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200 एजेंट, 400 टिकट: मुंबई में चल रहा रहा था VIP कोटे का काला कारोबार, छह आरोपियों ने कैसे की धांधली?
Fri, 31 Jul 2026 12:05 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, मुंबई
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, मुंबई
Published by: अस्मिता त्रिपाठी
Updated Fri, 31 Jul 2026 12:05 PM IST
सार
मुंबई पुलिस ने वीवीआईपी कोटे से फर्जी रेल टिकट कन्फर्म कराने वाले बड़े रैकेट का भंडाफोड़ किया है। मास्टरमाइंड कपड़ा व्यापारी अमरीश ठक्कर समेत छह आरोपी गिरफ्तार हुए। गिरोह ने फर्जी लेटरहेड और हस्ताक्षरों से 400 से अधिक टिकट कन्फर्म कराए। पुलिस रेलवे अधिकारियों की संलिप्तता की भी जांच कर रही है।
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रेल टिकट के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
मुंबई का एक कपड़ा व्यापारी पिछले तीन-चार साल से पूरे देश में वीवीआईपी कोटे से रेल टिकट कन्फर्म कराने का बड़ा रैकेट चला रहा था। उसके अंडर करीब 200 एजेंट काम कर रहे थे, जो अलग-अलग राज्यों से यात्रियों के आवेदन जुटाकर भेजते थे। जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क के जरिए राज्यपाल के एडीसी (एड-डी-कैंप), मंत्रियों, वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों और अन्य बड़े पदाधिकारियों के फर्जी लेटरहेड तैयार कर अब तक 400 से ज्यादा रेल टिकट वीवीआईपी कोटे से कन्फर्म कराए गए। मुंबई के मालाबार हिल पुलिस ने इस पूरे रैकेट का पर्दाफाश करते हुए कपड़ा व्यापारी समेत छह लोगों को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के मुताबिक, इस गिरोह का मास्टरमाइंड अमरीश ईश्वरलाल ठक्कर (41) है। वह दादर में थोक कपड़े का कारोबार करता था, लेकिन जल्दी और ज्यादा कमाई के लालच में उसने वीवीआईपी कोटे से टिकट कन्फर्म कराने का अवैध कारोबार शुरू कर दिया। जांच में पता चला कि उसका नेटवर्क केवल मुंबई तक सीमित नहीं था, बल्कि गुजरात और उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था। उसके अधीन करीब 200 एजेंट और सब-एजेंट काम करते थे, जो जरूरतमंद यात्रियों से मोटी रकम लेकर टिकट कन्फर्म कराने का दावा करते थे।
इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ, जब मुंबई में लोक भवन के अधिकारियों से भारतीय रेलवे ने संपर्क किया। रेलवे ने बताया कि वीवीआईपी कोटे से टिकट कन्फर्म कराने के लिए कुछ आवेदन आए हैं, जिन पर राज्यपाल के एडीसी (एड-डी-कैंप) के हस्ताक्षर और मुहर लगी हुई है। लोक भवन में जब इन दस्तावेजों की जांच की गई तो पता चला कि आधिकारिक लेटरहेड की हूबहू नकल कर फर्जी आवेदन तैयार किए गए हैं। इसके बाद लोक भवन प्रशासन ने मुंबई के मालाबार हिल पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
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मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच शुरू की और सबसे पहले उन चार सब-एजेंटों तक पहुंची, जो वीवीआईपी कोटे के जरिए टिकट कन्फर्म कराने का काम कर रहे थे। पुलिस ने तारिक खान (33), दीपक कुमार यादव (27), विनय रावत (24) और शत्रुंजय यादव उर्फ मोहन उर्फ अनूप (34) को गिरफ्तार किया। इनसे पूछताछ में पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ और मास्टरमाइंड अमरीश ठक्कर तक पुलिस पहुंच गई। बाद में उसके छोटे भाई सागर ठक्कर (32) को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
मुंबई की पुलिस उपायुक्त आर. रागासुधा ने बताया कि सागर अपने भाई की मदद से राज्यपाल के एडीसी, मंत्रियों, वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों और अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के नाम से फर्जी लेटरहेड तैयार करता था। इन्हीं लेटरहेड और जाली हस्ताक्षरों के आधार पर वीवीआईपी कोटे से टिकट कन्फर्म कराने के लिए आवेदन भेजे जाते थे।
जांच में यह भी पता चला कि अमरीश के खिलाफ पहले से मुंबई के कुर्ला गवर्नमेंट रेलवे पुलिस और मुंबई सेंट्रल में डिविजनल रेलवे मैनेजर (डीआरएम) के फर्जी लेटरहेड का इस्तेमाल कर टिकट कन्फर्म कराने के मामले दर्ज हैं। इसके बावजूद वह लगातार अपना नेटवर्क बढ़ाता रहा।
