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दुख से मुक्ति चाहिए तो सुख की इच्छाओं का त्याग करें : कुमारानंद
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 13 Apr 2026 02:06 AM IST
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व्यासपुर में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करते स्वामी कृष्ण कुमारानंद। आयोजक
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व्यासपुर। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। जिसमें स्वामी कृष्ण कुमारानंद ने मानवीय जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस संसार में कोई भी दुख पाने की इच्छा नहीं करता है, परंतु हम सुख पाने के लिए सदा प्रयासरत रहते हैं। अंधकार की तरह ना चाहते हुए भी दु:ख बार-बार हमारे जीवन को आ घेरता है। सुख एक ऐसा भ्रम है जिसकी छाया दुख है।
हम सुख पाने की अभिलाषा में अपने अनुकूल व्यक्ति या वस्तु का चुनाव करते हैं, परंतु उसके पीछे छिपे दुख को नहीं देख पाते और इसी कारण सुख के साधन समय के साथ दुख में परिणित हो जाते हैं। मानव जीवन को सदा के लिए दुख से मुक्ति प्राप्त करने हेतु अचूक सूत्र देते हुए हमारे संत महापुरुष समझाते हैं कि यदि हम दुख से मुक्ति पाना चाहते हैं तो हमें सुख की इच्छाओं का त्याग करना होगा। क्योंकि सुख की इच्छा ही कहीं न कहीं दुख का कारण बनती है। संत महापुरुषों का दृष्टिकोण सदा से ही संसार से अलग रहा है। वे संपूर्ण मानव जाति के कल्याण हेतु समझाते हैं कि आत्म साक्षात्कार से परमानंद की प्राप्ति ही हमें सुख व दु:ख से ऊपर उठा सकती है। ब्रह्मज्ञान ही एक मात्र ऐसा मार्ग है जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप सतचित आनंद से परिचित करवा कर सदा के लिए आनंदमय बना सकता है। इस संसार से मिलने वाला क्षणिक सुख हमें बहुत प्रिय है क्योंकि उसके लिए बाहरी प्रयास करने पड़ते हैं किंतु आत्म साक्षात्कार के द्वारा मिलने वाले परमानंद के लिए अपने स्वयं के मन एवं चित्त के ऊपर कार्य करना होता है। इंद्रियों के विषयों से मन को हटाकर अंतर्मुखी कर के ही हमें परमानन्द की प्राप्ति होती है जिसका कभी क्षय नहीं होता। तभी एक संन्यासी महात्मा अपने में ही मगन होकर संतुष्ट रहते हैं वहीं दूसरी ओर एक सांसारिक व्यक्ति आजीवन अपने सुख संसाधनों में रहता हुआ भी कष्ट पाता है। यह आज के समय की विडंबना है कि जो शाश्वत आनंद है, हम उसे पाने के लिए प्रयास नहीं करते और जो क्षणिक है, उसे पाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन व्यर्थ कर देते हैं।
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हम सुख पाने की अभिलाषा में अपने अनुकूल व्यक्ति या वस्तु का चुनाव करते हैं, परंतु उसके पीछे छिपे दुख को नहीं देख पाते और इसी कारण सुख के साधन समय के साथ दुख में परिणित हो जाते हैं। मानव जीवन को सदा के लिए दुख से मुक्ति प्राप्त करने हेतु अचूक सूत्र देते हुए हमारे संत महापुरुष समझाते हैं कि यदि हम दुख से मुक्ति पाना चाहते हैं तो हमें सुख की इच्छाओं का त्याग करना होगा। क्योंकि सुख की इच्छा ही कहीं न कहीं दुख का कारण बनती है। संत महापुरुषों का दृष्टिकोण सदा से ही संसार से अलग रहा है। वे संपूर्ण मानव जाति के कल्याण हेतु समझाते हैं कि आत्म साक्षात्कार से परमानंद की प्राप्ति ही हमें सुख व दु:ख से ऊपर उठा सकती है। ब्रह्मज्ञान ही एक मात्र ऐसा मार्ग है जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप सतचित आनंद से परिचित करवा कर सदा के लिए आनंदमय बना सकता है। इस संसार से मिलने वाला क्षणिक सुख हमें बहुत प्रिय है क्योंकि उसके लिए बाहरी प्रयास करने पड़ते हैं किंतु आत्म साक्षात्कार के द्वारा मिलने वाले परमानंद के लिए अपने स्वयं के मन एवं चित्त के ऊपर कार्य करना होता है। इंद्रियों के विषयों से मन को हटाकर अंतर्मुखी कर के ही हमें परमानन्द की प्राप्ति होती है जिसका कभी क्षय नहीं होता। तभी एक संन्यासी महात्मा अपने में ही मगन होकर संतुष्ट रहते हैं वहीं दूसरी ओर एक सांसारिक व्यक्ति आजीवन अपने सुख संसाधनों में रहता हुआ भी कष्ट पाता है। यह आज के समय की विडंबना है कि जो शाश्वत आनंद है, हम उसे पाने के लिए प्रयास नहीं करते और जो क्षणिक है, उसे पाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन व्यर्थ कर देते हैं।

व्यासपुर में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करते स्वामी कृष्ण कुमारानंद। आयोजक

व्यासपुर में साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करते स्वामी कृष्ण कुमारानंद। आयोजक
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