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Chandigarh-Haryana News: 81 महीने काम कराकर नहीं दिया वेतन, कन्फेड पर 2 लाख जुर्माना
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चंडीगढ़। करीब 35 साल पुराने सेवा विवाद में 81 महीने तक कर्मचारी से काम लेकर वेतन न देने के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा स्टेट फेडरेशन ऑफ कंज्यूमर को-ऑपरेटिव होलसेल स्टोर्स लिमिटेड (कन्फेड) पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
अदालत ने इसे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि मानवीय गरिमा पर सीधा आघात बताया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि कर्मचारी दूनी चंद को अक्टूबर 1989 से जुलाई 1996 तक का पूरा बकाया वेतन, सभी सेवा लाभ और 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित तीन माह के भीतर भुगतान किया जाए।
दूनी चंद की नियुक्ति वर्ष 1979 में सेल्समैन के पद पर हुई थी। वर्ष 1983 में उन्हें मंडी डबवाली स्थित सेंट्रल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर स्टोर में तैनात किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, सितंबर 1989 से जुलाई 1996 तक उनसे लगातार काम लिया गया, लेकिन वेतन नहीं दिया गया और बाद में बिना वैध आदेश के सेवा से अलग कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान कन्फेड ने तर्क दिया कि दूनी चंद उसके कर्मचारी नहीं थे, बल्कि संबंधित स्टोर के कर्मचारी थे, इसलिए वेतन देने की जिम्मेदारी उसकी नहीं बनती।
अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि नियुक्ति कन्फेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा की गई थी और पूरी सेवा अवधि में उसके ही सेवा नियम लागू थे इसलिए वह जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
रिकॉर्ड के अनुसार, दूनी चंद वर्ष 1991 से न्याय के लिए अदालतों के चक्कर लगा रहे थे। अप्रैल 1991 में वेतन भुगतान के आदेश भी दिए गए थे लेकिन उनका पालन नहीं हुआ। वर्ष 1999 में अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी, जिसे 2000 में भुगतान के आश्वासन पर निपटाया गया, फिर भी राहत नहीं मिली और 2006 में दोबारा याचिकाकर्ता को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। ब्यूरो
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अदालत ने इसे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि मानवीय गरिमा पर सीधा आघात बताया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि कर्मचारी दूनी चंद को अक्टूबर 1989 से जुलाई 1996 तक का पूरा बकाया वेतन, सभी सेवा लाभ और 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित तीन माह के भीतर भुगतान किया जाए।
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दूनी चंद की नियुक्ति वर्ष 1979 में सेल्समैन के पद पर हुई थी। वर्ष 1983 में उन्हें मंडी डबवाली स्थित सेंट्रल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर स्टोर में तैनात किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, सितंबर 1989 से जुलाई 1996 तक उनसे लगातार काम लिया गया, लेकिन वेतन नहीं दिया गया और बाद में बिना वैध आदेश के सेवा से अलग कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान कन्फेड ने तर्क दिया कि दूनी चंद उसके कर्मचारी नहीं थे, बल्कि संबंधित स्टोर के कर्मचारी थे, इसलिए वेतन देने की जिम्मेदारी उसकी नहीं बनती।
अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि नियुक्ति कन्फेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा की गई थी और पूरी सेवा अवधि में उसके ही सेवा नियम लागू थे इसलिए वह जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
रिकॉर्ड के अनुसार, दूनी चंद वर्ष 1991 से न्याय के लिए अदालतों के चक्कर लगा रहे थे। अप्रैल 1991 में वेतन भुगतान के आदेश भी दिए गए थे लेकिन उनका पालन नहीं हुआ। वर्ष 1999 में अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी, जिसे 2000 में भुगतान के आश्वासन पर निपटाया गया, फिर भी राहत नहीं मिली और 2006 में दोबारा याचिकाकर्ता को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। ब्यूरो
