Special Ops 1.5 Review: हिम्मत सिंह की क्षेपक कथा में कमाल बस के के मेनन का, डेढ़ पर अटक गई कहानी
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राष्ट्रवादी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) एजेंट हिम्मत सिंह और मुस्लिम आतंकवादी, स्पेशल ऑप्स के पहले सीजन की तरफ आकर्षित करने के लिए ये दो चीजें बिल्कुल ठीक रहीं। दूसरे सीजन की बहुप्रचारित लॉग लाइन है कि हिम्मत सिंह आखिर हिम्मत सिंह बना कैसे? वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ को पसंद करने वाले दर्शकों के लिए ये वैसा ही चारा है जैसे कि कोई कहे कि ‘शोले’ में गब्बर सिंह आखिर गब्बर सिंह बना कैसे या फिर की जय और वीरू आखिर जय और वीरू बने कैसे? जाहिर सी बात है आइडिया जोरदार है। सीरीज की कहानी सावन के झूलों की तरह पींगे तो बहुत ऊंची ऊंची भरती है लेकिन चूंकि दुश्मन इस बार तगड़ा नहीं है तो मामला जम नहीं पाता। पिछले सीजन से इसकी तुलना करना वैसे भी बेमानी है क्योंकि तुलना दो बराबर की चीजों की होती है, वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स 1.5’ तो बस अपने पिछले सीजन का पसंघा है जिसकी कहानी अपने नाम की तरह ड्योढ़ी पर अटकी है। न अंदर आ पाती है। न बाहर जा पाती है।
वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स 1.5’ को देखकर एक बात तो समझ आती है और वह ये कि निर्देशक नीरज पांडे उस शख्स पर जरूरत से ज्यादा फिदा हैं जिस पर हिम्मत सिंह का ये किरदार आधारित है। भारतीय राजनीति, इसकी खुफिया एजेंसियों और उनके कार्यकलापों पर नजर रखने वाले इस पूरी सीरीज के कालखंड के हिसाब से उन घटनाओं का अनुमान आसानी से लगा सकते हैं जिन पर ये कहानी आगे बढ़ रही है। विपक्षी दल की महिला मुखिया। उसके बेटे की विदेश के समुद्रतटों पर महिला मित्रों के साथ मस्ती। तड़का अच्छा लगाया है वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स 1.5’ के लेखकों ने। लेकिन, इस कहानी में दुश्मन कोई बाहर का नहीं है। हिम्मत सिंह दरअसल अपना घर साफ करने के बाद हिम्मत सिंह बना। और, इस दौरान उसके साथ ‘सदैव’ हनुमान की तरह रहे दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर अब्बास शेख के हवाले से पूरी कहानी का बयान किया गया है।
वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स 1.5’ का टेकऑफ हिचकोले खाते हुए होता है। खाते-बही की पड़ताल अब भी चल रही है और दो लोग बैठकर हिम्मत सिंह का रिटायरमेंट प्लान बना रहे हैं। देश के किसी सरकार दफ्तर में इस तरह की प्लानिंग भी होती है, खोज का विषय है। ख़ैर, कहानी है तो कुछ भी हो सकता है। चड्डा और बनर्जी की उत्सुकता इस बार खर्चों की तफ्तीश में नहीं हिम्मत सिंह की हिम्मत में ज्यादा है। और, कहानी इस बार है सीआईए और रॉ से छिटके ऐसे लोगों की जिन्होंने खुफिया सूचनाओँ का कारोबार फैला रखा है। ये खुफिया सूचनाएं निकालने के लिए कुछ हसीनाएं काम कर रही हैं। ये उस कालखंड का किस्सा है जहां भारत, रूस, चीन सब एक जैसी कोशिशें एक जैसी सूचनाएं हासिल करने के लिए कर रहे हैं।
