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Jhajjar-Bahadurgarh News: हमें नहीं पता क्या होता है मजदूर दिवस, हमें तो काम मिलना चाहिए
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-फोटो 81 : शहर में रेलवे रोड पर विश्वकर्मा चौक के नजदीक जमावड़ा लगाए खड़े श्रमिक। संवाद
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बहादुरगढ़। मैं बिहार का, मैं यूपी का, मैं मध्य प्रदेश का और मैं झारखंड का...। जी हां! हम बात कर रहे हैं बहादुरगढ़ के रेलवे रोड पर विश्वकर्मा चौक के नजदीक सुबह कई प्रदेशों से पहुंचे श्रमिकों की। शुक्रवार को मजदूर दिवस मनाया गया। मजदूरों ने कहा कि हमें नहीं पता क्या होता है मजदूर दिवस, हमें तो काम मिलना चाहिए।
इसको लेकर मजदूरों से मजदूर दिवस के बारे में जानना चाहा तो एक भी मजदूर ने इसकी जानकारी न होने की बात कही। वहीं शहर में अलग-अलग स्थानों पर दिन भर मजदूरी करके अपना व परिवार का पेट भरने वाले भी काफी मजदूर ऐसे मिले, जिन्हें मजदूर दिवस के बारे में पता ही नहीं था। उन्हें मतलब था तो केवल काम से।
रेलवे रोड पर प्रतिदिन सुबह 7 बजे श्रमिकों का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है। 11 बजे तक काफी संख्या में यहां श्रमिक खड़े रहते हैं। यह श्रमिक बहादुरगढ़ में अनेक स्थानों पर मेहनत-मजदूरी करते हैं। दरअसल बहादुरगढ़ में कई प्रदेशों के लोग निवास करते हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार शामिल हैं। अधिकतर मेहनत-मजदूरी तो काफी चिनाई (राज मिस्त्री) के अलावा अन्य कई तरह के काम करते हैं।
ये सभी श्रमिक सुबह 7 बजे रेलवे रोड पर स्थित अग्रसेन धर्मशाला के बाहर पहुंच जाते हैं और करीब 10-11 बजे तक यहीं पर काम के लिए डटे रहते हैं। यहां से इन श्रमिकों को कोई भी व्यक्ति अपने काम के लिए दिहाड़ी पर ले जाता है तो कुछ बिना काम के ही घर लौट जाते हैं। मजदूरों (राज मिस्त्री के साथ काम करने वाले) को दिन की दिहाड़ी 700 रुपये मिलती है तो वहीं राज मिस्त्री को 1000 रुपये। ऐसे में यह लोग पूरा दिन मजदूरी करके अपने बच्चों को पेट भरते हैं।
इंसेट
कभी मिलता है काम, कभी नहीं
बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले सीताराम ने बताया कि उन्हें मजदूर दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं है। उनके लिए तो हर दिन एक जैसा है। वहीं मौजूद उत्तर प्रदेश के एटा निवासी रामबाबू ने बताया कि वे प्रतिदिन यहां पर काम की तलाश में पहुंचते हैं लेकिन महीने में करीब 15-20 दिन ही काम मिल पाता है। ऐसे में 10 दिनों तक उन्हें खाली रहकर ही संतोष करना पड़ता है। इस तरह रामबाबू और सीताराम केवल अकेला ऐसे शख्स नहीं है जिन्हें महीने में 10 दिन काम नहीं मिलता। सुबह जैसे ही घड़ी की सूई 10 पर पहुंचती है तो रेलवे रोड से इन मजदूरों की संख्या कम हो जाती है। काफी ऐसे मजदूर बगैर काम मिले ही वापस अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो जाते हैं। वे फिर अपनी किस्मत को कोसते हैं।
इंसेट
गेहूं कटान और मंडियों में काम अंतिम चरण में
उत्तर प्रदेश के जालौन और कन्नौज के रहने वाले श्रमिक बाबूराम व राजू ने बताया कि पिछले कई दिनों से उन्हें खेतों और अनाज मंडी में काम मिल रहा था, लेकिन अब खेतों और मंडियों में काम कम हो गया है। ऐसे में उनके लिए समस्या पैदा हो गई है। यदि अगले दिनों में काम नहीं मिलता है तो रोटी के भी लाले पड़ जाएंगे। दिन प्रतिदिन महंगाई भी बढ़ती जा रही है।
इंसेट
सरकार नहीं देती ध्यान
अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और झारखंड के श्रमिकों संजय व सलीम ने कहा कि चाहे मजदूर दिवस हो, चाहे कोई और दिवस उन्हें रोजगार मिल जाता है तो ठीक, अन्यथा उन्हें दिन बिताना ही बड़ी मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार भी मजदूरों की ओर कोई ध्यान नहीं देती। यदि उन्हें प्रतिदिन रोजगार मिल जाए तो उनका गुजर-बसर ठीक ढंग से हो सकता है। बहादुरगढ़ में 70 हजार से अधिक श्रमिक अलग-अलग स्थानों पर काम करते हैं।
