Exclusive: ‘मैंने बोला गाना शाहरुख का है फिर भी…’, कंपोजर निखिल कामत ने सुनाए आशा ताई के किस्से
Musical composer Nikhil Kamath Exclusive Interview: प्रतिष्ठित गायिका आशा भोसले के निधन के बाद म्यूजिक कंपोजर निखिल कामत ने उनसे जुड़ी यादें अमर उजाला के साथ साझा की हैं। चर्चित कंपोजर ने क्या कहा? पढ़िए
विस्तार
आशा भोसले हमारे बीच नहीं रहीं। अपनी खनकती आवाज से हजारों गानों को सुरबद्ध करने वाली प्रख्यात गायिका के निधन पर म्यूजिक कंपोजर निखिल कामत ने दुख जाहिर किया है। साथ ही आशा ताई की दरियादिली से जुड़ी यादें भी साझा की हैं। अमर उजाला डिजिटल से बात करते हुए म्यूजिक कंपोजर निखिल कामत ने दिग्गज गायिका से जुड़े कुछ किस्से साझा किए हैं। पढ़िए उन्हीं की जुबानी
'वो हमेशा सीखने वाली थीं, चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों'
जब मैं आशा भोसले को याद करता हूं, तो सबसे पहले उनकी सीखने की भूख याद आती है। इतनी बड़ी लेजेंड होने के बावजूद... वो हर गाने को ऐसे लेती थीं, जैसे पहली बार गा रही हों। पहले कहती थीं, मुझे गाना सिखाओ। ये आज के समय में सोच भी नहीं सकते।
'स्टार, बैनर... उनसे कोई फर्क नहीं पड़ता था'
आजकल लोग सौ सवाल पूछते हैं, कौन स्टार है, कितना बड़ा बैनर है। लेकिन आशा जी को इन चीजों से कोई लेना-देना नहीं था। मैंने जब उन्हें बताया कि फिल्म में शाहरुख खान और रवीना टंडन हैं, तब भी उनका फोकस सिर्फ गाने पर था। उनके लिए सिर्फ म्यूजिक मायने रखता था।
'पहली बातचीत में ही घर बुला लिया'
मैं उन्हें 'जादू है ये' गाने के लिए फोन पर लाइन-बाय-लाइन समझा रहा था। उन्होंने पूछा, कहां रहते हो। मैंने कहा ब्रीच कैंडी, तो बोलीं...अच्छा तुम तो मेरे पड़ोसी हो। रात 10 बजे बात हुई और 11 बजे उन्होंने घर बुला लिया। इतनी बड़ी कलाकार और इतनी सहजता।
'घर पर खाना, हारमोनियम और पूरा गाना'
मैं उनके घर गया, उन्होंने खाना खिलाया और तुरंत हारमोनियम लेकर बैठ गईं। पूरा गाना वहीं सीख लिया, स्केल फाइनल कर लिया। गाना थोड़ा नॉटी था, लेकिन उन्होंने तुरंत पकड़ लिया। कोई स्टार वाला एटीट्यूड नहीं, बस काम'।
'स्टूडियो में घंटों बैठकर हर इमोशन समझती थीं'
रिकॉर्डिंग के दिन उन्होंने खुद कहा, मैं आऊंगी। वो 4 बजे आईं और 8 बजे तक बैठी रहीं। सिर्फ अपना पार्ट गाकर नहीं गईं, बल्कि पूरा डबिंग प्रोसेस समझा। हर साउंड, हर इमोशन। ये कमिटमेंट आज बहुत कम देखने को मिलता है।
'इंग्लिश बाबू देसी मैम' में भी वही जुनून...
फिर हमने 'इंग्लिश बाबू देसी मैम' में साथ काम किया, जिसमें शाहरुख खान और सोनाली बेंद्रे थे। कैसे मुखड़े से नजरें हटाऊं गाना था। उन्होंने फिर घर बुलाया, खाना खिलाया। गाना सीखा और स्केल पर खुद काम किया। एक हाई नोट था, तो उन्होंने कहा जरूरत हो तो स्केल बदल लेते हैं, बस गाना परफेक्ट होना चाहिए।
'नए लोगों को मौका देना उनका स्वभाव था'
वो नए म्यूजिक डायरेक्टर को भी पूरा सम्मान देती थीं। कभी ये महसूस नहीं होने देती थीं कि आप छोटे हैं। ऐसा लगता था जैसे एक टीचर आपको गाइड कर रहा हो, बहुत प्यार से।
रिश्ते निभाना भी जानती थीं
एक मराठी फिल्म के लिए, जिसमें मैं म्यूजिक डायरेक्टर भी नहीं था, मैंने बस रिक्वेस्ट किया, दीदी एक गाना है। उन्होंने बिना कुछ पूछे गा दिया। उनके लिए रिश्ते और भरोसा ज्यादा मायने रखते थे।
आज लगता है, एक दौर चला गया
जब वो मेरे दिल को करे बेकाबू गाती थीं, तो वो सिर्फ गाना नहीं होता था, एक एहसास होता था। आज जब वो नहीं हैं, तो लगता है सिर्फ एक आवाज नहीं गई, पूरा एक दौर चला गया। उनके लिए सिर्फ म्यूजिक था और शायद इसी वजह से वो हमेशा जिंदा रहेंगी।