हिम्मत सिंह की पिछली कहानी शौर्य और बलिदान की कहानी थी, इस बार ये कहानी थोड़ी पर्सनल है। एक गर्लफ्रेंड भी है उसकी। एक दोस्त है जिसकी बीवी के बच्चा होने ही वाला है। और अब्बास शेख तो खैर है ही जिसे संसद धमाके की जांच में हिम्मत सिंह का साथ देने पर निलंबित कर दिया जाता है। हिम्मत सिंह के पास सबका काला चिट्ठा है। वह दिल्ली पुलिस के एक जेसीपी को उसका काला चिट्ठा पढ़कर सुनाता है। अब्बास फिर से ड्यूटी पर आता है। हिम्मत सिंह आखिर हिम्मत सिंह कैसे बना, रॉ के ऑडिटर्स को ये बताने। दसों दिशाओं में भागने की कोशिश करती कहानी अपने लक्ष्य से भटकी रहती है। घर में छुपे गद्दारों से लड़ता हिम्मत सिंह अपने मिशन में कामयाब भी होता है। लेकिन, कहीं कुछ वैसा फील इस बार नहीं आता जो वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ खत्म करने के बाद एक देसी वेबसीरीज की भव्यता देखकर होता है।
पूरी सीरीज में सबसे शानदार काम रहा है मुखम्मद फैजान का जिन्होंने बिना अपना चेहरा दिखाए सीरीज के तमाम सीन्स को अंजाम दिया है। मुखम्मद एक काबिल हमशक्ल हैं और अपना काम इस सीरीज में उन्होंने पूरी ईमानदारी से कर दिखाया है। के के मेनन का काम तो खैर हमेशा काबिले तारीफ होता ही है, सीरीज या फिल्म का हश्र जो भी होता रहा हो। वह अपने काम के प्रति सौ फीसदी समर्पित कलाकार है। वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स 1.5’ को देखने का मुख्य आकर्षण भी वही रहे। ये अलग बात है कि स्पेशल इफेक्ट्स से जवान बनाया गया उनका चेहरा और उनकी हेयर स्टाइल आंखों को लगातार खटकती है। इस सीजन में एक बार फिर विनय पाठक ने दिल जीतने वाला काम किया है। एक ईमानदार, सच्चाई के प्रति समर्पित और कूट भाषा में बात करने में माहिर पुलिसवाले का ऐसा किरदार हिंदी सिनेमा या वेब सीरीज में कम ही देखने को मिलता है।
वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स 1.5’ के दूसरे कलाकारों में आदिल खान (आरजे नसर) और ऐश्वर्या सुष्मिता दोनों को काम अच्छा मिला है। आदिल खान के साथ दिक्कत ये है कि उनकी कद काठी और उनका चेहरा उनको ऐसे किरदारों में ढलने में मदद नहीं करता। वहीं, ऐश्वर्या सुष्मिता को अभी अपने भाव प्रकटन पर और मेहनत करनी चाहिए। और वह ही नहीं, हनी ट्रैप वाले किस्सों में दिखीं तकरीबन सभी अभिनेत्रियां सपाट चेहरा ही बनाए रखती हैं। लड़कियों के सहारे काबिल लोगों को नीचा दिखाने के किस्से कहां से शुरू होते हैं, ये भी ये सीरीज अच्छे से दिखाती है। आफताब शिवदासानी एक रॉ एजेंट के तौर पर खूब जमे हैं। अच्छा अभिनय किया आफताब ने। गौतमी कपूर ने सरोज के किरदार में सहज दिखने की कोशिश की है। करीब तीन घंटे के चार एपीसोड एक साथ देखने के बाद कुछ खाली खाली सा लगता है तो इसलिए कि यहां फिर याद आने लगते हैं पिछले सीजन के करन टैकर, सना खान, मेहर विज, सैयामी खेर और सज्जाद डेलाफ्रूज जैसे कलाकार जिनकी अदाकारी ने बीते सीजन में चार चांद लगाए थे।