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Rahul Gandhi: पीएम आवास के पास राहुल के प्रदर्शन पर सीजेआई से दखल का अनुरोध, वकीलों ने पत्र में क्या कहा?
Fri, 24 Jul 2026 03:43 PM IST
निर्मल कांत
आईएएनएस, नई दिल्ली।
आईएएनएस, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 24 Jul 2026 03:43 PM IST
सार
प्रधानमंत्री आवास के पास राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं के धरना प्रदर्शन को लेकर देशभर के वकीलों के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की है। वकीलों ने इसे सुरक्षा और सांविधानिक व्यवस्था से जुड़ा मामला बताते हुए जांच और उच्च सुरक्षा वाले इलाकों में प्रदर्शनों के लिए दिशा-निर्देश बनाने का अनुरोध किया है। पढ़िए रिपोर्ट-
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राहुल गांधी, कांग्रेस नेता
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
देशभर के वकीलों के एक समूह ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत को पत्र लिखा है। इसमें सुप्रीम कोर्ट से 21 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास 7, लोक कल्याण मार्ग के पास नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के धरना प्रदर्शन का स्वत: संज्ञान लेने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट के कई वकीलों के हस्ताक्षर
इस पत्र पर हाईकोर्ट के कई वकीलों के हस्ताक्षर हैं। इसे वकील संकेत गुप्ता ने समन्वित किया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट से प्रदर्शन की तथ्य जांच कराने और उच्च सुरक्षा वाले स्थानों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है।
पत्र में वकीलों ने क्या कहा?
पत्र में राहुल गांधी की उस सोशल मीडिया पोस्ट का जिक्र किया गया, जिसमें उन्होंने लोगों से धरने में शामिल होने की अपील की थी। इसमें कहा गया कि प्रधानमंत्री आवास के पास लोगों को जुटाने का आह्वान गंभीर और पहले से अनुमान लगाए जा सकने वाले सुरक्षा खतरे पैदा कर सकता है। क्योंकि वहां आने वाली भीड़ की संख्या और उसमें शामिल लोगों के बारे में पहले से जानकारी नहीं होती।
वकीलों ने क्या आग्रह किया?
वकीलों के अनुसार, करीब तीन घंटे बाद दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी और अन्य सांसदों को वहां से हटाया। यह गंभीर चिंता का विषय है कि नेता प्रतिपक्ष जैसे सांविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति ने पुलिस को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां उन्हें शारीरिक रूप से हटाने की जरूरत पड़ी। वकीलों ने कहा कि इतने संवेदनशील स्थान पर किसी अप्रिय घटना के गंभीर परिणाम हो सकते थे।
वकीलों ने कहा कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान से मिला हुआ है। लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
ये भी पढ़ें: राहुल का दावा- प्रदर्शन में युवक पर चलाई गई पैलेट गन, धर्मेंद्र प्रधान 'अपराधी शिक्षा मंत्री'
पत्र में कहा गया, संविधान का अनुच्छेद 19(1)(बी) शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार भारत की सार्वजनिक व्यवस्था और संप्रभुता तथा अखंडता के हित में अनुच्छेद 19(3) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
पत्र में यह भी कहा गया कि उच्च सुरक्षा वाले स्थानों पर बिना जांच के ऐसे प्रदर्शनों की अनुमति देना गलत परंपरा शुरू कर सकता है। अगर यह नियमित प्रक्रिया बन गई तो देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगातार गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
वकीलों ने कहा, संविधान आम नागरिक और देश के सबसे बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के बीच कोई अंतर नहीं करता। सभी कानून के सामने बराबर हैं और संविधान से मिला प्रदर्शन का अधिकार संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से अनुमति लेने जैसी उचित सीमाओं के अधीन रहना चाहिए।
वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए घटना का स्वत: संज्ञान लेने, तथ्य जांच का आदेश देने और उच्च सुरक्षा वाले स्थानों के आसपास प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए एक समान दिशा-निर्देश बनाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि ये दिशा-निर्देश सभी राजनीतिक दलों और संगठनों पर समान रूप से लागू होने चाहिए। साथ ही इनमें संविधान से मिले प्रदर्शन के अधिकार और सुरक्षा जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए।
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हाईकोर्ट के कई वकीलों के हस्ताक्षर
इस पत्र पर हाईकोर्ट के कई वकीलों के हस्ताक्षर हैं। इसे वकील संकेत गुप्ता ने समन्वित किया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट से प्रदर्शन की तथ्य जांच कराने और उच्च सुरक्षा वाले स्थानों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है।
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पत्र में वकीलों ने क्या कहा?
