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विश्व साहित्य का आकाश: द प्रिंस-सत्ता की पोल पट्टी खोलता लेखन
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सार
‘द प्रिंस’ में लिखित बातें सत्ता के लिए खतरा उत्पन्न करती हैं। ऐसा नहीं है कि शासक इन बातों को नहीं जानते हैं। सारे संसार के सारे शक्तिशाली लोग इसी तरीके से अपना सारा काम करते हैं।
साहित्य की दुनिया
- फोटो : Freepik.com
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विस्तार
गुंटर ग्रास अपने नोबेल भाषण में कहते हैं, वे किताब जलाने वालों के देश से आते है। मगर किताब जलाना केवल जर्मन लोगों की बपौती नहीं है। किताब जलाने में दूसरे देश भी जर्मनी से बिल्कुल पीछे नहीं हैं। किताब जलाना मतलब उसकी सामग्री का विरोध करना।
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आखिर ऐसा क्या हो सकता है, किताब में कि जला कर उसका विरोध किया जाए? अक्सर जो लोग किताब जलाते हैं उन्होंने उस किताब को पढ़ा नहीं होता है। वैसे कुछ लोग किताब पढ़कर सोच-समझ कर यह पुनीत कार्य करते हैं।
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सत्ता-सरकारें क्यों पीछे रहें, उनके पास लोगों से अधिक ताकत होती है, वे किताबों को प्रतिबंधित कर देती हैं। ताकि विचार लोगों तक न पहुंचें। साहित्य संवाद का एक बहुत सशक्त माध्यम है, इसके द्वारा अपने विचार दूर-दूर तक संप्रेषित किए जा सकते हैं। इसी संप्रेषण क्षमता का फल है, किताब सत्ताधारियों, कट्टरपंथियों की नजरों में प्रारंभ से चुभती रही है।
शक्ति-सत्ता सम्पन्न लोग जब किसी किताब से अपने लिए खतरा देखते हैं, अपनी ताकत का प्रयोग कर उसे प्रतिबंधित कर देने का भरपूर प्रयास करते हैं। कुछ समय केलिए इसमें वे सफल हो जाते हैं।
आज एक ऐसी किताब की बात करती हूं, जो सत्ता की आंख में खटकी और जिसे काफी समय के लिए प्रतिबंधित किया गया। मगर क्या हुआ? क्या धार्मिक, राजनैतिक सत्ता इनमें व्यक्त विचारों को नष्ट कर सकी? नहीं, विचार मरते नहीं हैं।
इस किताब का विचार आज भी जीवित है, कई संस्थानों में पढ़ने-पढ़ाने के लिए प्रयोग होता है। जबकि इस किताब में संस्थानों की कार्य प्रणाली की वास्तविक पोल-पट्टी खोलने वाले विचार समाहित हैं।
निकोल मैकियावेली की किताब ‘द प्रिंस’
1559 में कैथोलिक चर्च ने सामान्य लोगों के लिए खतरनाक किताबों की एक लिस्ट बनाई। इस सूची में शीर्ष पर जो किताबें थीं, उनमें से एक थी निकोल मैकियावेली की किताब ‘द प्रिंस’। हालांकि इसे 1513 में ही लिखा जा चुका था, लेकिन उसके मरने के पांच वर्ष बाद 1532 में प्रकाशित, यह पतली-सी किताब दशकों से यूरोप के पाठकों के बीच घूम रही थी। चर्च ने इसे 200 वर्षों तक प्रतिबंधित किताबों में रखा।
3 मई 1469 को जन्मे निकोल मैकियावेली ने इस राजनैतिक किताब में वह खोल कर लिख दिया था जिसे जानते सब थे, मगर कहने से डरते थे। मैकियावेली के पहले के लेखकों ने सत्ता की इन्हीं बातों को दैविक भाषा, ईश्वरीय नियम, पवित्र प्रश्नातीत कह कर सच्चाई को छिपाया था।
