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जीवन में हमेशा रखें सकारात्मक दृष्टिकोण : अशोक पुजारी
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जींद। महाराजा अग्रसेन पुजारी अशोक शर्मा ने कहा कि आपका चिंतन ही आपको सुखी बनाता है और आपका चिंतन ही आपके जीवन में दुख का कारण भी बनता है। इस दुनिया में लोग इसलिए दुखी नहीं कि उन्हें किसी बात की कमी है। इसलिए दुखी हैं कि उनके सोचने का ढंग नकारात्मक है।
सकारात्मक सोचो और सकारात्मक देखो, इससे आपको जीने का आनंद प्राप्त होगा। दुख में सुख खोज लेना, हानि में लाभ खोज लेना, प्रतिकूलताओं में भी अवसर खोज लेना इसको ही सकारात्मक दृष्टिकोण कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि जीवन का ऐसा कोई बड़े से बड़ा दुख नहीं जिससे सुख की परछाइयों को न देखा जा सके। जिंदगी की ऐसी कोई बाधा नहीं जिससे कुछ प्रेरणा न ली जा सके। रास्ते में पड़े हुए पत्थर को आप मार्ग की बाधा भी मान सकते हैं और चाहें तो उस पत्थर को सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ने का साधन भी बना सकते हैं। जीवन का आनंद तो वही लोग उठा पाते हैं, जिनका सोचने का ढंग सकारात्मक होता है। नकारात्मकता त्यागें, सकारात्मक सोचें और जीवन को आनंद से जीएं।
पुजारी ने कहा कि यदि आज कुसंग रूपी विष का सेवन करते रहे एवं समय रहते इससे बचने का प्रयास न किया गया तो यह धीरे-धीरे हमारे जीवन को नष्ट करने वाला ही है। कुसंग के प्रभाव से हमारा भजन उसी तरह नष्ट हो जाता है, जिस तरह पाले के प्रभाव से हरी-भरी बेल सूखकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है। हम कितना भी भजन कर लें, सत्संग कर लें लेकिन निरंतर कुसंग का सेवन करते रहें तो सुना हुआ, पढ़ा हुआ, और जाना हुआ कोई भी सुविचार आचरण में नहीं उतर पाएगा।
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सकारात्मक सोचो और सकारात्मक देखो, इससे आपको जीने का आनंद प्राप्त होगा। दुख में सुख खोज लेना, हानि में लाभ खोज लेना, प्रतिकूलताओं में भी अवसर खोज लेना इसको ही सकारात्मक दृष्टिकोण कहा जाता है।
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उन्होंने कहा कि जीवन का ऐसा कोई बड़े से बड़ा दुख नहीं जिससे सुख की परछाइयों को न देखा जा सके। जिंदगी की ऐसी कोई बाधा नहीं जिससे कुछ प्रेरणा न ली जा सके। रास्ते में पड़े हुए पत्थर को आप मार्ग की बाधा भी मान सकते हैं और चाहें तो उस पत्थर को सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ने का साधन भी बना सकते हैं। जीवन का आनंद तो वही लोग उठा पाते हैं, जिनका सोचने का ढंग सकारात्मक होता है। नकारात्मकता त्यागें, सकारात्मक सोचें और जीवन को आनंद से जीएं।
पुजारी ने कहा कि यदि आज कुसंग रूपी विष का सेवन करते रहे एवं समय रहते इससे बचने का प्रयास न किया गया तो यह धीरे-धीरे हमारे जीवन को नष्ट करने वाला ही है। कुसंग के प्रभाव से हमारा भजन उसी तरह नष्ट हो जाता है, जिस तरह पाले के प्रभाव से हरी-भरी बेल सूखकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है। हम कितना भी भजन कर लें, सत्संग कर लें लेकिन निरंतर कुसंग का सेवन करते रहें तो सुना हुआ, पढ़ा हुआ, और जाना हुआ कोई भी सुविचार आचरण में नहीं उतर पाएगा।

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