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Bengal: नंदीग्राम आंदोलन से बंगाल में उखड़ी थी तीन दशकों की वाम सत्ता! चुनाव से पहले शहीद दिवस पर भाजपा सक्रिय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Wed, 07 Jan 2026 03:33 PM IST
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सार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के साथ ही वाम दल-कांग्रेस सक्रिय हो गए हैं। इसी के मद्देनजर 7 जनवरी को नंदीग्राम आंदोलन की बरसी पर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम में कई श्रद्धांजलि कार्यक्रमों का आयोजन किया।
भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी
- फोटो : ANI
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विस्तार
पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने बुधवार को नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण के विरोध प्रदर्शन के दौरान मारे गए प्रदर्शनकारियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। 2007 में पूर्वी मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम में हुई गोलीबारी की घटना में तीन भूमि अधिग्रहण विरोधी प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी।
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भाजपा नेता ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, 'शहीद तर्पण दिवस 7 जनवरी, 2007 के अवसर पर मैं नंदीग्राम भूमि रक्षा आंदोलन के तीन अमर शहीदों को अपनी श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।' नंदीग्राम में खेजुरी और सोनाचुरा के बीच भांगा बेरा ब्रिज क्षेत्र के पास स्मारक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
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इस घटना ने राज्य में व्यापक अशांति को जन्म दिया और अंततः पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गई, जिसने वाम मोर्चा सरकार के पतन में योगदान दिया। नंदीग्राम में बुधवार को भाजपा और स्थानीय टीएमसी नेताओं ने भी इस घटना में मारे गए लोगों को याद करने के लिए शहीद दिवस मनाया।
नंदीग्राम आंदोलन ने ढहाई वाम मोर्चा की सरकार
नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ ला दिया। तीन दशक से सत्ता में रही वाम मोर्चा सरकार की नींव हिला दी। वर्ष 2006–07 में वाम सरकार ने नंदीग्राम में एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) के लिए भूमि अधिग्रहण की घोषणा की। इस फैसले का ग्रामीणों ने तीखा विरोध किया, क्योंकि उनकी आजीविका कृषि पर निर्भर थी और उन्हें जबरन विस्थापन का डर था।
आंदोलन के दौरान 14 मार्च 2007 को पुलिस कार्रवाई में कई ग्रामीणों की मौत हुई। इस घटना ने पूरे राज्य में आक्रोश फैला दिया और वाम सरकार की किसान हितैषी छवि को गहरा धक्का लगा।
नंदीग्राम आंदोलन ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को एक मजबूत जनाधार दिया। ममता बनर्जी ने इसे किसान और आम जनता के संघर्ष का प्रतीक बनाया, जिससे वाम विरोधी भावना तेज हुई। इसी चलते 2011 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा को हार का सामना करना पड़ा और तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई।
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