हिमाचल प्रदेश: वक्त के साथ कितना बदल गया कुल्लू दशहरा? बुजुर्गों ने बताई पुरानी कहानी; परंपराएं पीछे छूटीं?
कुल्लू दशहरा उत्सव ने समय के साथ कई बदलाव देखे हैं। बुजुर्गों के अनुसार, पहले देव समाज के लोग घर से राशन और बिस्तर लेकर आते थे और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उत्सव मनाते थे। आज सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन देव संस्कृति, पारंपरिक पहनावे और नाटी के बदलते स्वरूप को लेकर चिंता भी बढ़ी है। पढ़ें विस्तार से...
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ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में चलने वाला कुल्लू का दशहरा उत्सव यूं ही अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंचा....इस सफर में उत्सव ने कई उतार चढ़ाव और बदलाव देखे हैं। कुल्लू दशहरा उत्सव में पहुंचे 70 से 80 वर्ष तक के बुजुर्गों का कहना है कि उत्सव में कई अच्छे बदलाव भी आए हैं और कई बदलाव हमारी संस्कृति के लिए ठीक नहीं है इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
उनका कहना है कि एक समय ऐसा भी था जब देव संस्कृति का निर्वाहन करने के लिए देव समाज के लोग अपने घरों से ही उत्सव के लिए राशन और बिस्तर घर से लेकर आते थे और यहां खुले आसमान तले देव परंपरा का निर्वाहन करते थे। तब देवी देवताओं की भागीदारी भी कम हुआ करती थी और भीड़-भाड़ भी नहीं होती थी। लेकिन धीरे धीरे सरकारी सहायता मिलने लगी और देवी-देवता की भागीदारी भी बढ़ती गई। हालांकि यह पहलु देव संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अच्छा है। लेकिन दूसरी तरफ पहनावे के बदलते स्वरूप से संस्कृति प्रभावित हो रही है।
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