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पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम विशेष: श्यामा प्रसाद मुखर्जी के घर में 74 साल बाद भगवा
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सार
इन चुनावों की शुरुआत से ही बंगाल का माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा। एक ओर ममता बनर्जी का ‘अजेय’ माना जाने वाला संगठनात्मक ढांचा था, तो दूसरी ओर भाजपा की आक्रामक चुनाव मशीनरी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी।
- फोटो : X/@BJPLive and https://www.bjp.org/hi/dr-syama-prasad-mookerjee
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विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जिसे भविष्य के इतिहासकार ‘महा-परिवर्तन’ की संज्ञा देंगे। 2026 के विधानसभा चुनावों के जो रुझान और नतीजे सामने आ रहे हैं, वे स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि बंगाल में ‘‘भगवा’’ का परचम लहराना अब लगभग तय है।
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सात दशकों के लंबे वैचारिक वनवास के बाद, भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि ने पहली बार उनके सपना को साकार करने जा रही है। लेकिन यह जीत जितनी भव्य दिख रही है, इसका विश्लेषण उतना ही गहरा और निष्पक्षता की मांग करता है।
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ताजे चुनाव: ध्रुवीकरण, हिंसा और आयोग की भूमिका
इन चुनावों की शुरुआत से ही बंगाल का माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा। एक ओर ममता बनर्जी का ‘अजेय’ माना जाने वाला संगठनात्मक ढांचा था, तो दूसरी ओर भाजपा की आक्रामक चुनाव मशीनरी। हालांकि, चुनावी शुचिता पर इस बार भी गंभीर सवाल उठे। ठीक चुनाव से पूर्व 90 लाख से अधिक मतदाताओं को सूची से हटाना भी एक असाधारण घटना रही।
इसलिए विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की भूमिका पर उंगली उठाने में देर नहीं की। मतदान के विभिन्न चरणों में हुई छिटपुट हिंसा, केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद बूथों पर तनाव और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के आरोपों ने आयोग की निष्पक्षता को संदेह के घेरे में रखा।
आलोचकों का तर्क है कि आयोग ने कई संवेदनशील मोर्चों पर वैसी तत्परता नहीं दिखाई जैसी अपेक्षित थी। लेकिन इन सबके बीच, जनता का भारी संख्या में घर से निकलना इस बात का प्रमाण था कि बदलाव की छटपटाहट संस्थागत कमियों से कहीं अधिक बड़ी थी।
टीएमसी की कमजोरीः क्यों ढहा ममता का दुर्ग?
तृणमूल कांग्रेस की संभावित हार का विश्लेषण करते समय हमें सत्ता के अहंकार और जमीनी जुड़ाव के टूटने को समझना होगा। 15 साल के शासन के बाद ‘एंटी-इंकंबेंसी’ या सत्ता विरोधी लहर का होना स्वाभाविक है, लेकिन टीएमसी के मामले में यह लहर ‘सिंडिकेट राज’ और भ्रष्टाचार के गहरे आरोपों से निर्मित हुई थी।
शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन वितरण में अनियमितताएं और संदेशखाली जैसी घटनाओं ने ममता बनर्जी की ‘मां-माटी-मानुष’ की छवि को गहरा आघात पहुँचाया।
टीएमसी की सबसे बड़ी कमजोरी उसका ‘‘कैटल-क्लास’’ संगठन बना, जहाँ स्थानीय नेताओं पर वसूली और हिंसा के आरोप लगे। जिस महिला वोट बैंक के भरोसे ममता बनर्जी राजनीति करती रही थीं, उस वर्ग में असुरक्षा की भावना ने सेंध लगा दी।
इसके अतिरिक्त, मुस्लिम मतों के प्रति कथित ‘‘तुष्टिकरण’’ की नीति ने बहुसंख्यक आबादी के एक बड़े वर्ग को भाजपा की ओर धकेल दिया, जिससे वोटों का ध्रुवीकरण टीएमसी के नियंत्रण से बाहर चला गया।
मुखर्जी के बंगाल ने जनसंघ से परहेज क्यों किया?
