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जीवन धारा: प्रेम में खुलापन और समर्पण चाहिए, आलोचना और असफलता के डर से पाएं मुक्ति
ओशो
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 04 May 2026 07:52 AM IST
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जीवन धारा
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विस्तार
जहां डर समाप्त होता है, वहीं जीवन का वास्तविक आरंभ होता है। यह मनुष्य की चेतना के गहरे सत्य की ओर संकेत है। डर मनुष्य के अस्तित्व पर छाई धुंध के समान है, जो उसे उसकी वास्तविक संभावनाओं से दूर रखता है। जब तक यह धुंध बनी रहती है, तब तक व्यक्ति जीवन को पूरी तरह नहीं जी पाता, वह केवल जीने का नाटक करता रहता है। मनुष्य जन्म से निर्भय होता है।एक छोटा बच्चा जब दुनिया में आता है, तो उसमें कोई डर नहीं होता। वह खुल कर हंसता है, रोता है, जिज्ञासा से हर चीज को छूता है, हर चीज को उत्सुकता के साथ देखता है, गिरता है और फिर उठ जाता है। लेकिन धीरे-धीरे समाज, परिवार और संस्कार उसके भीतर डर भरने लगते हैं। असफलता का डर, अस्वीकृति का डर, मृत्यु का डर। ये सारे डर उसके स्वाभाविक जीवन को सीमित करने लगते हैं। जब व्यक्ति अपने भीतर की चेतना को पहचानना शुरू कर देता है, तब यह डर अपने आप समाप्त होता चला जाता है। इस अनुभव के बाद जीवन में एक अद्भुत स्वतंत्रता-सी आ जाती है। डर हमें वर्तमान क्षण से दूर ले जाता है। डर के साये में हम या तो अतीत की गलतियों से डरते रहते हैं या भविष्य की अनिश्चितताओं को लेकर चिंतित रहते हैं। इस कारण हम 'अभी' यानी वर्तमान क्षण को खो देते हैं, जबकि जीवन केवल मौजूदा क्षण में ही है। इसलिए जो व्यक्ति वर्तमान में जीना सीख लेता है, वह अपने आप ही निर्भय हो जाता है, उसके भीतर से डर का भाव खत्म हो जाता है, क्योंकि वर्तमान में कोई डर नहीं होता, डर तो हमेशा कल्पना में होता है। जब डर खत्म होता है, तब व्यक्ति जोखिम लेने के लिए तैयार हो जाता है। वह अपनी सच्ची इच्छाओं का अनुसरण करने लगता है, न कि समाज की थोपी गई अपेक्षाओं का। यही वास्तविक जीवन है, जहां व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप पूरी जागरूकता के साथ जीवन जीता है। जो व्यक्ति डरता है, वह पूरी तरह प्रेम नहीं कर सकता, क्योंकि प्रेम में खुलापन और समर्पण चाहिए। इसी तरह सृजनात्मकता भी तभी संभव है जब डर न हो। एक कलाकार, एक लेखक, एक संगीतकार तभी कुछ नया और मौलिक रच सकता है, जब वह आलोचना और असफलता के डर से मुक्त हो। जब आप अपने डर को पूरी जागरूकता के साथ देखते हैं, तो पाते हैं कि वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। जीवन कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि एक आंतरिक अनुभव है। यह तब प्रकट होता है, जब हम अपनी सीमाओं, अपने भय और अपनी झूठी पहचानों से मुक्त हो जाते हैं। तब जीवन एक उत्सव बन जाता है, एक ऐसा उत्सव जिसमें हर क्षण नया है, ताजा है और संभावनाओं से भरा हुआ है। इस अवस्था में व्यक्ति न तो भविष्य की चिंता करता है, न अतीत का बोझ ढोता है। वह बस जीता है, पूरी तरह, गहराई से और आनंद के साथ। सच्चा जीवन वही है, जो डर की जंजीरों से मुक्त होकर अपनी संपूर्णता में खिलता है।
