‘बॉलीवुड का गवर्नर बना बॉक्स ऑफिस कल्चर बदलूंगा’, 'गवर्नर' की रिलीज से पहले मनोज बाजपेयी ने फिल्म पर रखी राय
Manoj Bajpayee Interview: आर्थिक संकट और देश की अर्थव्यवस्था जैसे विषय आमतौर पर फिल्मों का हिस्सा कम ही बनते हैं। ऐसे ही एक मुद्दे पर आ रही मनोज बाजपेयी की आगामी फिल्म 'गवर्नर' चर्चा में है।
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1991 के आर्थिक संकट की अनकही और सच्ची घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म एक ऐसे शख्स की कहानी कहती है, जिसके सामने देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की चुनौती है। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म ऐसे वक्त रिलीज हो रही है, जब देश में अर्थव्यवस्था और आर्थिक चुनौतियों पर चर्चा तेज है। हालांकि मनोज इसे महज संयोग मानते हैं। उनके मुताबिक, फिल्म की कहानी पर काम कई साल पहले शुरू हो चुका था।
अमर उजाला से बातचीत में मनोज बाजपेयी ने फिल्म की तैयारी, संघर्ष के दिनों, बॉक्स ऑफिस कल्चर और अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स को लेकर खुलकर बात की। पढ़िए मनोज की जुबानी...
'इकोनॉमिक्स में सिर्फ नंबर्स नहीं होते'
'मुझे इस फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत अच्छी लगी। मुझे लगा कि यह एक आर्थिक संकट जैसे अहम विषय पर बात कर रही है। इस तरह का किरदार हमने पहले ज्यादा नहीं देखा है। जब इकोनॉमिक्स की बात आती है तो लोगों को लगता है कि इसमें बहुत ज्यादा हिसाब-किताब और नंबरों का चक्कर होगा। ऑडियंस समझेंगे या नहीं समझेंगे, ये भी सवाल रहता है। लेकिन जिस तरीके से इस फिल्म को लिखा गया है, वो अपने आप में लाजवाब है। आम ऑडियंस भी समझ पाएगा कि हम एक संकट में हैं और उससे देश को निकालना है। इसमें एक 'रेसिंग अगेंस्ट टाइम' जैसा एहसास है। जैसे किसी के पास बहुत कम समय हो और उसे कुछ बचाना हो। फर्क सिर्फ इतना है कि इसका बैकग्राउंड पूरी तरह अर्थव्यवस्था और RBI की दुनिया है।'
एक्टर को हर चीज का एक्सपर्ट होना जरूरी नहीं
'मैथेमेटिक्स में मैं बहुत बुरा रहा हूं। इकोनॉमिक्स में नंबरों का खेल, उसके कॉन्सेप्ट्स समझना आसान नहीं होता। लेकिन जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं, आपको दुनिया को समझना पड़ता है। जीएसटी, जीडीपी जैसी चीजें हमने भी लोगों से समझीं, अखबार पढ़कर समझीं। मेरा मानना है कि एक एक्टर को हर चीज का एक्सपर्ट होना जरूरी नहीं है, लेकिन हर चीज की जानकारी होनी चाहिए। जब आप कोई रोल करते हैं तो उसका अपना प्रोफेशन, अपनी दुनिया होती है। उदाहरण... अगर आप किसी वकील का रोल कर रहे हैं तो आपको ये पता होना चाहिए कि कोई केस हाई कोर्ट में क्यों जाता है और सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचता है। 'गवर्नर' करते हुए मुझे आरबीआई के कामकाज और अर्थव्यवस्था की कई बातें समझने का मौका मिला।'
