Baby Do Die Do Review: हुमा कुरैशी ने बिना डायलॉग के दिखाया दम, एक्शन में भी छाईं; जानिए फिर कहां डूबी फिल्म?
Movie Baby Do Die Do Review: आज सिनेमाघरों में आलिया भट्ट की ‘अल्फा’ के अलावा हुमा कुरैशी की फिल्म ‘बेबी डू डाई डू’ भी रिलीज हुई। जानिए, कैसी है ये फिल्म? पढ़िए फिल्म ‘बेबी डू डाई डू’ का रिव्यू।
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बॉलीवुड में अक्सर एक बीमारी देखने को मिलती है, फिल्ममेकर को लगता है कि अगर कैमरा टेढ़ा कर दिया जाए, बैकग्राउंड में नियॉन लाइट्स जला दी जाएं और किरदार को थोड़ा ‘ऑफबीट’ बना दिया जाए, तो दर्शक कहानी पूछना ही भूल जाएंगे। 'बेबी डू डाई डू’ इसी सोच का ताजा उदाहरण है।
निर्देशक नचिकेत सामंत ने यहां एक ऐसी फिल्म परोसी है जो दिखने में ‘कूल’ है, सुनने में अलग है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे अहसास होने लगता है कि स्टाइल के पीछे कहानी काफी कमजोर है। हां, एक बात जरूर है कि पूरी फिल्म का भार आखिर तक हुमा कुरैशी ही संभालती नजर आती हैं।
कहानी: मुंबई के अंडरवर्ल्ड का वही पुराना खेल
कहानी है बेबी कर्माकर (हुमा कुरैशी) की, जो एक डेफ-म्यूट यानी सुन और बोल नहीं सकने वाली महिला है। बाहर से साधारण जिंदगी जीती है लेकिन असल में मुंबई के अंडरवर्ल्ड में एक कॉन्ट्रैक्ट किलर है। बेबी अपने बॉस पी.एम जैन (चंकी पांडे) के लिए लोगों को मौत के घाट उतारती है। लेकिन उसके अंदर कई साल पुराना जख्म है। अपनी जुड़वा बहन की हुई हत्या का दर्द उसे भीतर से लगातार खाता रहता है। मामला तब उलझता है जब एक बड़े बिल्डर जफर कटकर (सिकंदर खेर) के लिए किया गया एक असाइनमेंट उसे पुलिस, दुश्मनों और अपने अतीत के बीच फंसा देता है। कहानी सुनने में जितनी दिलचस्प लगती है, स्क्रीन पर उतनी देर टिक नहीं पाती है। इंटरवल तक लगता है कुछ बड़ा होने वाला है। इंटरवल के बाद समझ आता है कि फिल्म ने अपना सबसे बड़ा पत्ता बहुत जल्दी खोल दिया था।
एक्टिंग: हुमा कुरैशी अकेले पूरी सेना बनकर लड़ती हैं
अगर इस फिल्म में कुछ लगातार अच्छा है, तो वो हैं हुमा कुरैशी। गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘महारानी’ और ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ जैसी प्रोजेक्ट्स के बाद हुमा एक बार फिर साबित करती हैं कि अलग तरह के किरदार निभाना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। बिना डायलॉग के सिर्फ चेहरे, आंखों और बॉडी लैंग्वेज से किरदार निभाना आसान नहीं होता लेकिन हुमा यहां पूरी ईमानदारी से मेहनत करती दिखती हैं। कई सीन ऐसे हैं जहां फिल्म कमजोर पड़ती है लेकिन हुमा उसे गिरने नहीं देती हैं।
चंकी पांडे ने अपने ग्रे शेड किरदार में कमाल किया है। वह स्क्रीन पर आते ही अलग एनर्जी लाते हैं। सिकंदर खेर ठीक हैं, लेकिन उनका किरदार जितना खतरनाक लिखा गया है, उतना प्रभाव छोड़ नहीं पाता। बाकी कलाकार अच्छे होने के बावजूद कमजोर लिखे गए किरदारों की वजह से ज्यादा असर नहीं छोड़ पाते हैं।
निर्देशन: नचिकेत सामंत को ‘स्टाइल’ से प्यार थोड़ा ज्यादा है
नचिकेत सामंत ने साफतौर पर जॉन विक, कोरियन नोयर सिनेमा और टारन्टिनो टाइप हिंसक डार्क कॉमेडी से प्रेरणा ली है। मुंबई को उन्होंने काफी दिलचस्प तरीके से शूट किया है। कई फ्रेम शानदार हैं। एक्शन डिजाइन अच्छा है। फिल्म तकनीकी तौर पर बेहतरीन लगती है। समस्या यह है कि निर्देशक कैमरे और विजुअल्स पर इतना फोकस करते हैं कि कहानी धीरे-धीरे बैकसीट पर चली जाती है। कई जगह फिल्म ऐसा व्यवहार करती है जैसे ऑडियंस सिर्फ चमक-दमक देखने आई है, कहानी से उनका कोई लेना-देना नहीं।
स्क्रीनप्ले: पहले आधे घंटे में तेज रफ्तार, फिर कहानी पंचर
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका स्क्रीनप्ले है। शुरुआत तेज है। किरदार दिलचस्प लगते हैं। रहस्य बनता है लेकिन फिल्म बहुत जल्दी अपने कार्ड्स खोल देती है। इसके बाद जहां सस्पेंस बढ़ना चाहिए था, जहां भावनात्मक जुड़ाव बनना चाहिए था, वहां कहानी बार-बार एक ही दायरे में घूमती रहती है। दूसरा हाफ कई जगह खिंचा हुआ महसूस होता है। डार्क ह्यूमर डालने की कोशिश हुई है, लेकिन कई जगह पंचलाइन से ज्यादा स्क्रीनप्ले खुद घायल नजर आता है। फिल्म धीरे-धीरे थका देती है।
संगीत और तकनीकी पक्ष: यहां फिल्म नंबर ले जाती है
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है और कई सीन्स को बेहतर बनाता है। सिनेमैटोग्राफी भी काफी अच्छी है। फिल्म का डार्क और स्टाइलिश अंदाज स्क्रीन पर प्रभाव छोड़ता है। एक्शन सीन भी ठीक तरीके से फिल्माए गए हैं और उनमें मेहनत नजर आती है। लेकिन समस्या यही है कि सिर्फ अच्छे विजुअल्स किसी कमजोर फिल्म को बेहतर नहीं बना सकते। जब कहानी ही लगातार पकड़ खोती जाए, तो तकनीकी मजबूती भी फिल्म को ज्यादा देर तक बचा नहीं पाती है।
देखें या नहीं
'बेबी डू डाई डू' उन फिल्मों में है जो ट्रेलर में जितना वादा करती हैं, असल फिल्म में उसका आधा भी पूरा नहीं कर पाती है। हुमा ने अपने किरदार में पूरी ईमानदारी और मेहनत दिखाई है। लेकिन अफसोस कि कमजोर लेखन और बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले उनकी कोशिशों पर भारी पड़ जाता है। अगर आप सिर्फ हुमा कुरैशी के लिए फिल्म देखना चाहते हैं, तभी इसे एक मौका दिया जा सकता है। वरना सच यही है कि स्टाइल और चमक-दमक के पीछे छिपी यह फिल्म कहानी के मोर्चे पर इतनी कमजोर पड़ जाती है कि खत्म होने तक ज्यादा याद सिर्फ इसकी कमियां रह जाती हैं।