West Bengal Election Analysis: बंगाल में पहली बार कमल, भाजपा ने हाई वोल्टेज घेराबंदी वाला चुनाव कैसे जीता?
पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन तय दिख रहा है। ममता बनर्जी की टीएमसी की विदाई और भाजपा की पहली बार सरकार बनने की प्रबल संभावना है। इस बड़े बदलाव के कई मुख्य कारण हैं। फिर चाहे वो 15 साल की सत्ता विरोधी लहर हो या फिर बदहाल कानून-व्यवस्था। संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं ने भी महिला व शहरी वोटरों को प्रभावित किया। आइए, विस्तार से समझते हैं भाजपा ने कौन से मुद्दों को भुनाकर मजबूत चुनावी रणनीति से यह जीत सुनिश्चित की है।
विस्तार
पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन होता दिख रहा है। राज्य की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की विदाई लगभग तय हो गई है। भाजपा राज्य में पहली बार सरकार बनाती दिख रही है। पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय दलों की लड़ाई का मैदान रही है। अब तक के परिणामों को देखें तो इस बार भाजपा ने न केवल अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत किया, बल्कि चुनावी रणनीति, नैरेटिव और बूथ स्तर तक पहुंच में भी महत्वपूर्ण सुधार किया। जिसका असर उसकी सीटों की संख्या पर दिख रहा है। बंगाल में भाजपा की वापसी के कई महत्वपूर्ण कारण रहे हैं।
15 साल की सत्ता विरोधी लहर
ममता बनर्जी 2011 में लेफ्ट को सत्ता से बेदखल कर बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थीं। जिसके बाद से वह लगातार तीन बार राज्य का चुनाव जीतीं। स्ट्रीट फाइटर की छवि के साथ सत्ता में पहुंची ममता अपने 15 साल के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार, हिंसा जैसे मुद्दों से घिर गईं। भाजपा ने अपने चुनाव प्रचाप में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अपराध, टीएमसी कार्यकर्ताओं की कथित गुंडागर्दी को बड़ा मुद्दा बनाया और जोर-शोर से जनता तक पहुंचाया।
- कानून-व्यवस्था और हिंसा बना मुद्दा
पश्चिम बंगाल में चुनावी और राजनीतिक हिंसा लंबे समय से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। भाजपा ने लगातार आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता हिंसा में शामिल रहते हैं। संदेशखाली जैसी घटनाओं को भाजपा ने बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया। इस नैरेटिव का असर खासकर महिला वोटरों और शहरी मध्यम वर्ग पर पड़ा, जहां सुरक्षा एक प्रमुख चिंता बनकर उभरी। भाजपा ने इसे कानून का राज बनाम राजनीतिक संरक्षण के रूप में पेश किया। इसी बीच कोलकाता में हुई महिला डॉक्टर का दुष्कर्म और हत्या ने ममता सरकार की कानून व्यावस्था पर और अधिक सवाल खड़े कर दिए। आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। भाजपा ने इस मुद्दे को पूरी तरह भुनाते हुए आरजी कर पीड़िता की मां को चुनावी मैदान में उतारा। वह चुनाव अभी तक के परिणामों में आगे चल रही हैं।
- भ्रष्टाचार के आरोप
भ्रष्टाचार इस चुनाव का एक केंद्रीय मुद्दा रहा। विभिन्न घोटालों और स्थानीय स्तर पर कट मनी के आरोपों ने सत्ताधारी दल की छवि को नुकसान पहुंचाया। भाजपा ने इसे व्यवस्थित तरीके से उभारा और इसे व्यवस्था परिवर्तन के एजेंडा से जोड़ा। ममता बनर्जी की छवि भले ही साफ-सुथरी रही हो, लेकिन उनके कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। यहां तक की टीएमसी के चुनाव प्रचार संभालने वाली एजेंसी आईपैक पर घोटाले का आरोप लगे है।
एसआईआर ने लिख दी पटकथा
बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सबसे अधिक विवाद रहा। ममता बनर्जी एसआईआर में हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक अपनी दलीलें देने पहुंचीं। मतदान के दो दिन पहले तक राज्य में वोटर के नाम जोड़े और काटे गए। राज्य में एसआईआर के दौरान 90 लाख के अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। राज्य में कई विधानसभाएं ऐसी थी, जहां लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए। इसके अलावा ममता बनर्जी ने आरोप लगाए थे कि टीएमसी के प्रभुत्व वाली सीटों पर एसआईआर के दौरान सबसे अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। अब जबकि परिणाम से स्थिति साफ हो रही तो एसआईआर के दौरान काटे गए नामों का असर होता दिख रहा है।
युवा बने चुनाव में फैक्टर
प. बंगाल विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर युवा मतदाता बनकर उभरा है। चुनाव आयोग के अनुसार राज्य में कुल मतदाता 6.44 करोड़ हैं। इनमें 1.4 से 1.7 करोड़ युवा (18-29 आयु वर्ग) हैं। 18 से 19 वर्ष के 5.2 लाख से अधिक युवा पहली बार वोट डाल रहे थे। यानी हर चौथा वोटर युवा है। ऐसे में बेरोजगारी, भर्ती घोटाले, सिस्टम में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से यह वर्ग नाराज दिखाई दिया। 2021 के चुनावों में इस वोट बैंक को काफी साधने की कोशिश की गई थी। पहचान पत्र, छात्राओं के लिए योजनाएं, परंतु, इस बार के मुद्दे ज्यादा गहरे थे। इस बार चुनाव में बेरोजगारी, भर्ती घोटाले और सिस्टम में भ्रष्टाचार इन युवाओं के लिए प्रमुख मुद्दे बन गए।