पुलिस के अनुसार गिरोह टिकट की मांग और उसकी तत्काल जरूरत के हिसाब से रकम तय करता था। जिस यात्री को जितनी जल्दी टिकट चाहिए होती थी, उससे उतने ज्यादा पैसे वसूले जाते थे। कई मामलों में आरोपियों ने टिकट की वास्तविक कीमत से दोगुना तक पैसा वसूला।
छापेमारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से 12 मोबाइल फोन, 16 सिम कार्ड, 70 से ज्यादा क्रेडिट और डेबिट कार्ड तथा 400 से अधिक यात्रियों का डेटा बरामद किया है। जांच में सामने आया है कि इन्हीं यात्रियों के टिकट फर्जी लेटरहेड के जरिए वीवीआईपी कोटे से कन्फर्म कराए गए थे। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इस पूरे रैकेट में रेलवे का कोई कर्मचारी या अन्य सरकारी व्यक्ति भी शामिल था या नहीं।
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पुलिस के मुताबिक, इस गिरोह का मास्टरमाइंड अमरीश ईश्वरलाल ठक्कर (41) है। वह दादर में थोक कपड़े का कारोबार करता था, लेकिन जल्दी और ज्यादा कमाई के लालच में उसने वीवीआईपी कोटे से टिकट कन्फर्म कराने का अवैध कारोबार शुरू कर दिया। जांच में पता चला कि उसका नेटवर्क केवल मुंबई तक सीमित नहीं था, बल्कि गुजरात और उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था। उसके अधीन करीब 200 एजेंट और सब-एजेंट काम करते थे, जो जरूरतमंद यात्रियों से मोटी रकम लेकर टिकट कन्फर्म कराने का दावा करते थे।
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इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ, जब मुंबई में लोक भवन के अधिकारियों से भारतीय रेलवे ने संपर्क किया। रेलवे ने बताया कि वीवीआईपी कोटे से टिकट कन्फर्म कराने के लिए कुछ आवेदन आए हैं, जिन पर राज्यपाल के एडीसी (एड-डी-कैंप) के हस्ताक्षर और मुहर लगी हुई है। लोक भवन में जब इन दस्तावेजों की जांच की गई तो पता चला कि आधिकारिक लेटरहेड की हूबहू नकल कर फर्जी आवेदन तैयार किए गए हैं। इसके बाद लोक भवन प्रशासन ने मुंबई के मालाबार हिल पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
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मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच शुरू की और सबसे पहले उन चार सब-एजेंटों तक पहुंची, जो वीवीआईपी कोटे के जरिए टिकट कन्फर्म कराने का काम कर रहे थे। पुलिस ने तारिक खान (33), दीपक कुमार यादव (27), विनय रावत (24) और शत्रुंजय यादव उर्फ मोहन उर्फ अनूप (34) को गिरफ्तार किया। इनसे पूछताछ में पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ और मास्टरमाइंड अमरीश ठक्कर तक पुलिस पहुंच गई। बाद में उसके छोटे भाई सागर ठक्कर (32) को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
मुंबई की पुलिस उपायुक्त आर. रागासुधा ने बताया कि सागर अपने भाई की मदद से राज्यपाल के एडीसी, मंत्रियों, वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों और अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के नाम से फर्जी लेटरहेड तैयार करता था। इन्हीं लेटरहेड और जाली हस्ताक्षरों के आधार पर वीवीआईपी कोटे से टिकट कन्फर्म कराने के लिए आवेदन भेजे जाते थे।
जांच में यह भी पता चला कि अमरीश के खिलाफ पहले से मुंबई के कुर्ला गवर्नमेंट रेलवे पुलिस और मुंबई सेंट्रल में डिविजनल रेलवे मैनेजर (डीआरएम) के फर्जी लेटरहेड का इस्तेमाल कर टिकट कन्फर्म कराने के मामले दर्ज हैं। इसके बावजूद वह लगातार अपना नेटवर्क बढ़ाता रहा।
पुलिस के अनुसार गिरोह टिकट की मांग और उसकी तत्काल जरूरत के हिसाब से रकम तय करता था। जिस यात्री को जितनी जल्दी टिकट चाहिए होती थी, उससे उतने ज्यादा पैसे वसूले जाते थे। कई मामलों में आरोपियों ने टिकट की वास्तविक कीमत से दोगुना तक पैसा वसूला।
छापेमारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से 12 मोबाइल फोन, 16 सिम कार्ड, 70 से ज्यादा क्रेडिट और डेबिट कार्ड तथा 400 से अधिक यात्रियों का डेटा बरामद किया है। जांच में सामने आया है कि इन्हीं यात्रियों के टिकट फर्जी लेटरहेड के जरिए वीवीआईपी कोटे से कन्फर्म कराए गए थे। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि इस पूरे रैकेट में रेलवे का कोई कर्मचारी या अन्य सरकारी व्यक्ति भी शामिल था या नहीं।