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Himachal: सर्दियों में 12.72 प्रतिशत घटा स्नो कवर, रिकॉर्ड 13,569 भूस्खलन क्षेत्र चिह्नित

अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 17 Jun 2026 05:00 AM IST
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सार

राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र की ताजा रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन ने हिमाचल के पूरे जल विज्ञान चक्र (हाइड्रोलॉजिकल पैटर्न) को प्रभावित कर दिया है। 

Himachal: Snow cover declined by 12.72 percent during winter; a record 13,569 landslide zones identified.
जलवायु परिवर्तन, संकट की आहट। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृ़तिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र की ताजा रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन ने हिमाचल के पूरे जल विज्ञान चक्र (हाइड्रोलॉजिकल पैटर्न) को प्रभावित कर दिया है। इसका सबसे बड़ा संकेत सर्दियों के दौरान बर्फबारी में आई भारी कमी और मानसून में बढ़ती अत्यधिक वर्षा घटनाओं के रूप में सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023-24 के शीतकालीन मौसम में राज्य के कुल मौसमी स्नो-कवर क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में 12.72 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बेसिनवार आंकड़ों पर नजर डालें तो चिनाब बेसिन में बर्फबारी क्षेत्र 15.39 प्रतिशत घटा, जबकि सतलुज बेसिन में 12.45 प्रतिशत, रावी बेसिन में 9.89 प्रतिशत और ब्यास बेसिन में 7.65 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

पूरे राज्य में रिकॉर्ड 13,569 भूस्खलन क्षेत्रों की मैपिंग

विशेषज्ञों का मानना है कि सर्दियों में बर्फबारी कम होने से पर्वतीय ढलानों को मिलने वाली प्राकृतिक नमी और स्थिरता प्रभावित होती है। इसके बाद मानसून में कम समय में अत्यधिक बारिश होने पर मिट्टी और चट्टानें तेजी से खिसकने लगती हैं, जिससे भूस्खलन और फ्लैश फ्लड की घटनाएं बढ़ जाती हैं। इसी का परिणाम है कि राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र की पोस्ट-मानसून लैंडस्लाइड इन्वेंट्री में पूरे राज्य में रिकॉर्ड 13,569 भूस्खलन क्षेत्रों की मैपिंग की गई है। जिलावार आंकड़े खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। कांगड़ा जिला 4,027 भूस्खलन स्थलों के साथ राज्य में सबसे ऊपर है।

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तीव्र वर्षा घटनाओं ने 32 फ्लैश फ्लड और 163 बड़े भूस्खलनों को जन्म दिया

इसके बाद मंडी में 2,169 और सोलन में 1,930 भूस्खलन क्षेत्र दर्ज किए गए हैं। चंबा में भी 534 संवेदनशील भूस्खलन स्थल चिह्नित किए गए हैं। रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मानसून के दौरान केवल तीन अत्यधिक तीव्र वर्षा घटनाओं ने पूरे प्रदेश में 32 फ्लैश फ्लड और 163 बड़े भूस्खलनों को जन्म दिया। इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि अब आपदाएं लंबे समय तक चलने वाली बारिश की बजाय कुछ घंटों की अत्यधिक वर्षा से भी बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती हैं। ऐसी ही घटनाओं में शिमला के समरहिल स्थित शिव मंदिर हादसा शामिल है, जिसमें 20 लोगों की मौत हुई थी। वहीं मंडी जिले के थुनाग बाजार में भी भारी नुकसान दर्ज किया गया।

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नहीं संभले तो गंभीर प्राकृतिक आपदाएं

इन घटनाओं ने पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ती संवेदनशीलता और कमजोर होती ढलानों की वास्तविक तस्वीर सामने रखी। विशेषज्ञों के अनुसार हिमाचल अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है जहां बर्फबारी में कमी, तापमान में वृद्धि और अत्यधिक वर्षा की घटनाएं एक-दूसरे से जुड़कर बहु-आपदा जोखिम पैदा कर रही हैं। इससे सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं, जलापूर्ति योजनाएं और बस्तियां लगातार खतरे के दायरे में आ रही हैं। रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए विकास योजनाओं, भूमि उपयोग और आपदा प्रबंधन रणनीतियों में बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में हिमाचल को और अधिक गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। मानसून 2026 की दहलीज पर खड़े प्रदेश के लिए यह चेतावनी किसी अलार्म से कम नहीं है।

क्या कहते हैं वैज्ञानिक

यह रिपोर्ट चिंता के साथ-साथ चेतावनी भी है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना अब अनिवार्य हो गया है। वैज्ञानिक योजना और स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन उपाय अपनाकर हिमाचल आपदा जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है।– डाॅ. पवन कुमार अत्री, पर्यावरण विज्ञानी, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय

रिपोर्ट पढ़ने के बाद ही कर पाऊंगा टिप्पणी: सिंगला
सचिव पर्यावरण, विज्ञान एवं तकनीकी सुशील कुमार सिंगला से जब इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने बताया कि यह संवेदनशील मामला है, रिपोर्ट पढ़ने के बाद ही कोई टिप्पणी कर पाऊंगा।

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