नहीं है। यह प्यार और वफादारी का रिश्ता है।'
पंकज त्रिपाठी ने नहीं ली फीस
फिल्म से जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा अभिनेता पंकज त्रिपाठी का है। वह कहते हैं, 'पंकज त्रिपाठी को जब मैंने कहानी सुनाई, तो उन्हें यह इतनी पसंद आई कि उन्होंने बिना कोई फीस लिए फिल्म करने का फैसला किया। एक कलाकार के लिए सबसे बड़ी चीज कहानी पर भरोसा होता है। जब उसे कहानी पर विश्वास हो जाता है, तब वह सिर्फ एक फिल्म का हिस्सा नहीं बनता, बल्कि उस सोच और भावना के साथ भी खड़ा हो जाता है।'
'दर्शक जानवर से नहीं, भावना से जुड़ते हैं'
क्या जानवरों पर बनी फिल्म ऑडियंस को सिनेमाघरों तक ला पाएगी? इस सवाल पर अमित राय का जवाब साफ है। 'मुझे लगता है कि आखिरकार दर्शक भावना से जुड़ते हैं। आप किसी भी सफल फिल्म को देख लीजिए, उसके केंद्र में एक भावना होती है। इंसानी स्वभाव का सबसे बुनियादी तत्व प्रेम है। मुझे लगता है कि यही भावना दर्शकों को इस फिल्म से जोड़ेगी, चाहे वह एनिमल लवर हो या नहीं।'
'फिल्म बनाना मेरे लिए मां के हाथ के खाने जैसा है'
अमित राय का मानना है कि फिल्म की सफलता का फैसला बॉक्स ऑफिस नहीं, उसका इरादा करता है। वह कहते हैं, 'अगर आप फिल्म इस इरादे से बनाते हैं कि यह सिर्फ सफल होनी चाहिए या पैसा कमाना चाहिए, तो शायद वह वैसी फिल्म बन ही नहीं पाती। पूरा खेल इंटेंट का है। सबसे जरूरी बात यह है कि आप फिल्म क्यों बना रहे हैं। अगर आपका इरादा साफ है और कहानी दिल से निकली है, तो वह किसी न किसी रूप में लोगों तक जरूर पहुंचती है।'
अपनी बात को वह एक दिलचस्प उदाहरण से समझाते हैं। 'मां जब खाना बनाती है और होटल में खाना बनता है, दोनों में फर्क होता है। होटल का खाना कितना भी अच्छा क्यों न हो, मां के हाथ के खाने में एक अलग स्वाद और अपनापन होता है...क्योंकि वह किसी अपने के लिए बनता है। उसमें सिर्फ मसाले नहीं, इमोशंस भी होती हैं। मेरे लिए फिल्म बनाना भी बिल्कुल ऐसा ही है। मैं हर फिल्म को अपने किसी बेहद करीबी इंसान के लिए बनाता हूं। अगर वह भावना पर्दे तक पहुंच जाए, तो वही मेरी सबसे बड़ी सफलता है।'
महाभारत की कथा से जुड़ा है फिल्म का संदेश
अमित बताते हैं कि फिल्म का मूल संदेश महाभारत की एक घटना से प्रेरित है। वह कहते हैं, 'यह फिल्म कहीं न कहीं उस कथा से प्रेरित है, जिसमें युधिष्ठिर स्वर्ग के द्वार तक अपने कुत्ते के साथ पहुंचते हैं। उनसे कहा जाता है कि वे अकेले अंदर आ सकते हैं, लेकिन कुत्ते को साथ नहीं ले जा सकते। तब युधिष्ठिर कहते हैं कि यह मेरे साथ पूरी यात्रा में रहा है। इसने अपना धर्म निभाया है। अगर यह मेरे साथ नहीं जाएगा, तो मैं भी स्वर्ग में प्रवेश नहीं करूंगा।' उनके मुताबिक, 'यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि बच्चों और बड़ों दोनों को यह सिखाती है कि हर रिश्ते का एक धर्म होता है। करुणा सिर्फ जानवरों के लिए नहीं होती। जो व्यक्ति जानवरों के प्रति दयालु होगा, वह अपने परिवार, समाज और पूरी मानवता के प्रति भी दयालु होगा।'
250 से ज्यादा कुत्ते आए नजर
'ओह माय डॉग' सिर्फ अपनी कहानी की वजह से ही नहीं, बल्कि अपने निर्माण को लेकर भी चर्चा में है। फिल्म में 250 से ज्यादा कुत्तों को शामिल किया गया है। इनमें ऑस्कर और ब्रूनो जैसे प्रशिक्षित डॉग भी अहम भूमिका निभाते नजर आएंगे।
'सेवा करने वाला कभी बदले की उम्मीद नहीं करता'
बातचीत के आखिर में जब पशु कल्याण और समाज की जिम्मेदारी का जिक्र आया, तो अमित ने सेवा का असली अर्थ समझाया। वह कहते हैं, 'जिनके पास अपनी रक्षा करने की क्षमता नहीं है, उनकी मदद जो करता है, भगवान उसके साथ खड़े होते हैं। सबसे बड़ा पुण्य वही है, जो बिना किसी दिखावे के किया जाए। जो व्यक्ति सच में सेवा करता है, वह कभी यह सोचकर नहीं करता कि बदले में उसे क्या मिलेगा। उसे लगता है कि यह उसका कर्तव्य है।'