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बंगाल के मुस्लिम वोटर किधर: 30% से अधिक आबादी वाली 85 सीटों में 2021 में टीएमसी ने जीती 75, इस बार क्या होगा?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Mon, 04 May 2026 07:12 AM IST
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सार

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में 30% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली सीटों का सटीक चुनावी गणित समझें। 2021 में टीएमसी ने मुस्लिम सीटें जीती थीं, जानें इस बार वोटों के बिखराव का क्या होगा असर और कैसे यह तय करेगा सत्ता की चाबी।

Bengal Elections 2026 Results Muslim-majority seats Bengal TMC vs BJP West Bengal exit polls ISF and Congress
,assembly election result 2026 - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनाव के नतीजे राज्य के जनसांख्यिकीय गणित, खासकर 'मुस्लिम बहुल' सीटों पर टिके हैं। राज्य की 294 सदस्यीय विधानसभा में सत्ता की चाबी उन निर्वाचन क्षेत्रों में छिपी है, जहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2021 में इस वोट बैंक के बंपर समर्थन से सत्ता बचाने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) क्या इस बार बहुकोणीय मुकाबले में अपना एकाधिकार कायम रख पाएगी?

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2021 का एकतरफा समीकरण और टीएमसी का क्लीन स्वीप

भारत की चुनावी प्रणाली में, अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में एक ही समुदाय की 30% से अधिक सघन आबादी हो, तो वह नतीजे तय करने की ताकत रखती है। आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 89 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30% के महत्वपूर्ण मानक को पार करती है। कुछ अनुमानों के अनुसार राज्य की कुल 294 सीटों में से लगभग 85 से 110 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी इस 30% के महत्वपूर्ण वैचारिक और सांख्यिकीय मानक के पार है। वहीं करीब 112 निर्वाचन क्षेत्रों में यह 25% से अधिक है। 

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पश्चिम बंगाल के राजनीति इतिहास पर गौर करें तो इन क्षेत्रों पर दशकों तक वाम मोर्चे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का निर्विवाद राजनीतिक एकाधिकार रहा था। हालांकि, 2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद से, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस  ने इस विशाल अल्पसंख्यक वोट बैंक पर अपना एकछत्र रणनीतिक प्रभुत्व स्थापित कर लिया, जिसने उन्हें 2011, 2016 और 2021 में लगातार तीन बार भारी बहुमत के साथ सत्ता में बनाए रखा।

2021 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने 30% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली करीब 85 में से 75 सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज करते हुए लगभग क्लीन स्वीप किया था। 'एक्सिस माय इंडिया' के 2021 एग्जिट पोल के अनुसार, उस दौरान लगभग 75% मुस्लिम मतदाताओं ने एकजुट होकर टीएमसी को वोट दिया था। इसी एकमुश्त समर्थन ने भाजपा के आक्रामक अभियान को रोक दिया था। 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर टीएमसी ने दबदबा दिखाया था। मुर्शिदाबाद की 22 में से 20 सीटों पर टीएमसी जीती, दो सीटें बीजेपी को मिलीं। कांग्रेस और लेफ्ट का खाता नहीं खुला। मालदा की 12 सीटों में टीएमसी ने आठ और बीजेपी ने चार सीटें जीतीं। उत्तर दिनाजपुर में टीएमसी को सात और बीजेपी को दो सीटें मिलीं। बीरभूम की 11 में से 10 सीटें टीएमसी ने जीतीं, एक बीजेपी के पास गई। दक्षिण 24 परगना की 31 में से 30 सीटों पर टीएमसी ने जीत दर्ज की।

भाजपा के लिए यह दीवार अभेद्य क्यों?

भाजपा के लिए ये मुस्लिम बहुल सीटें एक दीवार की तरह काम करती हैं। 2021 में, 30% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली इन सीटों पर भाजपा केवल एक सीट जीत सकी थी। इसके विपरीत, जिन सीटों पर मुस्लिम आबादी 10% तक थी, वहां भाजपा का 'स्ट्राइक रेट' 42% था (77 में से 33 सीटें जीतीं)। जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी का प्रतिशत बढ़ा, भाजपा का प्रदर्शन गिरता गया। 



2026: बहुकोणीय मुकाबला और वोटों के बिखराव का खतरा
2026 का परिदृश्य 2021 के सीधे दो दलों के मुकाबले से पूरी तरह अलग और जटिल है। इस बार अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर टीएमसी के वोट बैंक में सेंधमारी के कई मोर्चे खुल गए हैं:

वाम-आईएसएफ गठबंधन: वाम मोर्चे ने पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की 'इंडियन सेक्युलर फ्रंट' (ISF) से गठबंधन किया है। 2026 में आईएसएफ को गठबंधन के तहत 30 सीटें आवंटित की गई हैं। आईएसएफ दक्षिण 24 परगना (जैसे भांगड़) में टीएमसी को सीधी चुनौती दे रही है।

कांग्रेस का स्वतंत्र अभियान: दशकों बाद कांग्रेस बिना वामदलों के समर्थन के अकेले चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे अपने पुराने गढ़ वापस पाना है (जैसे मालतीपुर में मौसमी नूर की उम्मीदवारी), जो टीएमसी के आधार में सीधे सेंध लगाएगी।

एआईएमआईएम की एंट्री: उत्तर दिनाजपुर जैसे उर्दू/सुरजापुरी भाषी बेल्ट में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी आक्रामक प्रयास कर रही है।

मार्जिन की राजनीति और भाजपा का गणित
भाजपा को बंगाल जीतने के लिए इस मुस्लिम किले को भेदना होगा या हिंदू बहुल सीटों पर भारी बढ़त बनानी होगी। चुनावी विश्लेषकों के अनुसार, यदि स्वतंत्र रूप से लड़ रही कांग्रेस या आईएसएफ इन अल्पसंख्यक सीटों पर केवल 5% से 10% वोटों का भी बिखराव करने में सफल होते हैं, तो टीएमसी का वोट शेयर कम हो जाएगा। इस त्रिकोणीय लड़ाई का सीधा गणितात्मक लाभ भाजपा को मिलेगा, जो अपने 38% के स्थिर बहुसंख्यक (हिंदू) वोट बैंक पर मजबूती से टिकी हुई है।



क्या होगा इस बार?
चुनाव आयोग के'विशेष सघन पुनरीक्षण (एआईआर) अभियान के कारण मतदाता सूची से नाम कटने और नागरिकता खोने के डर ने इस बार मुस्लिम बहुल सीटों पर 96% तक का अभूतपूर्व मतदान सुनिश्चित किया है। चाणक्य स्ट्रेटीजीज के एग्जिट पोल के अनुसार, 71% मुस्लिम मतदाता टीएमसी के साथ मजबूती से लामबंद दिख रहे हैं। 

अगर यह एकमुश्त मतदान वास्तविकता में परिवर्तित होता है, तो टीएमसी लगातार चौथी बार सरकार बना सकती है। लेकिन अगर कांग्रेस, आईएसएफ और अन्य दलों के कारण इस वोट बैंक में जरा भी सेंधमारी हुई है, तो चुनाव परिणाम एक त्रिशंकु विधानसभा की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे में, मालदा और मुर्शिदाबाद में कांग्रेस और आईएसएफ द्वारा जीती गई चंद सीटें अगली सरकार बनाने में किंगमेकर की भूमिका निभाएंगी।

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