Exclusive: ‘बदलाव लाना चाहता हूं’, प्रोड्यूसर बने विक्रांत मैसी ने उठाया बड़ा कदम; अधूरे सपने का किया जिक्र
Vikrant Massey Exclusive Interview: विक्रांत मैसी ने फिल्मों में अलग-अलग और उम्दा किरदार निभाकर दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई है। जल्द ही उनकी एक सीरीज ‘मुसाफिर कैफे’ भी रिलीज हो रही है। इसके जरिए वह प्रोड्यूसर भी बन रहे हैं। इस सीरीज और करियर को लेकर अमर उजाला से विक्रांत मैसी ने कई बातें साझा की हैं।
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विक्रांत मैसी इन दिनों अपनी आने वाली वेब सीरीज 'मुसाफिर कैफे' को लेकर चर्चा में हैं। इस सीरीज के जरिए वह प्रोड्यूसर भी बन चुके हैं। अमर उजाला डिजिटल से हुई हालिया बातचीत सिर्फ उनकी नई सीरीज तक सीमित नहीं रही, उन्होंने प्रोड्यूसर बनने के अनुभव, इंडस्ट्री के कामकाज, अधूरे सपनों और हिमाचल में अपना कैफे खोलने की इच्छा तक कई दिलचस्प बातें साझा की हैं। पढ़िए, विक्रांत मैसी से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश-
प्रोड्यूसर बनने की इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती थी
बतौर प्रोड्यूसर अपनी पहली पारी को लेकर विक्रांत मैसी बेहद उत्साहित हैं। उनके लिए 'मुसाफिर कैफे' सिर्फ एक वेब सीरीज नहीं बल्कि दिल के बेहद करीब एक प्रोजेक्ट है। वह कहते हैं, 'सच कहूं तो मुझे अभी तक यह बात पूरी तरह से महसूस ही नहीं हुई है। अब जब मैं सोचता हूं तो लगता है कि इससे बेहतर शुरुआत शायद हो ही नहीं सकती थी। मैं खुद को बहुत-बहुत खुशकिस्मत मानता हूं। यकीन मानिए, इसके लिए मैंने कोई अलग मेहनत नहीं की है। यह सब नेटफ्लिक्स और मेरे मेंटर विजय सुब्रमण्यम की दरियादिली है। उन्होंने कहा था कि यह मेरे लिए सही सीरीज है।
अभिनेता विक्रांत ने आगे कहा, 'मुझे इससे बेहतर कहानी, प्लेटफॉर्म और टीम शायद नहीं मिल सकती थी। लेकिन एक अभिनेता से ज्यादा आज मैं एक कहानीकार के तौर पर उत्साहित हूं। यह सीरीज मेरे जिगर का टुकड़ा है।'
यूनिट में कलाकार और तकनीकी टीम का खाना अलग नहीं था
प्रोड्यूसर बनने के बाद विक्रांत मैसी कुछ चीजें बदलना चाहते हैं। उनका कहना है कि उनकी यूनिट में सभी लोगों को बराबर सम्मान मिलेगा। वह कहते हैं, 'वैसे तो मैं कई बदलाव लाना चाहता हूं लेकिन सबसे पहले तो मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि यूनिट्स में तकनीकी टीम और कलाकारों के लिए अलग-अलग खाना आता है। मेरे प्रोडक्शन में यह कभी नहीं होगा। हमने 'मुसाफिर कैफे' में भी यही किया, जो खाना मैं खा रहा हूं, वही खाना लाइटमैन भी खाएगा।'
सफलता का श्रेय सबको मिलना चाहिए
विक्रांत का मानना है कि किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता पूरी टीम की मेहनत से मिलती है। वह कहते हैं, 'मैं खुद एक अभिनेता हूं। शायद मैंने भी कभी गलतियां की होंगी। लेकिन समय पर आना और लोगों के वक्त और मेहनत की इज्जत करना बहुत जरूरी है। सच तो यह है कि अभिनेता सबसे आखिर में आता है। उससे पहले लेखक कई साल तक लिखता है। फिर प्रोड्यूसर, प्लेटफॉर्म, डिस्ट्रीब्यूटर और पूरी टीम मेहनत करती है। फिर भी सबसे ज्यादा तवज्जो अभिनेता को मिलती है क्योंकि पर्दे पर उसका चेहरा दिखता है। यह हमारी इंडस्ट्री का चलन है। लेकिन कोई भी किसी से कम नहीं है। हर इंसान बराबर अहमियत रखता है। यही जिम्मेदारी का अहसास मैं अपनी कंपनी में लाना चाहूंगा। पता नहीं मैं इसे कितनी अच्छी तरह निभा पाऊंगा लेकिन नीयत अच्छी है।'
