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Mandi News: छोटी काशी में जातर की शोभा बढ़ाएंगे देव भंगरोही
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बालाकामेश्वर देव भंगरोही (तरौर )
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गोहर (मंडी)। 18 व्याधियों के देवता देव बाला कामेश्वर भंगरोही (तरौर) शिवरात्रि महोत्सव के अगले दिन छोटी काशी में शुरू होने जा रही जातर की शोभा बढ़ाएंगे। मंदिर प्रबंधन कमेटी के प्रधान संजय कुमार व सदस्य अनिल कुमार शर्मा ने बताया कि देव भंगरोही आगामी 16 फरवरी को अपने भंडार से छोटी काशी रवाना होंगे। देवता को 18 व्याधियों का निवारक के रूप में पूजा जाता है। देव भंगरोह बड़ा देव कमरूनाग के अठारह टिक्कों में से हैं, जो भंगरोही के नाम से विख्यात है। मान्यता है कि देवता को घातक महामारियों को नष्ट करने की शक्तियां प्राप्त हैं। साथ ही देवता के भक्तजन पुत्र प्राप्ति की कामना भी करते हैं।
मंदिर प्रबंधन कमेटी के प्रधान संजय कुमार और सदस्य अनिल कुमार शर्मा ने बताया कि मान्यता है कि 17वीं शताब्दी के दौरान मंडी रियासत के कई शहरी और ग्रामीण इलाकों में पन्याले (चेचक) महामारी ने पांव पसार लिए थे। दौरान महामारी से निपटने को लेकर राजा ने कई उपाय किए, यहां तक कि शहर से बाहर से कई नामी वैद हकीम बुलाए गए, लेकिन महामारी रुकने के बजाय और अधिक इलाकों को जकड़ने लगी। राजा ने कई देवी-देवताओं की शरण ली। अंत में राजा ने प्रभावित क्षेत्रों की सीमा के चारों ओर कांटों से बाड़बंदी करने के फरमान जारी किए। ताकि यहां से बाहर न तो कोई निवासी निकल पाए और न ही कोई सीमा के अंदर घुस पाए।
जैसे ही महामारी ने शहर से ऊपरी सीमा की ओर दस्तक देनी शुरू की, जिसमें देवता की हारिया चपेट में आने लगी तो देवता ने अपने गुर केशब राम के मुख की वाणी से आगाह किया कि वे अपने भक्तजनों पर किसी प्रकार कि व्याधि को नजदीक नहीं आने देंगे। उन्होंने इसे जड़ से खत्म करने की हामी भर दी। बात राजा के पास पहुंच गई और राजा ने देवता को बुलाने के आदेश जारी कर दिए। देवता अपनी बहन चत्रभुजा (मरोही) को भी साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन राजा की ओर से देवता भंगरोही को ही बुलाने के आदेश पर गूर ने माता का मोहरा (निशान) गले में डाल कर साथ ले गए।
इसके बाद देवता ने जब अपने स्थान से रवानगी की, वे प्रभावित क्षेत्रों में की गई बाड़बंदी को खोलते गए और महामारी भागती गई। राजा के महल पहुंचने तक महामारी पुरी तरह से खत्म हो गई। राजा ने देवता का बड़े हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया और राजशाही खजाने से भेंट अर्पित की। तब से लेकर देवता का मंडी के अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि महोत्सव में प्रमुख स्थान माना जाता है।
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मंदिर प्रबंधन कमेटी के प्रधान संजय कुमार और सदस्य अनिल कुमार शर्मा ने बताया कि मान्यता है कि 17वीं शताब्दी के दौरान मंडी रियासत के कई शहरी और ग्रामीण इलाकों में पन्याले (चेचक) महामारी ने पांव पसार लिए थे। दौरान महामारी से निपटने को लेकर राजा ने कई उपाय किए, यहां तक कि शहर से बाहर से कई नामी वैद हकीम बुलाए गए, लेकिन महामारी रुकने के बजाय और अधिक इलाकों को जकड़ने लगी। राजा ने कई देवी-देवताओं की शरण ली। अंत में राजा ने प्रभावित क्षेत्रों की सीमा के चारों ओर कांटों से बाड़बंदी करने के फरमान जारी किए। ताकि यहां से बाहर न तो कोई निवासी निकल पाए और न ही कोई सीमा के अंदर घुस पाए।
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जैसे ही महामारी ने शहर से ऊपरी सीमा की ओर दस्तक देनी शुरू की, जिसमें देवता की हारिया चपेट में आने लगी तो देवता ने अपने गुर केशब राम के मुख की वाणी से आगाह किया कि वे अपने भक्तजनों पर किसी प्रकार कि व्याधि को नजदीक नहीं आने देंगे। उन्होंने इसे जड़ से खत्म करने की हामी भर दी। बात राजा के पास पहुंच गई और राजा ने देवता को बुलाने के आदेश जारी कर दिए। देवता अपनी बहन चत्रभुजा (मरोही) को भी साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन राजा की ओर से देवता भंगरोही को ही बुलाने के आदेश पर गूर ने माता का मोहरा (निशान) गले में डाल कर साथ ले गए।
इसके बाद देवता ने जब अपने स्थान से रवानगी की, वे प्रभावित क्षेत्रों में की गई बाड़बंदी को खोलते गए और महामारी भागती गई। राजा के महल पहुंचने तक महामारी पुरी तरह से खत्म हो गई। राजा ने देवता का बड़े हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया और राजशाही खजाने से भेंट अर्पित की। तब से लेकर देवता का मंडी के अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि महोत्सव में प्रमुख स्थान माना जाता है।