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इसको लेकर मजदूरों से मजदूर दिवस के बारे में जानना चाहा तो एक भी मजदूर ने इसकी जानकारी न होने की बात कही। वहीं शहर में अलग-अलग स्थानों पर दिन भर मजदूरी करके अपना व परिवार का पेट भरने वाले भी काफी मजदूर ऐसे मिले, जिन्हें मजदूर दिवस के बारे में पता ही नहीं था। उन्हें मतलब था तो केवल काम से।
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रेलवे रोड पर प्रतिदिन सुबह 7 बजे श्रमिकों का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है। 11 बजे तक काफी संख्या में यहां श्रमिक खड़े रहते हैं। यह श्रमिक बहादुरगढ़ में अनेक स्थानों पर मेहनत-मजदूरी करते हैं। दरअसल बहादुरगढ़ में कई प्रदेशों के लोग निवास करते हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार शामिल हैं। अधिकतर मेहनत-मजदूरी तो काफी चिनाई (राज मिस्त्री) के अलावा अन्य कई तरह के काम करते हैं।
ये सभी श्रमिक सुबह 7 बजे रेलवे रोड पर स्थित अग्रसेन धर्मशाला के बाहर पहुंच जाते हैं और करीब 10-11 बजे तक यहीं पर काम के लिए डटे रहते हैं। यहां से इन श्रमिकों को कोई भी व्यक्ति अपने काम के लिए दिहाड़ी पर ले जाता है तो कुछ बिना काम के ही घर लौट जाते हैं। मजदूरों (राज मिस्त्री के साथ काम करने वाले) को दिन की दिहाड़ी 700 रुपये मिलती है तो वहीं राज मिस्त्री को 1000 रुपये। ऐसे में यह लोग पूरा दिन मजदूरी करके अपने बच्चों को पेट भरते हैं।
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कभी मिलता है काम, कभी नहीं
बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले सीताराम ने बताया कि उन्हें मजदूर दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं है। उनके लिए तो हर दिन एक जैसा है। वहीं मौजूद उत्तर प्रदेश के एटा निवासी रामबाबू ने बताया कि वे प्रतिदिन यहां पर काम की तलाश में पहुंचते हैं लेकिन महीने में करीब 15-20 दिन ही काम मिल पाता है। ऐसे में 10 दिनों तक उन्हें खाली रहकर ही संतोष करना पड़ता है। इस तरह रामबाबू और सीताराम केवल अकेला ऐसे शख्स नहीं है जिन्हें महीने में 10 दिन काम नहीं मिलता। सुबह जैसे ही घड़ी की सूई 10 पर पहुंचती है तो रेलवे रोड से इन मजदूरों की संख्या कम हो जाती है। काफी ऐसे मजदूर बगैर काम मिले ही वापस अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो जाते हैं। वे फिर अपनी किस्मत को कोसते हैं।
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गेहूं कटान और मंडियों में काम अंतिम चरण में
उत्तर प्रदेश के जालौन और कन्नौज के रहने वाले श्रमिक बाबूराम व राजू ने बताया कि पिछले कई दिनों से उन्हें खेतों और अनाज मंडी में काम मिल रहा था, लेकिन अब खेतों और मंडियों में काम कम हो गया है। ऐसे में उनके लिए समस्या पैदा हो गई है। यदि अगले दिनों में काम नहीं मिलता है तो रोटी के भी लाले पड़ जाएंगे। दिन प्रतिदिन महंगाई भी बढ़ती जा रही है।
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सरकार नहीं देती ध्यान
अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और झारखंड के श्रमिकों संजय व सलीम ने कहा कि चाहे मजदूर दिवस हो, चाहे कोई और दिवस उन्हें रोजगार मिल जाता है तो ठीक, अन्यथा उन्हें दिन बिताना ही बड़ी मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार भी मजदूरों की ओर कोई ध्यान नहीं देती। यदि उन्हें प्रतिदिन रोजगार मिल जाए तो उनका गुजर-बसर ठीक ढंग से हो सकता है। बहादुरगढ़ में 70 हजार से अधिक श्रमिक अलग-अलग स्थानों पर काम करते हैं।