जिंदगी जहां लेकर गई मैं वहीं चलता गया
विक्रांत का कहना है कि उन्होंने जिंदगी में कभी बहुत ज्यादा प्लानिंग नहीं की। वह हमेशा वक्त के साथ आगे बढ़ते रहे। वह कहते हैं, 'अगर मैं इसे शब्दों में कह पाऊं तो मैंने हमेशा ऊपरवाले पर भरोसा करके ही अपनी जिंदगी जी है। चाहे काम हो, रिश्ते हों, मैंने कभी बहुत ज्यादा प्लानिंग नहीं की। मुझे बहुत जल्दी समझ आ गया था कि ऊपरवाले की प्लानिंग हमारी प्लानिंग से ज्यादा बेहतर होती है। इसलिए जिंदगी जहां लेकर गई, मैं खुशी-खुशी वहां चलता गया। शायद मैं उसी तरह का मुसाफिर हूं।'
सोलो ट्रैवल ना कर पाने का अफसोस है
कम उम्र में काम शुरू करने की वजह से विक्रांत मैसी की कई ख्वाहिशें अधूरी रह गईं। इनमें सोलो ट्रैवल और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने का सपना भी शामिल है। वह बताते हैं, 'काश मुझे सोलो ट्रैवल करने का मौका मिलता। मैं लगभग 16 साल की उम्र से काम कर रहा हूं। आज भी काम कर रहा हूं। हां, अब ट्रैवल जरूर कर रहा हूं। लेकिन अपने टीनएज के दिनों में उस तरह की सोलो ट्रैवलिंग कभी नहीं कर पाया। इस बात का हल्का-सा दुख जरूर है।'
सोलो ट्रैवल की तरह पढ़ाई का सपना भी अधूरा रह गया। इस बारे में उन्होंने कहा, 'मैं और ज्यादा पढ़ना चाहता था। बचपन में ऑक्सफोर्ड के कंपोज बॉक्स आते थे। उन पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का प्रतीक चिह्न बना होता था। तब से मेरा सपना था कि मैं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जाऊं। वहां पढ़ाई करूं। शायद कानून की पढ़ाई करूं। लेकिन वो हो नहीं पाया।'
अगर आज मौका मिले तो क्या पढ़ना चाहेंगे? इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'कानून। अगर मौका मिले तो मैं कानून की पढ़ाई जरूर करना चाहूंगा।'
'12वीं फेल' की सफलता ने विक्रांत को कितना बदला है
राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद भी विक्रांत का कहना है कि उनके काम करने का तरीका नहीं बदला है। वह कहते हैं, 'मेरा हमेशा से सपना था कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। जब मिला तो बहुत खुशी हुई। मैं बहुत शुक्रगुजार हूं। मैं थोड़ा पुराने विचारों का इंसान हूं। शायद मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार इसलिए भी मिला क्योंकि मैंने हमेशा अपनी बुनियाद पर ध्यान दिया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कार मिलने के बाद दुनिया को देखने का नजरिया बदल गया है। जिस वजह से यह सम्मान मिला, उसी पर मेरा ध्यान और बढ़ गया है। मैं अपनी बुनियाद पर कायम रहना चाहता हूं। माध्यम चाहे कोई भी हो, मेरा पूरा ध्यान अपने अभिनय पर रहता है।'
हिमाचल में खोलना चाहते हैं अपना 'मुसाफिर कैफे'
बातचीत के दौरान विक्रांत ने अपने एक निजी सपने का भी जिक्र किया। वह भविष्य में हिमाचल में अपना कैफे खोलना चाहते हैं। वह खुश होते हुए कहते हैं, ‘'मेरा बहुत मन है कि अपना कैफे खोलूं। मेरी पत्नी हिमाचल से हैं। मेरे पास इसका पूरा खाका तैयार है। मेरा बहुत मन है कि हिमाचल में, धर्मकोट या धर्मशाला के आसपास एक कैफे खोलूं। चंबा की तरफ भी हो सकता है। कुफरी में भी हो सकता है।'
कैफे का नाम क्या होगा? इस सवाल पर वह हंस पड़े। कहते हैं, ‘भारत में कम से कम 16-17 मुसाफिर कैफे हैं। तो एक 'मुसाफिर कैफे' की फ्रैंचाइजी मैं भी खोल ही सकता हूं। मैं खुद वहां बैठूंगा।'