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TMC में और गहराया मतभेद: सर्वदलीय बैठक से शोभनदेव चट्टोपाध्याय और कुणाल घोष बाहर, बागी गुट को दिया गया आमंत्रण
पीटीआई, कोलकाता
Published by: Pavan
Updated Tue, 16 Jun 2026 07:43 PM IST
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सार
पश्चिम बंगाल विधानसभा के बजट सत्र से पहले टीएमसी की अंदरूनी कलह फिर सामने आई। पार्टी के आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष शोभनदेब चट्टोपाध्याय और कुणाल घोष को सर्वदलीय बैठक में नहीं बुलाया गया, जबकि ऋतब्रत बनर्जी के बागी गुट को आमंत्रित किया गया। इससे विधानसभा में बागी गुट की बढ़ती ताकत स्पष्ट हुई।
TMC में और गहराया मतभेद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रहा संकट और गहरा होता दिखाई दे रहा है। विधानसभा के बजट सत्र से पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में पार्टी नेतृत्व के करीबी नेताओं को आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि बागी गुट के नेताओं को बुलाया गया। इससे पार्टी के अंदर जारी सत्ता का संघर्ष एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है।
बजट सत्र से पहले बड़ा घटनाक्रम
पश्चिम बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू होने वाला है। इसके पहले विधानसभा में सर्वदलीय बैठक और बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (बीएसी) की बैठक आयोजित की गई। आमतौर पर इन बैठकों में सभी प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों को बुलाया जाता है, लेकिन इस बार टीएमसी के भीतर चल रही खींचतान का असर साफ दिखाई दिया। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी द्वारा नेता प्रतिपक्ष पद के लिए नामित वरिष्ठ विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को बैठक का निमंत्रण नहीं मिला। इसी तरह बेलियाघाट से विधायक कुणाल घोष का नाम भी आमंत्रित नेताओं की सूची में नहीं था।
यह भी पढ़ें- Tamil Nadu Politics: TVK सरकार ने राज्य की आर्थिक स्थिति पर जारी किया श्वेत पत्र, डीएमके सरकार पर साधा निशाना
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बागी गुट को मिली मान्यता
इसके उलट, टीएमसी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट को बैठक में बुलाया गया। हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्रनाथ बसु ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी थी। इसका कारण यह बताया गया कि टीएमसी के अधिकांश विधायकों ने उनके नेतृत्व का समर्थन किया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम विधानसभा में बदलते राजनीतिक समीकरणों को स्वीकार करने का संकेत है। अब विधानसभा प्रशासन भी संख्या बल के आधार पर बागी गुट को महत्व देता दिखाई दे रहा है।
80 में से 58 विधायकों ने किया था विद्रोह
कुछ दिन पहले टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले के खिलाफ जाकर ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने का समर्थन किया था। उन्होंने पार्टी हाईकमान द्वारा चुने गए सोभनदेब चट्टोपाध्याय को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। बताया जा रहा है कि अब बागी गुट की ताकत और बढ़ गई है तथा उसके साथ करीब 65 विधायक आ चुके हैं। इससे विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी की स्थिति और मजबूत हो गई है।
अन्य विपक्षी दलों ने भी लिया हिस्सा
सर्वदलीय बैठक में अन्य विपक्षी दलों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। इनमें आईएसएफ के विधायक नौशाद सिद्दीकी, आम जनता उन्नयन पार्टी के विधायक हुमायूं कबीर और सीपीआईएम के विधायक मुस्तफिजुर रहमान प्रमुख थे।
संसद में भी टीएमसी को झटका
विधानसभा के अलावा संसद में भी टीएमसी को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद टीएमसी संसदीय दल से अलग हो गए हैं। इन सांसदों ने कथित तौर पर नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होने का फैसला किया है और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की है।
यह भी पढ़ें- कलम की उम्र में थामा हथौड़ा: ₹200 में खरीदा बचपन, 11-11 घंटे करवाया काम, गुजरात में 84 बाल मजदूरों का रेस्क्यू
ममता बनर्जी की पकड़ पर सवाल
