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Mahendragarh-Narnaul News: नारनौल की बहू भाषा सुंबली ने धुरंधर द रिवेंज में किया अभिनय
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Mon, 23 Mar 2026 12:16 AM IST
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फोटो नंबर- 19पति अभिनेता सुनील सोनी के साथ अभिनेत्री भाषा सुंबली।
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नारनौल। नारनौल की बहू और कश्मीरी मूल की अभिनेत्री भाषा सुंबली ने धुरंधर द रिवेंज में वकील की भूमिका निभाई, जिसे दर्शकों से खूब सराहना मिल रही है। सिनेमाघरों से बाहर निकलते दर्शक उनके अभिनय की प्रशंसा कर रहे हैं।
मूल रूप से जम्मू-कश्मीर की रहने वाली भाषा की शादी करीब छह साल पहले नारनौल के पुरानी सराय निवासी सुनील सोनी के साथ हुई थी। दोनों ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में साथ पढ़ाई की, जहां से उनकी दोस्ती शुरू होकर विवाह तक पहुंची। इस समय सुनील सोनी परिवार के साथ मुंबई में रह रहा है।
इस फिल्म से पहले भाषा सुंबली को पहचान द कश्मीर फाइल्स में ‘शारदा पंडित’ के किरदार से मिली। इसके अलावा छपाक और बारामूला में भी उन्होंने प्रभावशाली अभिनय किया था।
कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मी भाषा ने संघर्षों के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाई है। आज वह बॉलीवुड में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं और हरियाणा का नाम रोशन कर रही हैं।
भाषा सुंबली के पिता अग्निशेखर हिंदी के प्रसिद्ध कवि और लेखक हैं, जबकि उनकी माता क्षमा कौल भी जानी-मानी उपन्यासकार और कवयित्री हैं। हालांकि 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं के निर्वासन के दौरान उन्हें कश्मीर छोड़कर दिल्ली में बसना पड़ा था।
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मूल रूप से जम्मू-कश्मीर की रहने वाली भाषा की शादी करीब छह साल पहले नारनौल के पुरानी सराय निवासी सुनील सोनी के साथ हुई थी। दोनों ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में साथ पढ़ाई की, जहां से उनकी दोस्ती शुरू होकर विवाह तक पहुंची। इस समय सुनील सोनी परिवार के साथ मुंबई में रह रहा है।
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इस फिल्म से पहले भाषा सुंबली को पहचान द कश्मीर फाइल्स में ‘शारदा पंडित’ के किरदार से मिली। इसके अलावा छपाक और बारामूला में भी उन्होंने प्रभावशाली अभिनय किया था।
कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मी भाषा ने संघर्षों के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाई है। आज वह बॉलीवुड में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं और हरियाणा का नाम रोशन कर रही हैं।
भाषा सुंबली के पिता अग्निशेखर हिंदी के प्रसिद्ध कवि और लेखक हैं, जबकि उनकी माता क्षमा कौल भी जानी-मानी उपन्यासकार और कवयित्री हैं। हालांकि 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं के निर्वासन के दौरान उन्हें कश्मीर छोड़कर दिल्ली में बसना पड़ा था।