सत्ताधारी वास्तव में कैसे व्यवहार करते हैं, इस पूरी वास्तविकता को मैकियावेली ने ‘द प्रिंस’ में उघाड़ कर दिखा दिया। जब जरूरत और अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है, नेता सफेद झूठ बोलते हैं। वे अपने विरोधियों को केवल घायल करके नहीं छोड़ देते हैं, उसे समूल नष्ट कर डालते हैं।
ये जनता को नियंत्रित करने केलिए नैतिकता तथा सद्गुणों का दिखावा करते हैं। इनका नैतिकता से कुछ लेना-देना नहीं होता है। सत्ता पाने और उसे अपनाए रखने के लिए ये धूर्त लोग शेर की तरह बलवान एवं लोमड़ी की तरह कुटिलता का उपयोग करते हैं। डर एवं भय से शासन करते हैं।
मैकियावेली का परिवार काफी सम्पन्न हुआ करता था, लेकिन उसके जन्म के समय तक उसके पिता, ‘डॉक्टर ऑफ लॉ’, काफी गरीब हो चुके थे। मैकियावेले ने राजनैतिक लेखन किया, साथ ही उपन्यास एवं कविताएं भी लिखीं।
‘द प्रिंस’ के अलावा उनकी कुछ अन्य प्रसिद्ध किताबों के नाम ‘डिस्कोर्सेस ऑन लिवी’, ‘आर्ट ऑफ वार’, ए डिस्कोर्स अबाउट द प्रोविसज ऑफ मनी’ ‘पोर्ट्रेट ऑफ दि अफेयर्स ऑफ जर्मनी’, ‘पोर्ट्रेट ऑफ दि अफेयर्स ऑफ फ्रांस’ आदि हैं। जब वे ‘द प्रिंस’ लिख रहे थे, उसी समय एक बिल्कुल अलग ढंग की एक और किताब भी तैयार हो रही थी।
इस समय वे ‘डिस्कोर्सेस ऑन लिवी’ भी लिख रहे थे। परंतु दोनों किताबों का प्रकाशन उनकी मृत्यु के बाद हुआ। ‘डिस्कोर्सेस ऑन लिवी’ का 1531 में एवं ‘द प्रिंस’ का 1532 में। दोनों किताबों के समर्पण में उन्होंने लिखा, इसमें वह सब है, जो उन्होंने जाना है। दोनों किताबों की सामग्री और शैली बहुत भिन्न है।
जाहिर-सी बात है, ‘द प्रिंस’ में लिखित बातें सत्ता के लिए खतरा उत्पन्न करती हैं। ऐसा नहीं है कि शासक इन बातों को नहीं जानते हैं। सारे संसार के सारे शक्तिशाली लोग इसी तरीके से अपना सारा काम करते हैं। लेकिन मैकियावेली ने इसे इतने सरल एवं प्रत्यक्ष ढंग से लिखा था कि सामान्य पाठक भी सत्ताधातियों की शातिर चाल समझ सकता है।
न केवल पाठक वरन प्रत्येक संस्थान को उसने आंख में अंगुली डाल कर दिखा दिया था कि शासन कैसे काम करता है। उन दिनों यूरोप में चर्च की सत्ता थी।
सत्ताधारी इसे देख-पढ़ कर तिलमिला उठे। चर्च नहीं चाहता था कोई इसे पढ़े। वे नहीं चाहते थे कि जनता इसे पढ़े और जाने-समझे सत्ताधारी कैसे काम करते हैं, किस कुटिलता से शासन करते हैं। इसे प्रतिबंधित करने वाले लोग कब के मर-खप गए, मगर फ्लोरेंटेन के राजनयिक, फिलॉसफर, इतिहासकार, लेखक मैकियावेली की रचना ‘द प्रिंस’ क्लासिकल का दर्जा प्राप्त किताब आज भी जीवित है।
लैटिन-ग्रीक भाषा के जानकार, इटली के पुनर्जागरण काल के एक प्रमुख व्यक्ति तथा फ्लोरेंटीन रेपब्लिक के सचिव, फ्लोरेंस में जन्मे नोकिल डि बर्नार्डो डेइ मैकियावेली की फ्लोरेंस में ही 21 जून 1527 को मृत्यु हुई। ‘द प्रिंस’ ने दुनिया को एक नया शब्द दिया, ‘मेकियावेलियन’।
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