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Mahendragarh-Narnaul News: टमाटर की डाली से धान की बाली तक पहुंचा जीनोम एडिटिंग का शोध

Sun, 18 Oct 2026 11:58 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 18 Oct 2026 11:58 PM IST
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Genome editing research has extended from tomato plants to rice stalks.
फोटो संख्या:54-- हकेंवि की लैब  में विद्या​र्थियों को प्र​शिक्षण देते  डॉ. रूपेश देखमुख--संवाद
महेंद्रगढ़। टमाटर से शुरू हुआ जीनोम एडिटिंग का शोध अब धान, सरसों, गेहूं और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों तक पहुंच गया है। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. रूपेश देशमुख ने टमाटर में कम देखभाल में अधिक पैदावार देने वाली किस्म विकसित करने की दिशा में काम किया है।
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उनके शोध कार्यों और उपलब्धियों के आधार पर वर्ष 2026 में एक बार फिर उनका नाम दुनिया के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में शामिल हुआ है। खास बात यह है कि वे वर्ष 2022 से लगातार पांच साल इस सूची में जगह बनाने में सफल रहे हैं।
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डॉ. देशमुख अब तक 200 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 19 अवॉर्ड भी मिल चुके हैं। जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके शोध का मुख्य उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिससे किसानों को कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन मिले और बदलती जलवायु के बीच खेती की लागत घट सके।
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टमाटर की नई किस्म, अब बड़ी फसलों पर नजर
डॉ. देशमुख के शोध का एक अहम हिस्सा जीनोम एडिटिंग है। इस तकनीक से फसलों के जीन में लक्षित बदलाव कर उनके उपयोगी गुणों को बेहतर बनाने पर काम किया जाता है। उन्होंने टमाटर में जीनोम एडिटिंग के जरिए ऐसी किस्म विकसित करने की दिशा में काम किया है, जो कम देखभाल में अधिक पैदावार दे सके। वर्ष 2022 से धान, सरसों, गेहूं और सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों पर भी शोध जारी है। उद्देश्य ऐसी किस्में तैयार करना है, जो प्रतिकूल मौसम में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। इससे भविष्य में किसानों को कम खाद, कम कीटनाशक और कम देखभाल में ज्यादा उपज मिलने में मदद मिल सकती है।
गर्मी में भी फसल को पोषण देने पर जोर
अधिक तापमान में जैविक उर्वरकों के लाभकारी बैक्टीरिया की सक्रियता प्रभावित होना किसानों के सामने एक बड़ी चुनौती है। इसे ध्यान में रखते हुए डॉ. देशमुख ने सिलिकॉन युक्त फर्टिलाइजर तैयार किया है। इस तकनीक का मकसद लाभकारी बैक्टीरिया को अधिक तापमान में भी जीवित रखना है, ताकि नमी मिलने पर वे सक्रिय होकर अपनी संख्या बढ़ा सकें और पौधों को पोषण देने में मदद करें। गर्म क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों के लिए यह उपयोगी साबित हो सकता है।

विदेश में काम के बाद भारत में शोध
मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले डॉ. रूपेश देशमुख वर्ष 2011 से 2018 तक कनाडा और अमेरिका के एक-एक विश्वविद्यालय में काम कर चुके हैं। वर्ष 2018 में भारत लौटने के बाद उन्होंने यहां शोध कार्य जारी रखा। नवंबर 2022 में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग में कार्यभार संभालने के बाद से वे लगातार कृषि से जुड़ी नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं।
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