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हिमाचल: सीनियर की गलती पर जूनियर को बर्खास्त करना भेदभावपूर्ण, अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदली सजा

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 23 Jun 2026 05:00 AM IST
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सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी को भेदभावपूर्ण मानते हुए उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया है। 

Himachal: Dismissing a junior for a seniors mistake is discriminatory; penalty commuted to compulsory retireme
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी को भेदभावपूर्ण मानते हुए उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कांस्टेबल को पेंशन और अन्य सभी वित्तीय लाभ देने के भी आदेश दिए हैं। अदालत ने पाया कि इस पूरे घटनाक्रम का मुख्य कसूरवार और प्रेरक उच्च पद पर बैठा अधिकारी था, जिसने अपने जूनियर कांस्टेबल को इस दलदल में धकेला था। 

विभागीय कार्यवाही में दर्ज असिस्टेंट कमांडेंट की पत्नी के बयानों का संज्ञान लिया

खंडपीठ ने विभागीय कार्यवाही में दर्ज असिस्टेंट कमांडेंट की पत्नी के बयानों का संज्ञान लिया। अपने बयानों में पत्नी ने कहा था कि उसके पति ने उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे शराब पिलाई और अपने सुरक्षा सहायक (कांस्टेबल) के साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। इस घिनौने कृत्य का पति ने वीडियो अपने लैपटॉप पर रिकॉर्ड किया और बाद में उसे चुप रहने के लिए धमकाया। अदालत ने कहा कि नवंबर 2008 में लेह में हुई घटना के बाद भी कांस्टेबल अधिकारी और उसकी पत्नी के साथ रिकांगपिओ गया था। इससे स्पष्ट है कि वरिष्ठ अधिकारी पूरे घटनाक्रम से अवगत था और उसकी भूमिका केवल मूक दर्शक की नहीं, बल्कि मुख्य प्रेरक की थी।

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याचिकाकर्ता का आरोप

याचिकाकर्ता कांस्टेबल ने अदालत में दलील दी कि जिस वरिष्ठ अधिकारी पर पूरी घटना को अंजाम देने और वीडियो रिकॉर्ड करने का आरोप था, उसे केवल पेंशन संबंधी लाभों के लिए दो वर्ष की पूर्व सेवा जब्त करने की सजा दी गई थी। जबकि उन्हें सेवा से ही बर्खास्त कर दिया गया। उसने इसे भेदभावपूर्ण और दमनकारी कार्रवाई बताया। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि जब मुख्य दोषी वरिष्ठ अधिकारी माना गया है, तब जूनियर कर्मचारी को नौकरी से हटाने जैसी कठोर सजा न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती। अदालत ने मामले को दोबारा विभाग के पास भेजने के बजाय स्वयं सजा में संशोधन करते हुए बर्खास्तगी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया।

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यह है मामला

मामला वर्ष 2008 का है। आईटीबीपी कांस्टेबल उस समय लेह में असिस्टेंट कमांडेंट के सुरक्षा सहायक के रूप में तैनात था। 2009 में अधिकारी ने अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक का मुकदमा दायर किया, जिसके बाद पत्नी ने डीजी आईटीबीपी से शिकायत की कि उसके पति ने उसे जबरन शराब पिलाई और सुरक्षा सहायक (कांस्टेबल) के साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जिसका वीडियो अधिकारी ने खुद अपने लैपटॉप पर रिकॉर्ड किया था। जांच कमेटी ने वर्ष 2010 में कांस्टेबल को अनुशासनहीनता और अनैतिक संबंधों का दोषी मानते हुए सेवा से बर्खास्त कर दिया। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने कमेटी के फैसले को सही ठहराया था। कमेटी के बर्खास्तगी आदेशों और एकलपीठ के फैसले के खिलाफ कांस्टेबल ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी।

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