विधानसभा और संसद दोनों जगह हुए इन विद्रोहों ने टीएमसी नेतृत्व, खासकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, की राजनीतिक पकड़ को कमजोर कर दिया है। पार्टी के भीतर असंतोष अब केवल संगठन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर विधानसभा और संसद जैसी संस्थाओं में भी दिखाई देने लगा है। अब 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र में सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि विधानसभा के भीतर बदले हुए राजनीतिक समीकरण किस तरह सामने आते हैं। यदि बागी गुट अपना बहुमत बनाए रखता है, तो विधानसभा में विपक्ष की राजनीति का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है। फिलहाल, सर्वदलीय बैठक से सोभनदेब चट्टोपाध्याय और कुणाल घोष को बाहर रखना इस बात का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि टीएमसी के भीतर सत्ता और नेतृत्व की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।
बजट सत्र से पहले बड़ा घटनाक्रम
पश्चिम बंगाल विधानसभा का बजट सत्र 18 जून से शुरू होने वाला है। इसके पहले विधानसभा में सर्वदलीय बैठक और बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (बीएसी) की बैठक आयोजित की गई। आमतौर पर इन बैठकों में सभी प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों को बुलाया जाता है, लेकिन इस बार टीएमसी के भीतर चल रही खींचतान का असर साफ दिखाई दिया। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी द्वारा नेता प्रतिपक्ष पद के लिए नामित वरिष्ठ विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को बैठक का निमंत्रण नहीं मिला। इसी तरह बेलियाघाट से विधायक कुणाल घोष का नाम भी आमंत्रित नेताओं की सूची में नहीं था।
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बागी गुट को मिली मान्यता
इसके उलट, टीएमसी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट को बैठक में बुलाया गया। हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्रनाथ बसु ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी थी। इसका कारण यह बताया गया कि टीएमसी के अधिकांश विधायकों ने उनके नेतृत्व का समर्थन किया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम विधानसभा में बदलते राजनीतिक समीकरणों को स्वीकार करने का संकेत है। अब विधानसभा प्रशासन भी संख्या बल के आधार पर बागी गुट को महत्व देता दिखाई दे रहा है।
80 में से 58 विधायकों ने किया था विद्रोह
कुछ दिन पहले टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसले के खिलाफ जाकर ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने का समर्थन किया था। उन्होंने पार्टी हाईकमान द्वारा चुने गए सोभनदेब चट्टोपाध्याय को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। बताया जा रहा है कि अब बागी गुट की ताकत और बढ़ गई है तथा उसके साथ करीब 65 विधायक आ चुके हैं। इससे विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी की स्थिति और मजबूत हो गई है।
अन्य विपक्षी दलों ने भी लिया हिस्सा
सर्वदलीय बैठक में अन्य विपक्षी दलों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। इनमें आईएसएफ के विधायक नौशाद सिद्दीकी, आम जनता उन्नयन पार्टी के विधायक हुमायूं कबीर और सीपीआईएम के विधायक मुस्तफिजुर रहमान प्रमुख थे।
संसद में भी टीएमसी को झटका
विधानसभा के अलावा संसद में भी टीएमसी को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद टीएमसी संसदीय दल से अलग हो गए हैं। इन सांसदों ने कथित तौर पर नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होने का फैसला किया है और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की है।
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ममता बनर्जी की पकड़ पर सवाल
विधानसभा और संसद दोनों जगह हुए इन विद्रोहों ने टीएमसी नेतृत्व, खासकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, की राजनीतिक पकड़ को कमजोर कर दिया है। पार्टी के भीतर असंतोष अब केवल संगठन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर विधानसभा और संसद जैसी संस्थाओं में भी दिखाई देने लगा है। अब 18 जून से शुरू होने वाले बजट सत्र में सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि विधानसभा के भीतर बदले हुए राजनीतिक समीकरण किस तरह सामने आते हैं। यदि बागी गुट अपना बहुमत बनाए रखता है, तो विधानसभा में विपक्ष की राजनीति का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है। फिलहाल, सर्वदलीय बैठक से सोभनदेब चट्टोपाध्याय और कुणाल घोष को बाहर रखना इस बात का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि टीएमसी के भीतर सत्ता और नेतृत्व की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।