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Jind News: विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस आज...आज भी चमनलाल की आंखों में जिंदा है बंटवारे का दर्द
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सुशील टुर्ण
जींद। भारत-पाकिस्तान विभाजन को भले ही 79 साल होने जा रहे हों लेकिन 98 वर्षीय चमनलाल ग्रोवर के जेहन में 1947 के वे भयावह दिन आज भी ताजा हैं। महज 12 साल की उम्र में मुलतान जिले की बीरवाला तहसील के गांव बारहचिटा से उजड़ने का दर्द उन्होंने अपनी आंखों से देखा था।
चमनलाल बताते हैं कि दंगों की आहट के बीच भी उस समय उनके गांव में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा इतना मजबूत था कि दोनों समुदाय एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए साथ खड़े रहे। गांव में करीब 300 मकान थे जिनमें लगभग 200 मकान मुस्लिम समुदाय के थे। चमनलाल अब गांधी नगर में रहते हैं।
उस समय गांव में अखबार नहीं आते थे। आसपास के गांवों से दंगों की खबरें मिलने लगीं तो ग्रामीणों ने मिलकर सुरक्षा की रणनीति बनाई। आठकस्सी गांव में डेरा डालकर तय किया गया कि बाहरी हमलावरों का मुकाबला सभी मिलकर करेंगे। घरों की छतों पर गर्म तेल रखा गया और रातभर ग्रामीण पहरा देते रहे। कुछ लोग गांव में दंगा करने पहुंचे लेकिन ग्रामीणों की एकजुटता देखकर लौट गए। बाद में गोरखा पुलिस ने मोर्चा संभाला।
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सितंबर 1947 में चमनलाल परिवार के साथ पुलिस सुरक्षा में खानेवाल से ट्रेन के जरिये कैथल पहुंचे। कैथल में उन्हें तीन दिन रखा गया। उनसे पहले कैथल पहुंची एक ट्रेन में दंगों के घायल लोग भरे हुए थे। उनके कटे हाथ-पैर और जख्मी यात्रियों का दृश्य आज भी स्मृतियों में कोंध उठता है।
तीन महीने कुरुक्षेत्र, फिर हिसार में मिली नई जिंदगी
कैथल में तीन दिन रुकने के बाद परिवार करीब तीन महीने कुरुक्षेत्र में रहा और फिर हिसार पहुंचा। वहां रहने के लिए महज दस फीट का कमरा मिला। चमनलाल बताते हैं कि परिवार पाकिस्तान से सिर्फ तन पर पहने कपड़ों के साथ निकला था। घर के गहने-जेवर मिट्टी में दबाकर छोड़ने पड़े। पुश्तैनी घर, सामान और जमीन पीछे छूट गए। सरकार की ओर से उन्हें कभी कोई विशेष सहायता नहीं मिली।
परिवार ने शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में हासिल किया मुकाम
हिसार में उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और दसवीं तक शिक्षा हासिल की। वर्ष 1955 में शिक्षक बने और 1965 में रेलवे में स्टेशन मास्टर की नौकरी मिली। इसके साथ हैचरी का व्यवसाय भी शुरू किया। परिवार ने शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में भी मुकाम हासिल किया। उनकी तीन बेटियां डॉक्टर हैं। उनके दो बेटों में से एक व्यवसायी है जबकि दूसरा बेटा डॉक्टर है। उनकी एक पुत्रवधू भी चिकित्सक हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी चमनलाल के जेहन में विभाजन के वे दिन और अपने पुश्तैनी घर को छोड़ने की पीड़ा आज भी साफ दिखाई देती है।
जींद। भारत-पाकिस्तान विभाजन को भले ही 79 साल होने जा रहे हों लेकिन 98 वर्षीय चमनलाल ग्रोवर के जेहन में 1947 के वे भयावह दिन आज भी ताजा हैं। महज 12 साल की उम्र में मुलतान जिले की बीरवाला तहसील के गांव बारहचिटा से उजड़ने का दर्द उन्होंने अपनी आंखों से देखा था।
चमनलाल बताते हैं कि दंगों की आहट के बीच भी उस समय उनके गांव में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा इतना मजबूत था कि दोनों समुदाय एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए साथ खड़े रहे। गांव में करीब 300 मकान थे जिनमें लगभग 200 मकान मुस्लिम समुदाय के थे। चमनलाल अब गांधी नगर में रहते हैं।
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उस समय गांव में अखबार नहीं आते थे। आसपास के गांवों से दंगों की खबरें मिलने लगीं तो ग्रामीणों ने मिलकर सुरक्षा की रणनीति बनाई। आठकस्सी गांव में डेरा डालकर तय किया गया कि बाहरी हमलावरों का मुकाबला सभी मिलकर करेंगे। घरों की छतों पर गर्म तेल रखा गया और रातभर ग्रामीण पहरा देते रहे। कुछ लोग गांव में दंगा करने पहुंचे लेकिन ग्रामीणों की एकजुटता देखकर लौट गए। बाद में गोरखा पुलिस ने मोर्चा संभाला।
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सितंबर 1947 में चमनलाल परिवार के साथ पुलिस सुरक्षा में खानेवाल से ट्रेन के जरिये कैथल पहुंचे। कैथल में उन्हें तीन दिन रखा गया। उनसे पहले कैथल पहुंची एक ट्रेन में दंगों के घायल लोग भरे हुए थे। उनके कटे हाथ-पैर और जख्मी यात्रियों का दृश्य आज भी स्मृतियों में कोंध उठता है।
तीन महीने कुरुक्षेत्र, फिर हिसार में मिली नई जिंदगी
कैथल में तीन दिन रुकने के बाद परिवार करीब तीन महीने कुरुक्षेत्र में रहा और फिर हिसार पहुंचा। वहां रहने के लिए महज दस फीट का कमरा मिला। चमनलाल बताते हैं कि परिवार पाकिस्तान से सिर्फ तन पर पहने कपड़ों के साथ निकला था। घर के गहने-जेवर मिट्टी में दबाकर छोड़ने पड़े। पुश्तैनी घर, सामान और जमीन पीछे छूट गए। सरकार की ओर से उन्हें कभी कोई विशेष सहायता नहीं मिली।
परिवार ने शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में हासिल किया मुकाम
हिसार में उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और दसवीं तक शिक्षा हासिल की। वर्ष 1955 में शिक्षक बने और 1965 में रेलवे में स्टेशन मास्टर की नौकरी मिली। इसके साथ हैचरी का व्यवसाय भी शुरू किया। परिवार ने शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में भी मुकाम हासिल किया। उनकी तीन बेटियां डॉक्टर हैं। उनके दो बेटों में से एक व्यवसायी है जबकि दूसरा बेटा डॉक्टर है। उनकी एक पुत्रवधू भी चिकित्सक हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी चमनलाल के जेहन में विभाजन के वे दिन और अपने पुश्तैनी घर को छोड़ने की पीड़ा आज भी साफ दिखाई देती है।