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IDFC Bank Scam: घोटाले के रुपये से खरीदा गया 200 करोड़ का सोना, शेल कंपनियों के जरिए ठिकाने लगाई गई रकम
दीपक शाही, अमर उजाला, पंचकूला
Published by: Nivedita
Updated Sat, 25 Apr 2026 11:04 AM IST
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सार
आरोपियों ने एक सोची-समझी साजिश के तहत सरकारी फंड को पहले उन शेल कंपनियों के खातों में भेजा जिनका जमीनी स्तर पर कोई अस्तित्व नहीं था। इन कंपनियों का सोने-चांदी के कारोबार से कोई लेना-देना नहीं था फिर भी इनके नाम पर करोड़ों का सोना खरीदा गया।
आईडीएफसी बैंक
- फोटो : फाइल
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विस्तार
हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों के फंड में हुई करीब 590 करोड़ रुपये की हेराफेरी के मामले में सीबीआई ने बड़ा खुलासा किया है।
जांच एजेंसी को पुख्ता सबूत मिले हैं कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में हुए सरकारी खजाने के 590 करोड़ के घोटाले में करीब 200 करोड़ रुपये से सोना खरीदा गया।
इस घोटाले में बैंक अधिकारियों और सरकारी बाबुओं की गहरी मिलीभगत सामने आई है जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर सरकारी धन को फर्जी कंपनियों (शेल कंपनियों) में डायवर्ट किया।
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जांच एजेंसी को पुख्ता सबूत मिले हैं कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में हुए सरकारी खजाने के 590 करोड़ के घोटाले में करीब 200 करोड़ रुपये से सोना खरीदा गया।
इस घोटाले में बैंक अधिकारियों और सरकारी बाबुओं की गहरी मिलीभगत सामने आई है जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर सरकारी धन को फर्जी कंपनियों (शेल कंपनियों) में डायवर्ट किया।
शेल कंपनियों के जरिये सोना खरीदा
सीबीआई की जांच के अनुसार, आरोपियों ने एक सोची-समझी साजिश के तहत सरकारी फंड को पहले उन शेल कंपनियों के खातों में भेजा जिनका जमीनी स्तर पर कोई अस्तित्व नहीं था। इन कंपनियों का सोने-चांदी के कारोबार से कोई लेना-देना नहीं था फिर भी इनके नाम पर करोड़ों का सोना खरीदा गया। जांच में सामने आया कि यह सोना बाद में मुख्य आरोपी रिभव ऋषि से जुड़े लोगों को बिना किसी रसीद या रिकॉर्ड के सौंप दिया गया।बैंकिंग सिस्टम को बना दिया गुलाम
सीबीआई ने अदालत को बताया कि यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि बैंकिंग प्रणाली का पूर्ण ध्वस्तीकरण है। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्माॅल फाइनांस बैंक में सरकारी विभागों के खाते बिना किसी सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के खोले गए थे। हैरानी की बात यह है कि बैंक अधिकारियों ने भुगतान के लिए चेक या डेबिट नोट तक का इंतजार नहीं किया। करोड़ों रुपये का ट्रांसफर महज सह-आरोपियों के साथ हुई मौखिक बातचीत के आधार पर कर दिया गया।फर्जी मुहर से चलाया गया काम
जांच एजेंसी के हाथ ऐसे डेबिट नोट लगे हैं जिन पर संबंधित सरकारी विभाग की कोई आधिकारिक मुहर ही नहीं थी। कई जगहों पर फर्जी मुहरों का इस्तेमाल कर बैंक रिकॉर्ड्स को गुमराह किया गया। बैंक अधिकारियों ने न तो रिकॉर्ड्स का मिलान किया और न ही वित्त विभाग के उन निर्देशों का पालन किया जो बैंकों के चयन को लेकर जारी किए गए थे।
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अगला निशाना अधिकारियों पर
सीबीआई के एडिशनल एसपी ने अदालत को सूचित किया है कि यह एक बहुस्तरीय धोखाधड़ी है जिसकी जांच अभी महत्वपूर्ण चरण में है। एजेंसी अब उन कड़ियों को जोड़ रही है जिनसे यह स्पष्ट हो सके कि इस लूट का हिस्सा और किन-किन सफेदपोश व प्रभावशाली लोगों तक पहुंचा है। आने वाले दिनों में कई बड़े अधिकारियों की पहचान और गिरफ्तारी की संभावना है।सीबीआई की जांच में उठे गंभीर सवाल
- डेबिट नोट प्रोसेस करने से पहले संबंधित विभाग से क्रॉस-वेरिफिकेशन क्यों नहीं किया गया?- वित्त विभाग के निर्देशों के बावजूद किन परिस्थितियों में इन बैंकों का चयन हुआ?
-कागजी कंपनियों को करोड़ों का फंड ट्रांसफर होने पर बैंकों के एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग सिस्टम ने अलर्ट क्यों नहीं दिया?
छह आरोपियों का रिमांड तीन दिन और बढ़ाने की मांग
590 करोड़ के घोटाले के मामले में सीबीआई ने अपनी जांच तेज कर दी है। सीबीआई ने पंचकूला स्थित विशेष अदालत में अर्जी दाखिल कर छह मुख्य आरोपियों की पुलिस रिमांड तीन दिनों के लिए और बढ़ाने की मांग की है। इस मामले में अब अगली सुनवाई और आरोपियों की पेशी 27 अप्रैल को होगी। सीबीआई ने अदालत को बताया कि जांच अभी बेहद अहम पड़ाव पर है और सरकारी धन के गबन के इस बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए आरोपियों से और पूछताछ जरूरी है।इन आरोपियों की रिमांड की मांग
-अरुण शर्मा, बैंक अधिकारी-सीमा धीमान व अनुज कौशल, बैंक कर्मचारी
-प्रियंका, बैंक कर्मचारी
-राजन सिंह कटोदिया, सावन ज्वेलर्स के मालिक
-विक्रम वाधवा, सह-आरोपी

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