पिछले चुनावों से तुलना करें तो युवाओं की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। 2011 में यह 20-22% थी, जो 2021 में बढ़कर 24-25% और 2026 में 22-26% के बीच पहुंच गई है। भले ही संख्या बहुत बड़ी न हो, लेकिन चुनाव परिणाम बदलने लायक असर जरूर डाला है। पूरे बंगाल में युवाओं, खासकर शहरी इलाकों में, यह मुद्दा सबसे बड़ा बनकर उभरा। शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़े 26 हजार नियुक्तियां रद्द होने के फैसले के बाद युवाओं में गुस्सा और बढ़ा। लंबे समय तक चले आंदोलन ने सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया। चुनावी समीकरणों में बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दों का असर सीमित नहीं रहा।
हिंसा-मुक्त और उच्च मतदान वाला चुनाव
बंगाल के चुनावों का इतिहास हिंसा से भरा रहा है, लेकिन इस बार अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण मतदान ने चुनावी परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। चुनाव आयोग द्वारा भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती, संवेदनशील बूथों की पहचान और प्रशासनिक अधिकारियों के व्यापक तबादलों ने माहौल बदला। इसका असर दो स्तरों पर दिखा:
- सुरक्षाबलों की भारी तैनाती के चलते वह मतदाता भी बाहर निकल कर आए सत्ता विरोधी होने के चलते मतदान नहीं करने आते थे, यानी साइलेंट वोटर इस बार निर्णायक बना।
- सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी के चलते रिकॉर्ड स्तर का मतदान हुआ, जिसने सत्ता विरोधी लहर को वास्तविक वोट में बदला दिया।
बंपर मतदान
इस बार पश्चिम बंगाल में जहां पहले चरण में 93.19 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई थी, वहीं दूसरे चरण में भी 92.67 फीसदी वोटिंग हुई। इसी के साथ बंगाल में वोटिंग का कुल औसत 92.93 फीसदी से ज्यादा हो गया, जो कि देश में किसी राज्य में वोटिंग का नया रिकॉर्ड है। पश्चिम बंगाल में इस बार भारी मतदान भी समीकरण बदलने वाला फैक्टर रहा है। इस बार राज्य में लगभग हर पांचवां मतदाता वोट देने निकला। संवेदनशील इलाकों में जंगलमहल, उत्तर बंगाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी भारी मतदान हुआ। महिलाओं के साथ पहली बार वोट देने वाले युवाओं की भागीदारी बढ़ी।
भाजपा ने गलतियों से सबक लिया
2021 और 2026 के जंग में भाजपा की रणनीति का आंकलन करें तो काफी कुछ बदला हुआ नजर आएगा। ममता ने अपने जुबानी अंदाज से भाजपा को घेरे में रखने का प्रयास किया। लेकिन इस बार भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में ज्यादा समय या लोकल नेताओं को आगे की राजनीतिक रणनीति बनाने में ज्यादा भूमिका दी गई है। साथ ही सीमा सुरक्षा व बांग्ला अस्मिता पर लगातार हमला जारी रखा।
भाजपा सीधे व्यक्तिगत प्रहारों के बजाय 15 साल की एंटी-इंकंवेंसी और प्रशासनिक विसंगतियों को ढाल बनाया।उन्होंने ममता के ही अस्त्रों से उन्हें घेरने की कोशिश की। चाहे वह मुरमुरा- चाय पर चर्चा हो या झालमुड़ी का स्वाद । फ्लैट के लिए पांच लाख का दांव सीधे तृणमूल की राजनीति की काट के तौर पर देखा गया। भाजपा ने चुनाव प्रचार में यह नरैटिव बनाने की कोशिश की कि अब चुनावी मुद्दों की बात हो रही है, ना कि चेहरे की। वहीं पीएम मोदी और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ममता पर सीधे हमलावर नहीं दिखी। जिसे पिछले चुनाव में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण माना गया था। भाजपा ने इस बार चुनाव मोदी बनाम ममता नहीं बनने दिया, जिससे ध्रुवीकरण सीमित रहा।
भाजपा ने इस बार बंगाल के चुनाव प्रचार की कमान स्थानीय नेताओं को सौंपी। जहां पिछली बार भाजपा ने बंगाल के चुनाव प्रबंधन की कमान कैलाश विजयवर्गीय को सौंपी थी, इसबार भाजपा ने रणनीति बदलते हुए ममता के पुराने सहयोगी रहे शुभेंदु अधिकारी को चुनाव से जुड़े फैसले लेने के लिए पूरी छूट दी। जिसका असर अब परिणामों में दिख रहा है।
बंगाल में जमे रहे अमित शाह
भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले गृह मंत्री अमित शाह ने इस बार चुनावों में बंगाल में काफी लंबा समय गुजारा। वह आखिरी समय में बंगाल में करीब दो हफ्तों तक रहे और उन्होंने दो दर्जन से अधिक चुनावी रैलियां की। एक और जहां वह अपने भाषणों में ममता सरकार पर तीखा प्रहार करते दिखे, तो वहीं दूसरी ओर वह पर्दे के पीछे चुनावी की रणनीतियों को तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाते रहे। जिसका असर अब चुनाव के परिणामों पर दिखा। चुनाव के अंतिम दौर में अमित शाह ने नारा दिया था कि अंग, बंग और कलिंग तीनों में भाजपा की सरकार बनेगी।