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आज के बच्चों को यकीन भी न हो
‘इस फिल्म में हम जिस समय की बात कर रहे हैं, उस समय बहुत सी चीजें शुरू भी नहीं हुई थीं। उसके बाद बाजार खुला, दुनिया के देश एक-दूसरे से जुड़े, व्यापार बढ़ा और बहुत कुछ बदल गया। आज के किसी बच्चे को आप उस समय की कहानी सुनाएंगे तो शायद उसे यकीन भी न हो। लेकिन ये जानना जरूरी है कि कोई भी बदलाव अचानक नहीं आता। उसके पीछे बहुत सारे लोगों की मेहनत, त्याग, सोच, दिमाग और जुनून होता है। इसलिए मुझे लगता है कि ये फिल्म बहुत जरूरी है।’
आईएएस, आईपीएस और जजों तक के मैसेज आ रहे हैं
'जब गवर्नर का ट्रेलर रिलीज हुआ, तो मुझे कई सारे मेसेजेस आए। वो सिर्फ आम ऑडियंस से नहीं हैं। मेरे बहुत सारे आईएएस, आईपीएस दोस्त हैं, जज हैं और पॉलिटिशियन हैं। उन सबके भी मैसेज आ रहे हैं कि 'ये तो देखा जाएगा'। मेरे ख्याल से फिल्म को लेकर लोगों के मन में एक उत्सुकता जरूर पैदा हुई है और यही सबसे बड़ी बात है।'
ये फिल्म आज के हालात देखकर नहीं लिखी गई
'ये फिल्म मुझे साढ़े चार साल पहले ऑफर हुई थी। यानी की इसकी कहानी और लेखन का काम तो उससे भी पहले शुरू हो चुका था। इसलिए इसका आज के हालात से कोई सीधा संबंध नहीं है। हां, इतना जरूर है कि इकोनॉमिक क्राइसिस का जो मसला है, उससे लोग जुड़ पाएंगे। परिस्थितियां दोनों समय की अलग हैं, लेकिन आर्थिक संकट का विषय ऐसा है जिससे लोग आसानी से रिलेट कर सकते हैं।'
इंडस्ट्री का गवर्नर बना तो यह काम करूंगा
‘अगर मैं कभी इंडस्ट्री का गवर्नर बना तो सबसे पहले मैं बॉक्स ऑफिस कल्चर को बंद करवा दूंगा। इन आंकड़ों का प्रचार-प्रसार बंद करवा दूंगा। आम ऑडियंस का इससे कोई लेना-देना नहीं है। किसी फिल्म ने 500 करोड़ कमाए तो भी ऑडियंस की जिंदगी नहीं बदलती। मौका मिले तो मैं इसी कल्चर को बदलने की कोशिश करूंगा।’
घर पर बैठा रहा, खूब बेरोजगारी देखी
‘फिल्म में मेरा किरदार देश को एक बड़े आर्थिक संकट से बाहर निकालने की कोशिश करता है। रियल लाइफ में भी मैंने ऐसे कई दौर देखे हैं। लेकिन मैं थोड़ा मोटी चमड़ी का आदमी रहा हूं, क्योंकि जो मन करता है वही करता रहा हूं। 1993 में मुंबई आया था। उस समय जिस तरह की फिल्में बन रही थीं, उसमें अपने मन का काम कर पाना बहुत मुश्किल था। फिर भी जब मौका मिला तो मैंने 'सत्या', 'शूल', 'जुबैदा', 'दिल पे मत ले यार', 'पिंजर' और 'रोड' जैसी फिल्में कीं।
उस समय ऐसी फिल्में ज्यादा बनती नहीं थीं इसलिए लंबे समय तक घर पर बैठा रहा। बेरोजगारी भी देखी। इतनी ऊंचाई हासिल करने के बाद गिरा भी, लेकिन मैं कभी घबराया नहीं।’
‘मेरी चार फिल्में रिलीज के लिए तैयार हैं। प्लान के हिसाब से तो अब तक दो फिल्में आ जानी चाहिए थीं। कई बार चीजें रुक जाती हैं और कई बार अच्छी वजह से रुकती हैं। फिल्म देखने के बाद लगता है कि इसे और बेहतर किया जा सकता है, कुछ चीजें सुधारी जा सकती हैं।’