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Himachal: हाईकोर्ट ने कहा- अंतिम वरिष्ठता सूची जारी होने से पहले अदालत का रुख करना गलत

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 04 Jun 2026 06:00 AM IST
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सार

हाईकोर्ट ने कॉलेज कैडर के सहायक प्रोफेसरों की टेंटेटिव (संभावित) वरिष्ठता सूची को चुनौती देने वाली एक याचिका को समय से पहले करार देते हुए खारिज कर दिया है।

High Court States: Approaching the Court Before the Issuance of the Final Seniority List is Improper
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कॉलेज कैडर के सहायक प्रोफेसरों की टेंटेटिव (संभावित) वरिष्ठता सूची को चुनौती देने वाली एक याचिका को समय से पहले करार देते हुए खारिज कर दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक विभाग किसी अंतरिम सूची पर आई आपत्तियों का निपटारा करके फाइनल लिस्ट जारी नहीं कर देता तब तक अदालत में याचिका दायर करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का यह मामला बिल्कुल नहीं है कि विभाग ने उनकी आपत्तियों को सुने बिना ही कोई फाइनल वरिष्ठता लिस्ट जारी कर दी हो। कोर्ट ने साफ किया कि याचिकाकर्ता के पास अदालत आने का अधिकार तभी बनेगा जब विभाग अंतिम सूची जारी कर दे और याचिकाकर्ता उससे संतुष्ट न हों। अभी प्रक्रिया बीच में है और अंतिम सूची आना बाकी है, इसलिए अदालत याचिका पर अभी विचार नहीं कर सकता।

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अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि यह कानूनन तय है कि अगर विभाग को टेंटेटिव लिस्ट पर कोई आपत्तियां प्राप्त होती हैं, तो फाइनल वरिष्ठता लिस्ट जारी करने से पहले उन आपत्तियों का निपटारा करना विभाग का कानूनी कर्तव्य है। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि विभाग की ओर से 15 अक्टूबर 2024 को जारी की गई टेंटेटिव सीनियरिटी लिस्ट को रद्द किया जाए, क्योंकि इससे उनके अधिकारों पर विपरीत असर पड़ रहा था। साल 2009 से 2014 के बीच नियुक्त हुए असिस्टेंट प्रोफेसरों की वरिष्ठता सूची को वास्तविक कार्यभार संभालने की तारीख, निरंतर सेवा अवधि और नियमितीकरण के आधार पर दोबारा तैयार करने के निर्देश दिए जाएं।जब तक याचिकाकर्ता की आपत्तियों पर विभाग कोई अंतिम निर्णय नहीं ले लेता, तब तक टेंटेटिव लिस्ट को फाइनल करने पर रोक लगाई जाए।

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जूनियर इंजीनियरों की पेंशन पात्रता तय करने के लिए एकल जज को वापस भेजा मामला

 प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायती राज विभाग में अनुबंध के आधार पर भर्ती हुए जूनियर इंजीनियरों की पेंशन पात्रता से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में नया आदेश जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वर्ष 2021 में दिए गए एकल जज के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें याचिकाकर्ताओं की अनुबंध सेवा अवधि को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन लाभ के लिए गिनने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने कहा कि जब तक इस मामले के वास्तविक और तथ्यात्मक पहलुओं को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर लिया जाता और यह तय नहीं हो जाता कि इन कर्मचारियों पर कौन से नियम लागू होते हैं और यह पेंशनभोगी पद है भी या नहीं, तब तक इस पर सीधे अपील में कोई अंतिम फैसला लेना सही नहीं होगा। इसी के साथ खंडपीठ ने अब इस पूरे मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस सिंगल जज के पास भेज दिया है।

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प्रतिवादियों को शुरुआत में पंचायत समिति के माध्यम से अनुबंध के आधार पर 3600 प्रति माह के वेतन पर जूनियर इंजीनियर नियुक्त किया गया था। बाद में वर्ष 2005 की अधिसूचना के तहत उनके मानदेय में वृद्धि की गई और एक अलग कैडर बनाकर उन्हें नियमित करने का निर्णय लिया गया। इससे पहले एक मार्च 2021 को हाईकोर्ट की एकल जज ने बिजली बोर्ड से जुड़े वीना देवी बनाम एचपीएसईबी मामले का हवाला देते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि इन इंजीनियरों की अनुबंध अवधि को भी पेंशन लाभ के लिए जोड़ा जाए। दिसंबर 2023 में हाईकोर्ट की एक अन्य खंडपीठ ने भी इस फैसले को सही ठहराया था। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को सही पाया कि हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों और तथ्यों पर गौर नहीं किया। सरकार का मुख्य तर्क यह था कि यह विभाग कोई पेंशनभोगी प्रतिष्ठान नहीं है। इन कर्मचारियों पर वर्ष 2006 के संशोधित सीसीएस (पेंशन) नियम लागू नहीं होते।जिला परिषद के जूनियर इंजीनियरों पर वर्ष 2013 के सेवा नियम लागू होते हैं और वे केवल भविष्य निधि के पात्र हैं, न कि सरकारी पेंशन के।सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों के आधार पर हाईकोर्ट के पुराने फैसले को खारिज करते हुए मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेज दिया था।

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