Love All Review: के के मेनन की बड़े परदे पर शानदार वापसी, ‘स्पेशल ऑप्स 2’ से पहले पूरा किया मिशन बैडमिंटन
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अभिनेता के के मेनन लौट आए हैं। फिल्म 'लव ऑल' के जरिए उनकी चार साल बाद बड़े पर्दे पर वापसी हुई है और के के मेनन के अभिनय के मुरीद रहे दर्शकों के लिए ये फिल्म किसी जश्न से कम नहीं है। बाप-बेटे की भावुक कहानी है और पृष्ठभूमि बैडमिंटन की है। इस फिल्म के जरिए बैडमिंटन के वास्तविक रोमांच को पर्दे पर साकार किया गया है। साथ ही इस फिल्म में बैडमिंटन के खेल को बड़ी ही शिद्दत के साथ पेश किया गया है। हिंदी के अलावा यह फिल्म तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला और उड़िया भाषाओं में एक साथ रिलीज हुई है। के के मेनन की वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ के तीसरे सीजन का दर्शक इन दिनों बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं और ऐसे में इस फिल्म की रिलीज उनके प्रशंसकों के लिए किसी तोहफे से कम नहीं है।
फिल्म 'लव ऑल' कहानी उस सिद्धार्थ शर्मा की है जिसे बैडमिंटन खेल को लेकर एक जुनून था। सत्ता में बैठे लोगों की अस्वीकृति और उपेक्षा से असंतुष्ट होकर वह चिड़चिड़ा और एक अलग थलग रहने वाला व्यक्ति बन जाता है। इसका असर उसके परिवार पर भी पड़ता है। खेल के प्रति उसकी पीड़ा और नफरत उसके परिवार पर हावी हो जाती है और वह अपने बेटे को ये खेल खेलने से मना कर देता है। लेकिन, नियति उसे फिर से उसी शहर भोपाल में वापस ले आती है जहां उसके सपने टूट कर बिखर गए थे। उसने सोचा भी नहीं था कि इसी शहर में उसे इन हालात में दोबारा आना होगा।
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अक्सर इंसान अपनी हार को अपने बच्चों में भी देखना शुरू कर देता है। जीवन में चाहे उसे जिस भी वजह से हार या निराशा मिली हो, उसे लगता है कि उस रास्ते पर चलकर उसके बच्चों को भी निराशा ही हाथ लगेगी। सिद्धार्थ ने अपने बेटे को खेल खेलने से मना कर दिया, उसे लगता है कि खेल या कोई भी गतिविधि, उसे पढ़ाई के स्थापित रास्ते से भटका देती है। उनका मानना है कि अपने बेटे को खेल से बचाना ही उसके लिए गरिमा और सम्मान का जीवन सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका है। जब आदित्य शर्मा की टीचर सिद्धार्थ शर्मा से पूछती है कि वह अपने बेटे को खेलने से मना करके उसे क्यों चोट पहुंचाना चाहता है। सिद्धार्थ शर्मा कहता कि चोट नहीं पहुंचा रहा हूं, बल्कि आगे जो चोट लगने वाली है, उससे बचा रहा हूं। लेकिन, एक समय के बाद सिद्धार्थ शर्मा को अपनी गलती का अहसास होता है और वह अपने बेटे का ही कोच बन जाता है, खेल में भी और जीवन में भी।
इस फिल्म की पृष्ठभूमि भले ही बैडमिंटन खेल पर हो। लेकिन इस फिल्म के माध्यम से निर्देशक सुधांशु शर्मा ने यह बताते की कोशिश की है कि खेल एक साधारण आदमी को भी खिलाड़ी बना सकती है। और, खेल का मैच तो ऐसा होता है कि जिसे अपने ही विरुद्ध लड़कर जीतना पड़ता है। फिल्म के निर्देशक ने बैडमिंटन खिलाड़ी के खेल के सही जज्बे को उचित तरीके से पर्दे पर पेश किया है। इंटरवल के बाद फिल्म सही रफ्तार पकड़ती है और खेल से जुड़े तमाम सीक्वेंस की शूटिंग के दौरान खेल के तकनीकी पक्ष को बहुत ही बारीकी से दिखाया गया है। मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद चूंकि इस फिल्म से जुड़े हैं, लिहाजा खेल के तकनीकी पक्ष को उन्होंने कमजोर नहीं होने दिया। फिल्म का क्लाइमेक्स भी जबर्दस्त रोमांच पैदा करता है।