एक बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि जिस प्रदेश ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसा महान नेतृत्व देश को दिया, उसने उनकी विचारधारा से इतने वर्षों तक दूरी क्यों बनाए रखी? इसके पीछे बंगाल का विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक ताना-बना है। आजादी के बाद, बंगाल विभाजन की त्रासदी से गुजर रहा था।
उस समय शरणार्थी समस्या और आर्थिक बदहाली ने बंगाल के मानस को ‘‘पहचान की राजनीति’’ के बजाय ‘‘वर्ग संघर्ष’’ की ओर मोड़ दिया। वामपंथ ने यहाँ बड़ी चतुराई से धर्म और राष्ट्रवाद के ऊपर ‘‘वर्गीय चेतना’’ को स्थापित कर दिया।
डॉ. मुखर्जी की विचारधारा को ‘‘कुलीन’’ या ‘‘सांप्रदायिक’’ कहकर प्रचारित किया गया, जबकि बंगाल का बुद्धिजीवी वर्ग मार्क्सवाद के प्रभाव में था।दूसरा कारण यह रहा कि डॉ. मुखर्जी के असामयिक निधन के बाद बंगाल में दक्षिणपंथी विचारधारा के पास वैसा कोई कद्दावर स्थानीय चेहरा नहीं रहा जो बंगाली अस्मिता और राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ सके।
बंगाल ने हमेशा ‘‘बंगाली गौरव’’ को प्राथमिकता दी, और भाजपा को लंबे समय तक एक ‘‘बाहरी’’ या ‘‘हिंदी पट्टी’’ की पार्टी माना जाता रहा। यही कारण था कि जनसंघ और बाद में भाजपा यहां दशकों तक हाशिए पर रही।
स्वाधीनता आन्दोलन में बंगाल अग्रणी रहा और आन्दोलन में मुख्य रूप से कांग्रेस और वामपंथी विचार धारा क्रांतिकारी के लोग अग्रणी रहे जबकि जनसंघ के लोग अंग्रेजों के करीब माने जाते रहे, इसलिये भी बंगाल ने पहले जनसंघ और फिर भाजपा से दूरी बनाये रखी।
श्यामा प्रसाद का सपना और ‘भगवा’ का उदय
आज जब बंगाल में भगवा फहरा रहा है, तो इसे डॉ. मुखर्जी के उस सपने की पुनर्स्थापना माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने एक ऐसे बंगाल की कल्पना की थी जो भारतीय संस्कृति का रक्षक हो।
उन्होंने 1947 में जिस बंगाल को पाकिस्तान में जाने से बचाया था, वहां जनसांख्यिकीय असंतुलन और घुसपैठ को भाजपा ने अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। ‘‘सीएए’’ जैसे मुद्दों ने उन मतुआ और शरणार्थी समुदायों को भाजपा से जोड़ दिया, जो दशकों से अपनी पहचान के लिए तरस रहे थे।
डॉ. मुखर्जी का सपना केवल सत्ता पाना नहीं था, बल्कि बंगाल की खोई हुई बौद्धिक और सांस्कृतिक गरिमा को बहाल करना था। भाजपा की संभावित जीत यह दर्शाती है कि बंगाल का मतदाता अब ‘वर्ग संघर्ष की थ्योरी से ऊब चुका है।
राष्ट्रीय राजनीति में ममता कहां?
देखा जाय तो बंगाल का यह चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाला है। यदि भाजपा यहाँ सरकार बनाती है, तो उसे यह याद रखना होगा कि बंगाल की जनता जितनी जल्दी सिर पर बिठाती है, उतनी ही तेजी से उतार भी देती है।
ममता की हार उनके अपने ही गढ़ में उनकी नीतियों की विफलता है, तो भाजपा की जीत डॉ. मुखर्जी की वैचारिक विरासत की ‘घर वापसी’ है। हालांकि, नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बंगाल की राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को समाप्त करना और उस लोकतांत्रिक गरिमा को बहाल करना होगा, जिस पर इस चुनाव के दौरान बार-बार उंगलियां उठीं।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना तभी साकार होगा जब बंगाल केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी भारत का सिरमौर बनेगा। इस चुनाव के बाद राष्ट्रीय राजनीति में और खास कर विपक्ष की राजनीति में ममता बनर्जी का प्रभाव घटना स्वाभाविक ही है जो कि कांग्रेस के लिये शुभ संकेत है।
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