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Sirmour News: अदालत , महोदय उत्तराखंड के लिए जरूरी..

Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 03 May 2026 11:58 PM IST
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गवाह पलटे; ढही पुलिस की कहानी, देह व्यापार और
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मानव तस्करी में कोर्ट से दंपती को मिली क्लीन चिट
- एएसजे कोर्ट का फैसला, 2019 को पांवटा साहिब में दर्ज मामले में पुलिस ने गेस्ट हाउस में छापेमारी में महिला को किया था रेस्क्यू
- कई गवाहों के मुकरने से कमजोर पड़ा अभियोजन का मामला, पुलिस की छापेमारी पर उठे सवाल
- अदालत ने कहा : संदेह की स्थिति में आरोपियों को लाभ देना न्यायसंगत
दीपक मेहता

नाहन (सिरमौर)। जिले के उपमंडल पांवटा साहिब के चर्चित देह व्यापार और मानव तस्करी मामले में अदालत के समक्ष गवाहों ने पुलिस की कहानी को पूरी तरह से बदल दिया। सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से मुकर गए। पुलिस कार्रवाई की पुष्टि स्पष्ट रूप से नहीं करते हुए गवाहों ने कहा कि उन्होंने कागज पुलिस के कहने पर साइन किए थे। इससे अभियोजन का मामला कमजोर पड़ गया। इस संदेह की स्थिति में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) गौरव महाजन ने मामले के आरोपी दंपती को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।
यह मामला 14 सितंबर 2019 को पांवटा साहिब थाना में दर्ज हुआ है। पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि पांवटा साहिब स्थित एक पेइंग गेस्ट हाउस में अवैध देह व्यापार चल रहा है। इसके बाद पुलिस ने छापा मारकर एक महिला को बरामद किया और मौके से कुछ नकदी और अन्य सामग्री भी जब्त की। पुलिस ने आरोप लगाया था कि उत्तराखंड के तहसील त्यूणी निवासी कृपाल सिंह और किरण चौहान ग्राहकों से पैसे लेकर देह व्यापार करवा रहे थे। अभियोजन पक्ष ने 17 गवाहों के बयान दर्ज किए।
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हालांकि, सुनवाई के दौरान मामले को साबित करने के लिए स्वतंत्र गवाहों ने पुलिस की कहानी को सपोर्ट नहीं किया। दो स्वतंत्र गवाहों ने कहा कि उन्हें घटना की पूरी जानकारी नहीं है। उन्होंने छापेमारी, बरामदगी और कार्रवाई की पुष्टि नहीं की। बाद में इन्हें शत्रुतापूर्ण घोषित किया गया। अदालत की सख्त टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इस संदेह की स्थिति में आरोपियों को लाभ देना न्यायसंगत है।
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सबूतों में विरोधाभास, आरोपियों को सबूतों में संदेह का लाभ
अदालत ने फैसले में कहा कि प्रस्तुत साक्ष्यों में कई विरोधाभास हैं। बरामदगी और घटनाक्रम को लेकर स्पष्टता नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट में भी ऐसे ठोस संकेत नहीं मिले, जो जबरन देह व्यापार या मानव तस्करी की पुष्टि करते हों। इसी आधार पर अदालत ने आईपीसी की धारा 370 और अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों को साबित न मानते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया।
संवाद
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