- वकीलों ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर हुआ यह प्रदर्शन सामान्य सार्वजनिक सभा से अलग मुद्दा उठाता है। उनके अनुसार, यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सांविधानिक व्यवस्था से जुड़े सवालों से जुड़ा है।
- पत्र में कहा गया है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और अन्य सांसदों और केरल तथा कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री आवास के बेहद करीब बिना पूर्व सूचना या अनुमति के धरना दिया।
- वकीलों ने कहा कि यह क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी के सबसे ज्यादा सुरक्षा वाले स्थानों में से एक है। ऐसे में यहां बिना नियंत्रण के किसी भी तरह की भीड़ जुटने से सामान्य प्रदर्शनों की तुलना में अलग सुरक्षा चिंताएं पैदा होती हैं।
- पत्र में आरोप लगाया गया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों से कई बार वहां से हटने का अनुरोध किया। उन्हें बताया गया कि यह उच्च सुरक्षा वाला क्षेत्र है, लेकिन इसके बावजूद प्रदर्शन जारी रहा।
- वकीलों ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने राहुल गांधी से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी।
- उन्होंने राहुल गांधी से प्रदर्शन खत्म करने की अपील की थी और भरोसा दिया था कि सरकार संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। इसके बावजूद कई घंटों तक प्रदर्शन जारी रहा।
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पत्र में राहुल गांधी की उस सोशल मीडिया पोस्ट का जिक्र किया गया, जिसमें उन्होंने लोगों से धरने में शामिल होने की अपील की थी। इसमें कहा गया कि प्रधानमंत्री आवास के पास लोगों को जुटाने का आह्वान गंभीर और पहले से अनुमान लगाए जा सकने वाले सुरक्षा खतरे पैदा कर सकता है। क्योंकि वहां आने वाली भीड़ की संख्या और उसमें शामिल लोगों के बारे में पहले से जानकारी नहीं होती।
वकीलों ने क्या आग्रह किया?
वकीलों के अनुसार, करीब तीन घंटे बाद दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी और अन्य सांसदों को वहां से हटाया। यह गंभीर चिंता का विषय है कि नेता प्रतिपक्ष जैसे सांविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति ने पुलिस को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां उन्हें शारीरिक रूप से हटाने की जरूरत पड़ी। वकीलों ने कहा कि इतने संवेदनशील स्थान पर किसी अप्रिय घटना के गंभीर परिणाम हो सकते थे।
वकीलों ने कहा कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान से मिला हुआ है। लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
ये भी पढ़ें: राहुल का दावा- प्रदर्शन में युवक पर चलाई गई पैलेट गन, धर्मेंद्र प्रधान 'अपराधी शिक्षा मंत्री'
पत्र में कहा गया, संविधान का अनुच्छेद 19(1)(बी) शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार भारत की सार्वजनिक व्यवस्था और संप्रभुता तथा अखंडता के हित में अनुच्छेद 19(3) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
पत्र में यह भी कहा गया कि उच्च सुरक्षा वाले स्थानों पर बिना जांच के ऐसे प्रदर्शनों की अनुमति देना गलत परंपरा शुरू कर सकता है। अगर यह नियमित प्रक्रिया बन गई तो देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगातार गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
वकीलों ने कहा, संविधान आम नागरिक और देश के सबसे बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के बीच कोई अंतर नहीं करता। सभी कानून के सामने बराबर हैं और संविधान से मिला प्रदर्शन का अधिकार संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से अनुमति लेने जैसी उचित सीमाओं के अधीन रहना चाहिए।
वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए घटना का स्वत: संज्ञान लेने, तथ्य जांच का आदेश देने और उच्च सुरक्षा वाले स्थानों के आसपास प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए एक समान दिशा-निर्देश बनाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि ये दिशा-निर्देश सभी राजनीतिक दलों और संगठनों पर समान रूप से लागू होने चाहिए। साथ ही इनमें संविधान से मिले प्रदर्शन के अधिकार और सुरक्षा जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए।