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गंगा एक्सप्रेस-वे: वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का संकल्प पथ
प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह
Published by: Rahul Kumar
Updated Tue, 28 Apr 2026 10:48 PM IST
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सार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे का हरदोई में उद्घाटन करेंगे। छह लेन का यह ग्रीनफील्ड कॉरिडोर, जिसे आठ लेन तक बढ़ाया जा सकता है, 36,230 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया है।
गंगा एक्सप्रेस वे
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत की सभ्यता का इतिहास गंगा के किनारे पुष्पित और पल्लवित हुआ है। जहां-जहां यह पवित्र नदी पहुंची वहां-वहां जीवन पल्लवित हुआ, संस्कृति फली-फूली और सत्ता और समृद्धि के केंद्र बने। सदियों बाद, उसी गंगा मां के समानांतर अब एक नई गाथा लिखी जा रही है, कंक्रीट और इस्पात की, विकास और संभावनाओं की। मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह 594 किलोमीटर लंबा राजमार्ग महज दूरियां कम नहीं करेगा, यह उन करोड़ों जिंदगियों के भाग्य को भी बदलेगा जो इसके दोनों किनारों पर बसी हुई हैं।
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इस एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे जुड़े हर जिले अपनी स्थानीय विशेषताओं को उद्योग और बाजार से जोड़ सकेंगे। यह हर जिले की अपनी पहचान को उसकी आर्थिक शक्ति में बदलने का एक सुविचारित और सुनियोजित खाका है। यही इस परियोजना की असली प्रतिभा है।
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मेरा मानना है कि इसकी विशिष्टता को आसानी से समझा जा सकता है। एक्सप्रेसवे का प्रारंभिक बिंदु मेरठ के बिजौली गांव से है, जो दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे से जुड़कर राष्ट्रीय राजधानी से सीमलेस कनेक्टिविटी प्रदान करता है। आगे हापुड़ में एक्सप्रेस-वे गढ़मुक्तेश्वर यानी ब्रजघाट को सीधे जोड़ता है, जहां गंगा स्नान की सदियों पुरानी महिमा है। यहां विशेष इंटरचेंज विकसित किए गए हैं ताकि श्रद्धालुओं की आवाजाही सहज हो। साथ ही, आलू और अन्य फसलों के लिए प्रसिद्ध इस जिले में कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित हो रही हैं। धार्मिक पर्यटन और एग्रो प्रोसेसिंग का यह संगम हापुड़ को एक नई आर्थिक पहचान देगा। बुलंदशहर की ताकत उसकी रणनीतिक लोकेशन है। जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की निकटता इसे एक प्रमुख सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स हब में बदल रही है, जहां डेयरी आधारित उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देंगे। अमरोहा की कहानी और भी प्रेरक है। यह जिला अपने पारंपरिक ढोलक और लकड़ी के हस्तशिल्प के लिए देशभर में जाना जाता है, लेकिन अब तक वैश्विक बाजार उसकी पहुंच से बाहर था। गंगा एक्सप्रेस-वे इस दूरी को पाट देगा।
संभल, जो सीमित कनेक्टिविटी के कारण विकास की दौड़ में पीछे रह गया था, अपने प्रसिद्ध 'हॉर्न और बोन' क्राफ्ट को अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों से जोड़ने की स्थिति में है। स्थानीय कारीगरों को बेहतर दाम, स्थायी रोजगार और वैश्विक पहचान मिलने का रास्ता खुल रहा है। परंपरा से प्रगति की यह यात्रा ही गंगा एक्सप्रेस-वे का असली चरित्र है। बदायूं में एक्सप्रेस-वे के किनारे विकसित हो रही विशाल इंडस्ट्रियल टाउनशिप न केवल उद्योगों को, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजी निवेश को आकर्षित करेगी। शाहजहांपुर में 3.5 किलोमीटर लंबी हवाई पट्टी, जहां आवश्यकता पड़ने पर फाइटर जेट्स उतर सकते हैं, यह बताती है कि यह एक्सप्रेस-वे केवल आर्थिक नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी सामरिक महत्व का है। हरदोई से गुजरता एक्सप्रेस-वे का सबसे लंबा हिस्सा इसे इस मेगा कॉरिडोर का केंद्रीय और रणनीतिक बिंदु बनाता है।
उन्नाव अब लखनऊ और कानपुर के साथ मिलकर एक ‘ट्राई-सिटी इकोनॉमिक मॉडल’ बन रहा है। कानपुर के विश्वप्रसिद्ध लेदर उद्योग के उत्पाद अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक तेजी से पहुंचेंगे, निर्यात बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। प्रतापगढ़ का प्रसिद्ध आंवला अब वैश्विक बाजार की दहलीज पर खड़ा है और अंत में प्रयागराज, जहां एक्सप्रेस-वे का जुदापुर डांडू गांव पर समापन होता है, आस्था, न्याय और वाणिज्य का वह त्रिवेणी संगम बनेगा जहां कुंभ और माघ मेले के करोड़ों श्रद्धालुओं के साथ-साथ हाई कोर्ट और विश्वविद्यालयों से जुड़े लोगों का पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आवागमन भी सहज और निर्बाध होगा।
नीति-विशेषज्ञ कहते हैं कि ‘बुनियादी ढांचे में किया गया एक रुपये का निवेश अर्थव्यवस्था में पांच रुपये का लाभ लेकर आता है।’ गंगा एक्सप्रेस-वे इस सिद्धांत का जीता जागता उदाहरण है। जब बाजार करीब आता है, किसान की उपज की कीमत बढ़ती है। जब लॉजिस्टिक्स सस्ता होता है, उद्योग लगते हैं। जब उद्योग लगते हैं, रोजगार आता है और जब रोजगार आता है, पलायन रुकता है।
लेकिन गंगा एक्सप्रेसवे का सबसे गहरा और भावनात्मक आयाम धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन के क्षेत्र में है। उत्तर प्रदेश भारत का वह प्रदेश है जहां आस्था की नदी सबसे गहरी बहती है। काशी, मथुरा-वृंदावन और प्रयागराज ये तीनों तीर्थ भारतीय आत्मा के सबसे पवित्र केंद्र हैं। गंगा एक्सप्रेसवे इन महातीर्थों को एक सहज और सुगम धुरी में पिरो देगा।
2025 के प्रयागराज महाकुम्भ ने सिद्ध कर दिया कि जब संसाधन और सुविधाएं हों तो श्रद्धालु दुनिया के कोने-कोने से आते हैं। मेरा मानना है कि गंगा एक्सप्रेस-वे इस गति को स्थायित्व देगा। नीति आयोग के अनुमान के अनुसार भारत में धार्मिक पर्यटन का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और उत्तर प्रदेश इसमें सबसे बड़ा हिस्सेदार बनने की स्थिति में है। गंगा एक्सप्रेस-वे इस संभावना को वास्तविकता में बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है।
(ये लेखक प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह के निजी विचार हैं। लेखक हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, गढ़वाल उत्तराखंड के कुलपति हैं)

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