Satluj Movie Review: रूह कांप जाए इतना सच दिखाती है फिल्म; दिलजीत ने जीता दिल, 'धुरंधर’ वाले सुविंदर ने डराया
Satluj Review in Hindi: दिलजीत दोसांझ की नई फिल्म ‘सतलुज’ रिलीज हो चुकी है। इसे 3 जुलाई की रात में अचानक नाम बदलकर रिलीज किया गया। जितना चौंकाने वाला मेकर्स का यह फैसला था उतनी ही चौंकाने वाली यह फिल्म है। यहां पढ़ें इस फिल्म का रिव्यू
विस्तार
कुछ फिल्में आपको चौंकाती हैं, कुछ फिल्में आपको डराती हैं और कुछ फिल्में आपको झकझोर कर रख देती हैं। दिलजीत दोसांझ की नई फिल्म ‘सतलुज’ डराती भी है, चौंकाती भी है और झकझोरती भी है। इस फिल्म को देखने के बाद यह साफ हो जाता कि इसे कई वर्षाें तक सिनेमाघरों में रिलीज करने की परमिशन क्यों नहीं मिली। शायद यह फिल्म हद से ज्यादा सच दिखाती है और इसी वजह से मेकर्स को इसे ओटीटी पर रिलीज करना पड़ा। यकीन मानिए ‘सतलुज’ एक एक ऐसी फिल्म है, जिसे नहीं देखा तो आप कई बातों से अज्ञान रह जाएंगे।
कहानी
कहानी 1995 के दौर के पंजाब पर आधारित है। जसवंत सिंह (दिलजीत दोसांझ) नाम का एक शख्स अपनी एक रिश्तेदार को ढूंढने निकलता है। पड़ताल में उसे पता चलता है कि महज चार जिलों में 6000 ऐसे लोग हैं जिनका पुलिस ने पहले एनकाउंटर किया और फिर उनका परिवार होने के बावजूद लावारिस लाश बताकर अंतिम संस्कार तक कर दिया।
जसवंत उन सभी परिवारों की तरफ से पुलिस के खिलाफ कोर्ट केस लड़ता है। इसी बीच एक दिन अचानक खुद जसवंत ही गायब हो जाता है। पुलिस उसे महीनों तक नहीं ढूंढ पाती।
जसवंत के साथ क्या हुआ? वह कहां और किस हालत में है? जिन परिवारों के लिए वह लड़ाई लड़ रहा था क्या उनको इंसाफ मिलेगा? यह सब जानने और पंजाब के इतिहास का एक काला सच जानने के लिए आप फिल्म देख सकते हैं।
अभिनय
आखरी बार जब ‘अमर सिंह चमकीला’ में दिलजीत दोसांझ का अभिनय देखा था तो सोचा था कि वह इससे बेहतर क्या ही करेंगे? पर शायद दिलजीत वो अभिनेता हैं जो अपनी हर फिल्म के साथ आपको चौंकाने की ताकत रखते हैं। इस फिल्म में उनकी मासूमियत आपका दिल जीत लेगी और और क्लाइमैक्स सीन देखकर आपका दिल ही टूट जाएगा।
अर्जुन रामपाल की फिल्में काफी देरी से एंट्री होती है पर वो मंझे हुए कलाकार हैं और अपना काम बेहतरीन तरीके से करना जानते हैं।
फिल्म ‘धुरंधर’ में मेजर इकबाल बने अर्जुन रामपाल के पिता का रोल निभाने वाले सुविंदर विक्की इससे पहले नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘कोहरा’ में भी एस आई बालवीर सिंह का किरदार निभा चुके हैं।
इस फिल्म में उन्होंने पुलिस ऑफिसर एसएस सुग्गा का किरदार निभाया। सुविंदर ही इस फिल्म का सबसे बड़ा इक्का हैं। एक कलाकार जब कोई नेगेटिव रोल ऐसे निभाए की आपको उस किरदार से नफरत करवा दे, यही उसकी सबसे बड़ी जीत है।
इसके अलावा फिल्में कंवलजीत सिंह, वरुण बडोला और जगजीत संधू जैसे कलाकारों ने भी बढ़िया काम किया है। फिल्म का कोई भी कलाकार अपने काम से भटकता नहीं है।
निर्देशन
पंजाब का माहौल, लोगों में पुलिस का खौफ और पुलिस की क्रूरता; सब कुछ निर्देशक हनी त्रेहान ने इस तरह दिखाया कि फिल्म के अंत तक आप रो ही पढ़ते हैं। हनी ने इस फिल्म में सस्पेंस भी रखा है, इमोशन भी रखा है और दोनों को सच्चाई के साथ लपेटकर पेश कर दिया।
कहानी अच्छी लिखी हुई है और उस पर अभिनेताओं ने भी भरपूर साथ दिया है। एक दो जगह फिल्म थोड़ी सी लंबी महसूस होती है पर बाद में समझ आता है कि ये कहानी की मांग थी।
कुछ इंटेरोगेशन सीन ऐसे हैं जिनमें आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। क्लाइमैक्स सीन इतना इमोशनल है कि ना चाहते हुए भी आपकी आंखों से आंसू निकल आते हैं।
देखें या नहीं
यह फिल्म सिर्फ पंजाब या एक शख्स की कहानी नहीं कहती, बल्कि इंसानियत की कहानी कहती है। हिंदुस्तान के हर शख्स को इसे एक बार जरूर देखना चाहिए। उसे बहुत दर्द महसूस करना चाहिए जो एक वक्त में पंजाब और वहां के मासूम लोगों ने महसूस किया था।