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Bombay High Court: 'विरोध करने पर केस क्यों', अदालत ने कहा- क्या सरकार नागरिकों को गुलाम बनाना चाहती है?

Fri, 03 Jul 2026 02:00 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 03 Jul 2026 02:00 PM IST
सार

क्या सरकार के खिलाफ नारे लगाना या विरोध प्रदर्शन करना अपराध है? बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस सवाल पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार की नीतियों का विरोध करने, धरना देने और नारे लगाने का अधिकार है। अदालत ने महाराष्ट्र पुलिस द्वारा एसडीपीआई नेता के खिलाफ जारी जिला बदर का आदेश रद्द करते हुए पूछा कि क्या सरकार नागरिकों को गुलाम बनाना चाहती है और सिर्फ विरोध करने पर उनके खिलाफ केस दर्ज किए जाएंगे? आइए, विस्तार से पूरे मामले को समझते हैं...

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Bombay High Court on 'Horse Trading': Why Did the Court Say, 'If You Have FIRs, Go to the Washing Machine
बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले नागरिकों के अधिकारों पर बॉम्बे हाईकोर्ट की एक अहम टिप्पणी की। अदालत ने साफ कहा कि लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को सरकार के फैसलों का विरोध करने, धरना देने या नारे लगाने का अधिकार है। यदि केवल विरोध प्रदर्शन करने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करती है या उसे जिला बदर करती है, तो यह संविधान से मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस द्वारा एसडीपीआई के नेता सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी के खिलाफ जारी जिला बदर का आदेश रद्द कर दिया।

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यह मामला सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी की याचिका से जुड़ा था। पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज पांच एफआईआर का हवाला देते हुए उन्हें एक साल के लिए जिला बदर कर दिया था। इन मामलों में अधिकतर एफआईआर केंद्र सरकार के फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन, धरना और मोर्चा निकालने से जुड़ी थीं। न्यायमूर्ति माधव जामदार ने सुनवाई के दौरान पूछा कि केवल सरकार का विरोध करने या नारे लगाने के आधार पर किसी नागरिक को जिला बदर कैसे किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है।

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क्या सरकार के खिलाफ नारे लगाना अपराध है?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माधव जामदार ने तीखी मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, "क्या हो रहा है? क्या सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है? वे न प्रदर्शन कर सकते हैं, न आंदोलन। अगर लोग विरोध करेंगे तो उनके खिलाफ केस दर्ज कर दिए जाएंगे। सिर्फ नारों के लिए जिला बदर का आदेश कैसे दिया जा सकता है?" अदालत ने कहा कि पुलिस का काम कानून लागू करना है, न कि सरकार की आलोचना करने वालों को निशाना बनाना।

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हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर क्या कहा?

अदालत ने कहा कि पुलिस किसी नागरिक को केवल इसलिए जिला बदर नहीं कर सकती क्योंकि उसने सरकार के फैसलों का विरोध किया है। न्यायमूर्ति जामदार ने यह भी टिप्पणी की कि पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि जनता की सेवक है। उन्होंने पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई पर नाराजगी जताते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि ऐसी कार्रवाई बिना उचित आधार के की जाती है तो संबंधित अधिकारियों पर सख्त रुख अपनाया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने 'हॉर्स ट्रेडिंग' और 'वॉशिंग मशीन' पर क्या कहा?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माधव जामदार ने महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि राज्य में "हॉर्स ट्रेडिंग" चल रही है और सांसद-विधायक लगातार दल बदल रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने हल्के अंदाज में याचिकाकर्ता से कहा कि यदि उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हैं तो वह भी "साइड बदल लीजिए, वहां एक वॉशिंग मशीन है।" अदालत की यह टिप्पणी आदेश का हिस्सा नहीं थी, बल्कि मौखिक टिप्पणी थी। हालांकि इस टिप्पणी के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।

क्या सरकार का विरोध करना जिला बदर का आधार बन सकता है?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट कहा कि सरकार की नीतियों का विरोध करना किसी नागरिक को जिला बदर करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार के कुछ फैसलों के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित किए थे, लेकिन यह लोकतांत्रिक अधिकार है। केवल विरोध प्रदर्शन करने के कारण किसी नागरिक के खिलाफ महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत कार्रवाई करना संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण करार दिया।

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